क्षमा प्रार्थना

नहीं रखो अपराध का बोध हीनता भाव,
क्षमा करो आगे बढ़ो भाओ सत्य स्वभाव।

निज मन को तन से लगा, निज चेतन से नेह,
क्षमा करो आगे बढ़ो, मुक्ति मुक्त करेह।

खुद से ही तू प्रेम कर, निज में नित तू झाँक,
क्षमा करो आगे बढ़ो मत निज को कम आँक।

णमोकार मय सारा जीवन

णमोकार मय सारा जीवन बना लो ।

महामंत्र के चेतन को सजा लो ॥

1. णमोकार के पंच परमेष्ठी प्यारे ।

भरे शुद्ध भावों से जग में हैं न्यारे ॥

महामंत्र की शक्ति निज में मिला लो ।

महामंत्र से चेतना को सजा लो ॥ णमोकार……

2. रहे ज्ञान ही ज्ञान में मेरा ध्यान ।

महामंत्र सब दुःख हर ले महान ॥

सभी हो सुखी और सबका भला हो ।

महामंत्र से चेतना को सजा लो ।। णमोकार……..

3. न तन में हो रोग, न मन में अशान्ति ।

हो सारे जहाँ में परम शान्ति शान्ति ॥

परम शान्ति अर्हम् सभी को मिला लो ।

महामंत्र से चेतना को सजा लो ॥ णमोकार……

ॐ अर्हं बोल

ॐ अर्हं, ॐ अर्हं, ॐ अर्हं बोल
सभी कार्य की सिद्धि से तू
पहले इसको बोल

ॐ अर्हं…

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जिसने भी यह मंत्र पढ़ा, दुःख सारा ही दूर किया
जिसने भी इसको ध्याया, सुख का पारावार लिया
इसकी महिमा इसकी शक्ति, नहीं सका कोई तौल।1।
ॐ अर्हं…

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भोजन से पहले तू ध्याले, चलते फिरते भी तू गाले।
सोने से पहले, जग कर के, मन को इसका
नाद सुनाले
सिद्ध शुद्ध अविरुद्ध मंत्र से, तू अपना मुख खोल।2।
ॐ अर्हं…

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दुराचरण को दूर भगाए, सोता तेरा भाग्य जगाए
ध्यान साधना इसकी करके, मानव अपना भाग्य बनाए
तन मन आतम शुद्धि करे ये, महिमा है अनमोल।3।
ॐ अर्हं..

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संत शिरोमणि का स्वर्णिम संयम उत्सव

संत शिरोमणि का स्वर्णिम संयम उत्सव।
भव्य जनों के लिए भक्ति का है अवसर।।

श्रमण संस्कृति के जो नेता आज बने।
जिनके नाम से श्रद्धा मन में सहज बने।
चारित की खुशबू से जग को महकाया।
उनकी भक्ति करने विश्व सिमट आया।

नरम बना है स्वयं नर्मदा का कंकर।।
भव्य जनों के लिए….

जिनके चारित ज्ञान ध्यान की शानी ना।
जिनके कंठ विराजित है जिनवाणी माँ।
मूकमाटी भी जिनके हाथों बोल पड़ी।

श्रमण श्रमणियों की टोली भी घेर खड़ी।
धन्य हुए हैं सर्प सिंह भी दर्शन कर।।
भव्य जनों के लिए….

जिनशासन को आज नाज बस तुम मै है
विद्यासागर एक नाम सब मुँह पै है
प्रतिभास्थली भाग्योदय की रचनाएँ।
पाठ दया का गौशालाएँ सिखलाएँ।
उपकृत आप कृपा से जन-जन हर घर-घर।।
भव्य जनों के लिए…

सब मिल आओ खुशियाँ मनाओ

सब मिल आओ खुशियाँ मनाओ, संयम स्वर्णिम वर्ष की।
संतशिरोमणि के भक्तों की, बेला आई हर्ष की।

हम सब मिल गाएँ – जय गुरुदेव
हम झूमें नाचें – जय गुरुदेव
सब मंगल गायें – जय गुरुदेव
घर गुरुवर आयें – जय गुरुदेव
ज्ञान गुरु के शिष्य सूरि श्री विद्यासागर की।
संत शिरोमणि के………..

जीवन जाता है – जाने दो
संयम आता है – आने दो
भक्ति मन भाती – भाने दो
स्वर्णिम नव वर्ष – मनाने दो
हम सबके भगवान गुरुवर विद्यासागर की।
संत शिरोमणि के………..

मेरी मन बगिया – महक रही
सबकी चित्त चिड़िया – चहक रही
भक्ति की गंगा – बहक रही
चेतन अनुभूति – चमक रही
संत शिरोमणि महाश्रमण श्री विद्यासागर की
संत शिरोमणि के………..

विद्यासागर इस धरती पर

विद्यासागर इस धरती पर, कोई फरिश्ता का है नूर।
जिसने देखा तुमको गुरुवर, उसको चैन मिला भरपूर।।
विद्यासागर…

शिक्षित बाल युवा दीक्षा दे, चेतन का उद्धार किया।
कुण्डलपुर के बड़े बाबा को, तुमने उच्चस्थान दिया।
नारी शक्ति संस्कारित हो, प्रतिभा स्थली बना दिया।
जन-जन की करुणा से पूरित, भाग्योदय निर्माण किया।
करके जग का हित मेरे गुरुवर, जग में रहते जग से दूर।।
विद्यासागर…

दीप अनेकों जलते -बुझते, उनसे क्या रोशन हो जहां?
कदम आपके जहाँ भी पड़ते, ज्ञान दीप जलते हैं वहाँ।
तुमने दीप से दीप जलाकर, ज्ञान प्रकाश बढ़ाया है।
अपने गुरुवर से ज्योति ले, जग जन को नहलाया है।
आप कृपा से दूर रहा जो, उसमें उसका ही है कसूर।।

विद्यासागर…

शरद पूर्णिमा की उजली-सी, रात में कोई आया था ।
होके युवा तप को धारण कर, चाँद निशा में छाया था।
आज उसी की शीतलता में, आनन्दित है जग सारा।
जिससे ही बस फैल रहा, जिनशासन का उजयारा।
तुमसे चाँद सितारों को भी, और फिजाओं को है गुरूर।।

विद्यासागर…

शुद्ध चिद्रूपोऽहं

गगन मगन है गगन में, निर्मल शुद्ध स्वभाव
चेतन चेतन में मगन जग जड़ पूर्ण विभाव
चेतन का चैतन्य में चेतनता से ज्ञान
जहाँ हो रहा वही है उपादेय चिदधाम

शुद्ध चिद्रूपोऽहं

ज्ञान ज्ञान में ज्ञेय ज्ञेय में ज्ञायक आतम राम
नभ नभ में है धूलि धूलि में निज-निज परिणति जान
जिसके चिंतन मनन ध्यान से मद मत्सर बे काम
बहुत थक गए अब तो होवे चेतन में विश्राम
शुद्ध चिद्रूपोऽहं ………..

भेद ज्ञान कर हंसा बन जा नीर क्षीर पहिचान
चेतन क्या निश्चेतन क्या तू भेद ज्ञान से जान

ज्यों सोने से प्रस्तर हटता चमक दमक संधान
त्यों चेतन से मोह हटे तो शुद्ध चेतना ध्यान
शुद्ध चिद्रूपोऽहं ………..

जिसके ध्यान से आत्म विशुद्धि अरू शुद्धि से ध्यान
करण कार्य वही फिर कारण रूचि बढ़ती निज ध्यान
उसी ध्यान से भेद ज्ञान हो उसी से केवलज्ञान
ध्याता ध्यान अरू ध्येय एक जहँ निज संवेदन नाम
शुद्ध चिद्रूपोऽहं ………..

छह अक्षर का मंत्र ये अनुपम तोड़े मोह अज्ञान
जिस चिन्तन से संवर होवे तत्क्षण ऐसा जान
ज्ञान बढ़े वैराग्य बढ़े फिर नहीं राग का काम
चिन्ता चित् दोनो विभिन हैं निजानन्द मम नाम

शुद्ध चिद्रूपोऽहं ………..