प्राकृत भाषा पुनर्जन्म, प्रसार और संरक्षण

वर्ष 2017 में पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज का चातुर्मास हरियाणा के रेवाड़ी नगर को प्राप्त हुआ। यह चातुर्मास अनासक्त महायोगी आचार्य भगवन विद्यासागर जी महामुनिराज द्वारा दिया गया एक ऐसा आशीर्वाद था जिसके बारे में ना तो रेवाड़ी के श्रावकों को कुछ पता था और न ही पूज्य मुनि श्री को रेवाड़ी में चातुर्मास होने की कोई संभावना नजर आ रही थी। इस चातुर्मास के लिए अचानक ही पूज्य मुनि श्री को आचार्य श्री से संकेत मिले थे।

शायद आचार्य भगवन विद्यासागर जी महामुनिराज उस भविष्य को देख रहे थे जो रेवाड़ी में घटित होने जा रहा था। वे शायद उस वृक्ष और उसके फलों को देख पा रहे थे, जिसके बीज रेवाड़ी में बोए जाने वाले थे। भविष्य में विकसित होने वाला वह वृक्ष था- प्राकृत भाषा के ज्ञान, प्रचार, प्रसार और संरक्षण का वृक्ष।

आज से कुछ वर्षों पहले तक अनेक जैन श्रावक प्राकृत भाषा का नाम तक नहीं जानते थे l अधिकांश जैन लोग तो यह भी नहीं जानते थे कि हमारा णमोकार महामंत्र इसी प्राकृत भाषा में है, प्राकृत भाषा हमारी प्राचीन बोलचाल की भाषा है और हमारे प्राचीन बहुमूल्य ग्रन्थ इसी भाषा में लिखे गए हैं। इसी तरह हरियाणा के रेवाड़ी नगर का नाम भी, एक सामान्य नगर की तरह ही लोग जानते थे। प्राकृत भाषा और रेवाड़ी नगर का ऐसा अद्भुत संयोग हुआ कि आज जहां एक ओर लगभग सभी जैन श्रावक प्राकृत भाषा के महत्व को समझ चुके हैं, वहीं दूसरी ओर रेवाड़ी नगर भी प्राकृत भाषा के एक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हो चुका है।

रेवाड़ी चातुर्मास में पूज्य मुनि श्री ने प्राकृत भाषा में ‘पाइय सिक्खा’ नाम से चार पुस्तकों की रचना की। ये पुस्तकें प्राकृत भाषा को पुनः जीवन देने वाले बीज के समान थी। इसके बाद रेवाड़ी में प्राकृत जैन विद्या पाठशाला की स्थापना हुई। पूज्य मुनि श्री के मंगल आशीर्वाद, प्रेरणा और मार्गदर्शन से 1 जनवरी 2019 को प्राकृत भाषा के ज्ञान के लिए भारत की प्रथम ऑनलाइन प्राकृत पाठशाला का शुभारम्भ हुआ। ये ऑनलाइन पाठशालाएं प्राकृत भाषा के प्रचार और प्रसार में एक क्रान्तिकारी कदम साबित हुईं । वर्ष 2025 तक 36 ऑनलाइन प्राकृत पाठशालाओं का संचालन हो चुका है।

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इसके साथ ही प्राकृत भाषा में रचित अनेक ग्रन्थ जैसे द्रव्य संग्रह, गाहा संग्रह, तित्थयर भावना, श्री गोम्मटसार जी आदि का भी ऑनलाइन स्वाध्याय हुआ। घर-घर प्राकृत, नगर नगर प्राकृत जैन विद्या पाठशाला, मन्दिर मन्दिर जिनवाणी थुदि अभियान शुरू हुआ । ऑनलाइन प्रतियोगिता, एनीमेटेड वीडियो, एजुकेशनल वीडियो, क्विज, यूट्यूब चैनल आदि के माध्यम से प्राकृत भाषा का वृक्ष दिन प्रतिदिन विकसित होता गया।

वर्तमान समय में प्राकृत भाषा के इस वृक्ष से फल भी प्राप्त होने लगे हैं। 35000 से अधिक लोग ऑनलाइन पाठशाला के माध्यम से प्राकृत भाषा का ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं। भारत ही नहीं, जापान, लंदन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा, यूरोप, श्रीलंका आदि देशों में भी लोगों ने ऑनलाइन क्लास के माध्यम से प्राकृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। रेवाड़ी सहित 60 से अधिक स्थानों पर प्राकृत जैन विद्या पाठशालाएं खुल गई हैं। जिसमें 3000 से अधिक लोग प्राकृत का ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। 450 से अधिक मन्दिरों में प्राकृत जिनवाणी थुदि (स्तुति) लगाई जा चुकी है। हजारों जैन श्रावकों को प्राकृत स्तुतियां याद हो गई हैं। जिनवाणी थुदि तो लाखों लोगों की पसन्द बन चुकी है।

आज पूज्य मुनि श्री के आशीर्वाद से प्राकृत का अध्ययन कराने के लिए शिक्षक ही नहीं, प्रशिक्षक भी उपलब्ध हैं। अनेकों विद्यार्थियों और प्राकृत प्रेमियों ने प्राकृत भाषा में M.A.कर लिया है। अनेक लोग यूजीसी नेट क्वालीफाई कर चुके हैं और वर्तमान में प्राकृत में पी.एच.डी कर रहे हैं। पूज्य मुनि के आशीर्वाद से एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह और रीवा विश्वविद्यालय में प्राकृत भाषा में M.A. की शिक्षा आज सभी के लिए उपलब्ध है।


इसी श्रृंखला में पूज्य मुनि श्री की पावन प्रेरणा से प्राकृत टीम ने एक और कदम बढ़ाया और ‘पागद संदेस’ नाम से प्राकृत पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह भारत में अपनी तरह की पहली पत्रिका है। अभी तक दो प्राकृत पत्रिका प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पत्रिकाओं में प्राकृत के बारे में रोचक जानकारी, ज्ञान और विविध सामग्री उपलब्ध है जिन्हें पढ़कर प्राकृत भाषा को जानने वाले ही नहीं, अपितु अन्य पाठक भी प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

इन दोनों पागद संदेस पत्रिका को इस पेज पर उपलब्ध PDF में आप पढ़ सकते हैं और Download भी कर सकते हैं –

पागद संदेस अंक – 1 (PDF)


पागद संदेस अंक – 2 (PDF)

दंसणपाहुडं (दर्शनपाहुड)

आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी विरचित

प्राकृत में रचित ‘नंदिनी टीका’
पर


स्वाध्याय (वाचना) -13
(गाथा : -36)

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स्वाध्याय (वाचना) -12
(गाथा : 33-35)

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स्वाध्याय (वाचना) -11
(गाथा : 31-32)

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स्वाध्याय (वाचना) -10
(गाथा : 29-30)

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स्वाध्याय (वाचना) -9
(गाथा : 26-28)

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स्वाध्याय (वाचना) -8
(गाथा : -25)

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स्वाध्याय (वाचना) -7
(गाथा : 23-24)

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स्वाध्याय (वाचना) -6
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -5
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -4
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -3
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -2
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -1
(गाथा : )

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आम्नाय स्वाध्याय

श्रावक के 6 कर्तव्यों में से एक प्रमुख कर्तव्य स्वाध्याय कहा गया है अर्थात प्रत्येक श्रावक को प्रतिदिन स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। स्वाध्याय के पांच प्रकार होते हैं – वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय एवं धर्मोपदेश। किसी स्तोत्र, स्तुति या किसी ग्रंथ के श्लोको, सूत्रों और गाथाओं का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करना आम्नाय स्वाध्याय कहलाता है । इस स्वाध्याय से भी अन्य स्वाध्याय की तरह ही पुण्य अर्जित होता है।


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लघु नंदीश्वर विधान



बृहद् द्रव्य संग्रह (अधिकार -2)

‘बृहद् द्रव्य संग्रह’ ग्रन्थ

(आचार्य ब्रह्मदेव सूरि रचित संस्कृत टीका) पर

मंगल वाणी में स्वाध्याय वाचना



स्वाध्याय (वाचना) -92
सम्यग्दृष्टि पुण्य क्यों करता है?
सम्यग्दृष्टि का पुण्य विशिष्ट क्यों होता है?
पुण्य और पाप कब हेय होते हैं?

(गाथा: -38)

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स्वाध्याय (वाचना) -91
मोक्ष में आत्मा कैसा होता है? (उदाहरण सहित)
क्या सभी जीव मोक्ष चले जाएंगे?
पुण्य भावों में कैसे रहें?

(गाथा: 37-38)

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स्वाध्याय (वाचना) -90
भावमोक्ष और द्रव्यमोक्ष से तात्पर्य,
तीन प्रकार का अतीन्द्रिय सुख,
कर्म शत्रु को कैसे पकड़ें?

(गाथा:-37)

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स्वाध्याय (वाचना) -89
वीतराग सम्यग्दृष्टि की कर्म निर्जरा,
सम्यग्ज्ञानी और वीतराग सम्यग्ज्ञानी में अन्तर को समझें,
भेद विज्ञान कब सार्थक होता है?

(गाथा: 36-37)

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स्वाध्याय (वाचना) -88
सविपाक और अविपाक निर्जरा कैसे होती है?
संवर पूर्वक सविपाक निर्जरा मोक्ष मार्ग में सहायक,
अज्ञानी और सम्यग्ज्ञानी की निर्जरा में अन्तर,

(गाथा: -36)

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स्वाध्याय (वाचना) -87
सूक्ष्मसाम्पराय चारित्र की विशेषता,
यथाख्यात चारित्र किसे कहते हैं?
कौन सा चारित्र-किस गुणस्थान में होता है?

(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -86
छेदोपस्थापना चारित्र किसे कहते हैं?
छेदोपस्थापना चारित्र के दो प्रकार,
परिहारविशुद्धि चारित्र कब और कैसे होता है?

(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -85
परिषह सहना और परिषहजय में अन्तर,
समभाव कब आता है?
सामायिक चारित्र का पालन कैसे होता है?

(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -84
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -83
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स्वाध्याय (वाचना) -82
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स्वाध्याय (वाचना) -81
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स्वाध्याय (वाचना) -80
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स्वाध्याय (वाचना) -79
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -78
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स्वाध्याय (वाचना) -77
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स्वाध्याय (वाचना) -76
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -75
मध्यलोक के द्वीप और समुद्र,
मध्यलोक को तिर्यग् लोक क्यों कहा जाता है?
व्यन्तर देवों के आवास, भवन और पुर में अन्तर

(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -74
किस नरक में कितनी बार लगातार जा सकता है जीव?
नरक से निकलकर जीव क्या नही बनता?
नरक के दुख

(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -73
नरक की पृथ्वी के पटल और बिल,
नारकियों की ऊँचाई एवं आयु,
कौन किस नरक तक जा सकता है?

(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -72
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(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -71
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स्वाध्याय (वाचना) -70
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(गाथा: -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -69
निर्जरा अनुप्रेक्षा को कैसे समझें?
समभाव एक औषधि के समान,
कर्म निर्जरा से आत्मा होता है सुखी

(गाथा : -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -68
आस्रव एवं संवर अनुप्रेक्षा,
रोग के समान है कर्म का आस्रव,
नासाग्र दृष्टि का क्या महत्व है?

(गाथा : -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -67
(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -66
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(गाथा : )

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स्वाध्याय (वाचना) -65
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स्वाध्याय (वाचना) -64
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स्वाध्याय (वाचना) -63
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स्वाध्याय (वाचना) -62
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स्वाध्याय (वाचना) -61
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स्वाध्याय (वाचना) -60
ईर्यापथ शुद्धि कैसे होती है?
भिक्षाशुद्धि में क्या ध्यान रखा जाता है?
शयनासनशुद्धि का पालन कैसे होता है?

(गाथा : -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -59
संयम पालन के लिए आठ प्रकार की शुद्धियाँ,
कर्म के क्षयोपशम से होने वाली भाव शुद्धि,
क्षयोपशम कैसे बढ़ता है?

(गाथा : -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -58
भाव संवर के भेद,
निश्चय और व्यवहार से व्रत कैसे होते हैं?
निश्चय धर्म से पहले होता है-व्यवहार धर्म

(गाथा : -35)

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स्वाध्याय (वाचना) -57
क्या केवलज्ञान की किरण होती है?
क्षयोपशम किसे कहते हैं?(उदाहरण सहित)
क्षायिक और क्षायोपशमिक ज्ञान में अन्तर

(गाथा : -34)

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स्वाध्याय (वाचना) -56
शुभोपयोग और शुद्धोपयोग में अन्तर,
शुद्धोपयोग की विशेषताएं,
अशुद्ध पर्याय से शुद्ध पर्याय का क्रम (उदाहरण सहित)

(गाथा : -34)

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स्वाध्याय (वाचना) -55
शुद्धोपयोग किस गुणस्थान से होता है?
गुणस्थान के अनुसार अशुभ, शुभ और शुद्ध उपयोग,
चतुर्थ और पंचम काल के श्रावक

(गाथा : -34)

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स्वाध्याय (वाचना) -54
आस्रव और बन्ध के कारण एक समान क्यों होते हैं?
द्रव्य संवर और भाव संयम में अन्तर,
भाव संवर का महत्व

(गाथा : -33)

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स्वाध्याय (वाचना) -53
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(गाथा : -)

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स्वाध्याय (वाचना) -52
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(गाथा : -)

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स्वाध्याय (वाचना) -51
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स्वाध्याय (वाचना) -50
भावास्रव के कारण,
प्रमाद किसे कहते हैं?
नोकषाय से भावास्रव कैसे होता है?

(गाथा : -30)

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स्वाध्याय (वाचना) -49
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स्वाध्याय (वाचना) -48
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स्वाध्याय (वाचना) -47
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स्वाध्याय (वाचना) -46
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स्वाध्याय (वाचना) -45
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(गाथा : -28)

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श्री शान्तिनाथ स्तुति शतकम्


–o–

शान्तिनाथ के चरण कमल में, भ्रमर सरीखे होकर लीन

संख्यातीत मनुज देवों ने, किया आत्महित होकर पीन।

मैं भी एक भ्रमर उनमें से, मति विहीन हूँ शक्ति विहीन

प्रभु प्रभाव से भक्ति द्वारा, हो जाऊँगा परम प्रवीण॥1॥

–o–

–o–

मनुज स्वर्ग के देवों ने भी जिनकी महिमा पहले भी

गायी है पर पूर्ण कथन की रही नहीं सामर्थ्य कभी।

जान रहा हूँ यह मैं फिर भी श्रेष्ठ कार्य को कमर कसी

बिना विचारे निज शक्ति से गगन उड़े ना क्या पक्षी॥3॥

–o–

–o–

वैसे तो जिन धर्म प्रभावक तीर्थेश्वर चौबीस हुए

उनमें भी जो हैं विशिष्टतम शान्तिनाथ भगवन्त हुए।

पाते आए पिछले बारह, जन्मों से वैभव भारी

अन्य जनों के वश की ना है, पालें सुख सम्पत सारी॥5॥

–o–

बारह भव पहले थे राजा नाम था जिनका शुभ श्रीषेण

चारणमुनि को अन्नदान के फल की देखो अद्भुत देन।

उत्तर कुरु की भोगभूमि में श्रेष्ठ सुखों के भोग महा

प्रथम स्वर्ग के देव बने जो श्रीप्रभ जिनका नाम अहा॥6॥

–o–

पुण्य भोग कर फिर चय होकर विद्याधर नरराज हुए

सब वैभव से युत होकर भी पात्र दान वर भाव हुए।

जिनवर पूजन शुभ भावों से मरण किया फिर व्रत धरकर

आनत स्वर्ग सुजन्म लिया फिर नाम लिया रवि चूल प्रवर॥7॥

–o–

फिर विदेह की पुण्य धरा पर, जन्म लिया वह जीव सुधी

अपराजित शुभ नाम लिया औ पदवी थी बलभद्र निधि।

संयम निधि को पाकर फिर से मरण समाधि साध लिया

रत्नत्रय बल से वह जीवन अच्युतेन्द्र का पाय जिया॥8॥

–o–

अच्युत स्वर्गी दिव्य सुखों को भोग भोग फिर जन्म लिया

फिर विदेह की पुण्य भूमि पर वज्रायुधचक्रेश हुआ।

बहुत काल चक्री सुख पाकर भोगों का फिर त्याग किया

मरणसमाधि साध साधु वह ग्रैवेयक सुख वरण किया॥9॥

–o–

अहमिन्द्रों का सुख पाकर वह देव स्वर्ग से उतर गया

फिर विदेह की नगरी में वह राजा का कुलपुत्र हुआ।

पुण्य मूर्ति वह नाम मेघरथ इष्ट सभी का मित्र हुआ

अवधिज्ञान युत श्रेष्ठ बुद्धि पा जग भोगों से विरत हुआ॥10॥

–o–

मुनिपन में फिर सोलह कारण, भायभावना भवनाशी

तीर्थंकर शुभनाम कर्म का, बन्ध किया वह अविनाशी।

जगत बन्धु ने जग के हित में भाव किया निज आतम में

अति प्रबुद्ध फिर इन्द्र बना वह, जाग्रत है नित क्षण-क्षण में॥11॥

–o–

सुरललना से रहित चित्तसुख अहमिन्द्रों की पदवी में

पाकर फिर वह जनम लिया था, आर्यखण्ड में भारत में।

कुरु जांगल वह देश कहाता जहाँ हस्तिनापुरी महा

जैसे मध्य देह में नाभि शोभे वैसी नगरि वहाँ॥12॥

–o–

परम धर्म अनुरागी राजा विश्वसेन  का शासन था

नयनों को उत्सवकारी जो प्रिय एरा पर नृप मन था।

शुक्ता में ज्यों नीर बिन्दु गिर मोती जैसी शोभित हो

उसी तरह शुचि गर्भ समाया देव मेघरथ उतर अहो॥13॥

–o–

हुआ देव अवतीर्ण गर्भ जब माता ने सपने देखे

अति पवित्र वह सोलह सपने महा अभ्युदय सूचक थे।

मात उदर अति हल्का निर्मल, ज्ञान वृद्धि को प्राप्त हुआ

अचरज यह था नहीं अन्य का, किन्तु बालशिशु हेतु हुआ॥14॥

–o–

जिनके पुण्य पाक के कारण सभी देव धरती आए

भावन व्यन्तर ज्योतिष सुर भी, वैमानिकसुर भी आए।

प्रमुख बना सौधर्मदेव वह जिसकी आज्ञा सब मानें

गर्भ स्थित बालक की महिमा नर नारी सब ही जानें॥15॥

–o–

पन्द्रह मास निरन्तर देखो रत्नों को है बरसाता

तीन लोक में शान्तिकारक बालक की अद्भुत माता।

इधर गर्भ में शिशु की वृद्धि स्वतः निरन्तर होती है

उधर पुण्य माता की सेवा सुर रमणी से होती है॥16॥

–o–

अखल जगत जिसको लखता है, जो अद्भुत है शंसित हैं

नवमे मास जनमती माता नन्दन से आनन्दित है।

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में प्रातः चौदस की तिथि को

याम्य योग में बालक जनमा लगन बनी शुभ ही सबको॥17॥

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कहीं भेरियां खूब बज रहीं, कहीं सिंह सन्नाद हुआ

घण्टा नाद कहीं गूंजे तो, कहीं शंख गुंजाय हुआ।

तीन ज्ञान धारी जन्मा है तीन लोक का जो जेता

इसीलिए सब देव गृहों में, स्वयं सूचना पहुँची जा॥18॥

–o–

जान जन्म उत्सव की बेला जिन शिशु के फिर देव तभी

मिलकर आए सब को लेकर देव देवियाँ वहाँ सभी।

देवों का वह मुख्य इन्द्र तब ऐरावत गज के ऊपर

नव प्रसूत उस श्रेष्ठ शिशु को बैठाकर बैठा उस पर॥19॥

–o–

महा मेरु पर्वत के ऊपर पाण्डुक शिला उपरि थापा

नीर क्षीर सागर से सींचा भूषण तन पर आरोपा।

तीन काल में तीन जगत में शान्तिप्रदायी बालक है

यही सोचकर इन्द्र दिया तब शान्तिनाथ शुभ नामक है॥20॥

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जो स्वभाव से अति सुन्दर हैं उनको आभूषण से क्या?

जिनने शिव का साधन जाना उन्हें अन्य साधन से क्या?

जो खुद लोक की रक्षा करते उनको लोकपाल से क्या?

लोकाचार सुपालन करना और अर्थ इन्द्रों को क्या॥21॥

–o–

भाग्योदय होने पर जैसे पुण्यवान के मंगल काज

इस धरती पर प्रतिदिन जैसे बढ़ता है वैभव सुख राज।

जैसे रत्नाकर में मणियाँ या मुनि मन में गुण की खान

प्रतिदिन बढ़ते जाते वैसे शान्ति शिशु की बढ़ती शान॥22॥

–o–

जिनकी काया स्वर्ण रचित है मुख मृगांक सा शोभित है

चरण युगल की वर्ण लालिमा पद्म राग सी शोभित है।

चन्द्र सूर्य मृग तोरण केतु, शंख आदि चिन्हों का वास

जिस शरीर में अति चिन्हित हैं महिमा अद्भुत अहो सुवास॥23॥

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चिकने चिकने दो कपोल हैं वक्षस्थल विस्तीर्णरहा

औ ललाट अति उन्नत भासे धवल शुभ्र सा रक्त रहा।

काले मृदु घुंघराले केशों से मस्तक अति विलस रहा

जैसे उन्नत मेरु शिखर हो वैसा शिर भी विकस रहा॥24॥

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कामदेव ही स्वयं पधारा जिनके तन में आकर के

उस शरीर की शुभता काया सुन्दरता में आकर के।

पर वांछित सौन्दर्य सुरभि का अमृत जो रमणीय बना

उसका वर्णन करने जग में नहीं शक्र भी शक्य बना॥25॥

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तथा प्राप्त कैवल्य धाम को, बने महात्मा जो जिन हैं

उन श्रेष्ठों में श्रेष्ठ जिनेश्वर नाम शान्ति ही ना अन हैं॥26॥

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जो सौन्दर्य रूप की नारी राग नदी सी शची बनी

उसमें राग देह मन चेष्टा छोड़ शक्र की दृष्टितनी।

दो आँखों वाला होकर भी सहस आँख से जिन देखे

ऐसे शान्ति देव के तनु की कान्ति वर्णना क्या लेखे॥27॥

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सुख साधन जो दिव्य दिव्य हैं देवेन्द्रों के दिए गए

अपने ही सौभाग्य से पाए पद पदार्थ बहुमूल्य नए।

तथा तात उपलब्ध कराए शुभ सुन्दर नारी का संग

ये सब सुख अद्भुत सब मिलकर युगपत भोग रहे बिन भंग॥28॥

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एक लाख परिमाण वर्ष की, दीर्घ आयु के जो स्वामी

दश चउ धनुष देह है ऊँची, बने हुए हैं जो नामी।

सहस पंचविशति वर्षों का काल कुमार अवस्था का

बीत गया तब राजा होकर हुए सुशोभित पथ नापा॥30॥

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पूर्व जन्म में मन वच तन की शुभचेष्टा के चारित से

पुण्य कर्म की परम्परा जो बांधी गई शुभाश्रित से।

उन्हीं कर्म के उदय फलों में नर अनीति ना कर पाता

करो भव्य जन शुभ कर्मों को शान्तिचरित यह ही गाता॥31॥

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चक्रवर्ति पद वैभव पा भी जो मानी ना हुए कभी

सम्यग्दर्शन से युत होकर शुभ आशय युत रहे सुघी।

रत्न चतुर्दश औ नौ निधियाँ, अति अपार जो वैभव है

स्वयं समागम प्राप्त हुआ है स्वयं पुण्य से संभव है॥32॥

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छत्र दण्ड असि चक्ररत्न तो, आयुधशाला में प्रकटे

चूडामणि औ चर्म काकिणी, गृह में ही सब आ प्रकटे।

सप्त रत्न ये रहे अचेतन, पुण्य योग से पाए हैं

बिन मांगे ही सब कुछ मिलता, कर्म प्रभाव दिखाए हैं॥33॥

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सेनापति गृहपति नर रत्न और पुरोहित स्वयं मिले

रत्न स्थपति भी आकर के नगर हस्तिनापुरी मिले।

कन्या, गज औ अश्व रत्न तो विद्याधर की श्रेणि से

पुण्य कर्म की बलजोरी से मीत बने हैं निज मन से॥34॥

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सहस पंचविंशति वर्षों का राजा बन जब काल गया

रक्षा करते सकल प्रजा की सब सुख से साम्राज्य जिया।

राज्य पट्ट जो दिया पिता ने उसके सुख को भोग लिया

चक्रवर्तियों में फिर पंचम चक्रेश्वर बन राज्य किया॥35॥

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नैसर्पी पिंगलनिधि होती पद्मनाम की निधि भी है

शंख नाम की निधि भी होती पाण्डुक तथा रत्न निधि हैं।

काल माणवक निधि भी जानो महाकाल निधि पहचानो

नव निधियाँ ये नदी मुहाने हों उत्पन्न सुकृत जानो॥36॥

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भोजन दिव्य नगर आसन औ, रत्न सैन्य शय्या भाजन

वाहन नाटक रत्न मिले हैं, इष्ट सकल इन्द्रिय भाजन।

चक्रवर्ति ही इन दशभोगों, का स्वामी इक मात्र बना

शान्तिनाथ भी ऐसे भोगों, का पाए हैं पात्रपना॥37॥

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हुण्डा अवसर्पिणि की घटना, यह अपूर्व ही दिखती है

एक पुरुष में त्रय पदवी की बात निराली मिलती है।

कितने ही सज्जन हैं कहते काल दोष से ऐसा है

किन्तु मानता हूँ मैं इतना पुरुष पुण्य ही ऐसा है॥38॥

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जिनकी छ्यानब सहस रानियां रूपवती सब बढ़कर हैं

रहे हजारों पुत्र पुत्रियाँ मति तन बल में चढ़कर हैं।

सप्त अंग बल को धारण कर चउ विद्या को धार रहे

चक्रवर्ति वह इसी तरह से हम सबको अति मान्य रहे॥40॥

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सज्जा गृह में एक बार वह, देख रहे थे निज तन रूप

दर्पण में प्रतिबिम्ब देख दो, लगे सोचने यह क्या भूप !?

चिन्तन ऐसा करते-करते चित्त हुआ अचरज कारी

भोग देह संसार भाव से मन विरक्ति आई भारी॥41॥

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एक समय जो अतुल बहुत सी भोग सम्पदा निरत रहे

अगले क्षण में क्षण भंगुर लख उन्हीं सुखों से विरत रहे।

इस प्रकार की अति विशिष्ट मति शास्त्रज्ञान युत जीवात्मा

शान्ति जिनेश्वर छोड़ अन्य में क्या संभव है बोधात्मा॥42॥

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वर्ष सहस पच्चीस आयु में निज के जब यूं चले गये

तब ही स्वयं आप जीवन में क्षण में चित्त विरक्त हुए।

जिनके उस वैराग्य भाव की लौकान्तिक के देवों ने

करी प्रशंसा उसकी शंसा, करें आज हम हँसी बने॥43॥

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क्षायिक निर्मल सम्यग्दर्शन ज्ञान सहित आतम वृत्ति

रागयुक्त रहकर फिर क्षण में, बन जाती विराग वृत्ति।

नित्य विभासित जग इक क्षण में अन्य समय में क्षणभंगुर

विविधरूप स्वाभाविक वृत्ति, में कैसे दिखता अन्तर॥44॥

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इक क्षण में जो वनिता रुचि थी हुई अन्यथा वह इस क्षण

इक क्षण में जो ममता मति थी हुई अन्यथा वह इस क्षण।

इक क्षण में ही भव वैतरणी, से मुक्ति का भाव हुआ

श्रद्धा से बढ़कर आतम में आत्म बोध का भाव रहा॥45॥

–o–

कहीं दौड़ती थी जो बुद्धि भोग अधिक रति पाने में

वही दौड़ती है मति उलटी तीव्र विराग सजाने में।

इसीलिए शिव पुरुषारथ में गति प्रयत्न से कही गई

मोक्ष ‘काल’ से माना जिनने उन मति जिनमत दूर हुई॥46॥

–o–

भववर्धन के कारण हेतू वैभवमय भवलक्ष्मी को

छोड़ सहज आराधन करने सौख्यभरित निज लक्ष्मी को।

तीर्थकरों में चक्रवर्ति ने भव चक्कर तजने उद्यम

किया प्रथम वह शान्तिनाथ हैं जीवो छोड़ो तुम भी भ्रम॥47॥

–o–

तभी किया सौधर्मदेव ने फिर प्रभु का दीक्षा अभिषेक

मानो पाप शत्रु के नाशन जिन दीक्षा ही साधन एक।

केशों का लुंचन निज कर से पंचमुष्टि से करके ही

सामायिक चारित्र विशुद्धि सर्वाधिक पा करके ही॥48॥

–o–

उन विशुद्ध परिणामों से ही चौथा ज्ञान प्रसूत हुआ

बढ़ी हुई निज आतम तप की शक्ति से चित् पूत हुआ।

फिर अनेक विध ऋद्धि वैभव से भूषित वह जीव महा

मानो मुक्ति वधू को वरने वर उत्तम तैयार अहा॥49॥

–o–

चक्रायुध को प्रथम मानकर और हजारों राजा भी

अष्ट कर्म के घातन कारण संयम अस्त्र सुधारा जी।

श्री जिन शान्ति महान् तपस्वी के संग वे सब होकर के

श्रेष्ठजनों का इष्ट समागम को ना चाहे बढ़कर के॥50॥

–o–

दो उपवास ग्रहण से जिनने जन्म समय की तिथि में ही

भरणी शुभ नक्षत्र उदित था तब अपराण्ह समय में ही।

दीक्षा ले पारण की प्रभु ने नृप सुमित्र के घर जाकर

पंचाश्चर्य हुए नृपगृह में सुख पाया मुनि को पाकर॥51॥

–o–

पौष मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की थी वह शाम

पूर्व दिशा मुख करके बैठे पल्यङ्कासन योग विराम।

जब छद्मस्थ काल के बीते सोलह वर्ष शुभाशय से

तब पाए कैवल्य प्रभो जी ध्यान शुक्ल शुद्धाश्रय से॥52॥

–o–

ज्ञान विनाशि कर्मों का जब नाश किया तब ज्ञान हुआ

दर्शन आवरणीय घात से दर्शन साथ अनंत हुआ।

सकल मोह विधि नाशन से तो अन्तर्बाह्य असङ्ग हुए

अन्तराय विधि पंच नाश से विघ्न रहित निर्भङ्ग हुए॥53॥

–o–

तीर्थंकर शुभ श्रेष्ठकर्म के महा उदय से क्षोभ हुआ

सभी तरह के देव पधारे सबको केवल बोध हुआ।

उसी समय ही महासभा भी रची गई फिर खेतल में

बारह गण से सहित सभाएं सजी दिख रही दल बल में॥54॥

–o–

केवल बोध हुआ तब पूजा बत्तीसों इन्द्रों ने की

चक्रायुध आदिक गणघर ने महिमा वृद्धि उसमें की।

श्रमण आर्यिका देव देवियां नर से पशुओं से पूजित

धर्म देशना में तत्पर हो विहरण से भू – जन बोधित॥55॥

–o–

मिथ्यादृष्टि विकलत्रय औ जीव असंज्ञी जहाँ नहीं

जो संशय विपरीत भाव में अरु विमोह में पड़े कहीं।

तथा जीव जो भव्य नहीं हैं वे भी दिखते वहाँ नहीं

श्री जिनेन्द्र की महासभा में प्रभु प्रभाव विख्यात वहीं॥56॥

–o–

वृद्ध रहे नारी या होवे या हो बल में बालक जो

पंगु बना हो अंग विकल हो प्रभु पद जाना चाहे जो।

समवसरण को पार करे वो इक अन्तरमुहुरत में ही

इतने में ही वापस आवे प्रभु महिमा के वश से ही॥57॥

–o–

तीन छत्र और चौंसठ चामर दुन्दुभि पुष्पन की वर्षा

दिव्य ध्वनि सिंहासन अद्भुत तरु अशोक भी अति हर्षा।

भामण्डल सह प्रतिहार्य अठ तीन लोक के नायक के

सबसे बढ़ चढ़ शोभित होता लक्ष्मी वैभव जिनवर के॥58॥

–o–

जहाँ विराजे केवलज्ञानी शिक्षक मुनि अरु वादी भी

पूर्व अंग के ज्ञाता मुनिवर अरु निमित्त विज्ञानी भी।

नानाविध विक्रिय ऋद्धि के अवधिज्ञान के धारी भी

सप्त प्रकार बढ़ी ऋषि शोभा, मुनि कोठे में सारी ही॥59॥

–o–

जहाँ नहीं आतंक रोग हैं, मरण नहीं ना कामुकता

जन्म वैर धारक ना होते ना तन में हो भूख व्यथा।

निद्रा तथा पिपासा बाधा नहीं कदापि होती है

जिनवर की महिमा यह सारी मेरे मन को खोती है॥60॥

–o–

–o–

जन्मकाल के दश अतिशय हैं दश ही केवल ज्ञान कहे

तथा चतुर्दश देवों द्वारा किए गए यह ज्ञात रहे।

तीन लोक में विस्मयकारी महिमा युत होकर भी शान्त

ऐसे शान्ति जिनेश्वर मेरे चित्त धाम को कर दें शान्त॥62॥

–o–

सहस कोटि रवि शशि से बढ़कर जिनके तन में तेज बहा

दिवस रात करने वाले फिर रवि शशि से क्या अर्थ रहा।

तेजोमय जितनी सब चीजें मिलकर भी तन की छाया

दिखा सकीं धरती पर ना वे यह विज्ञान बहुत भाया॥63॥

–o–

पौर्वाह्निक मध्यान्ह काल में शाम निशा के मध्य समय

चार बार यूं प्रतिदिन नियमित, लेकर छह छह घड़ी समय।

प्रभु मुख से प्रसरित होती वह दिव्य ध्वनि द्वय कानों में

अमृत की वर्षा कर गिरती तृप्ति दे रही भावों में॥64॥

–o–

कण्ठ ओठ तालु आदि के, कारण बिन ही खिरती है

नीर भरे मेघों की गर्जन, ज्यों नभ में सुन लगती है।

जो इक योजन तक विस्तृत हो सुनने में गंभीर लगे

दृष्टि मोह रिपु नाशनकारी प्रभुवाणी सुन पीर भगे॥65॥

–o–

भाषामय है श्रवण मधुर है हितकारी जिनवाणी है

सकल अक्षरों से युत होकर भी निर अक्षर वाली है।

सत्य और अनुभय वचनों से युक्त योगमय जो भाषा

उसमें हुई समाहित सब ही महाभेद युत लघु भाषा॥66॥

–o–

कुछ विशिष्ट शुभ पुण्य जीव जब, चक्रेश्वर के जैसे हों

या हों प्रमुख इन्द्र या गणधर, प्रश्न पूछ जब लेते हों।

अन्य काल में भी तीर्थंकर, तब भी लेते ध्वनि से बोल

श्री जिन समवसरण में अन्तर रात दिवस का मत तू तोल॥67॥

–o–

श्री जिनवाणी सुनने से ही सिद्ध स्वयं सर्वज्ञपना

नहीं कभी सर्वज्ञदशा का विना राग के विज्ञपना।

दोष समूह विनाशन बिन तो ना विरागता संभवती

दोष रहित जिनदेव हमारे इससे ही सिद्धि होती॥68॥

–o–

क्षुधा तृषा ना जरा मरण ना जन्म रोग से रहित सदा

चिन्ता भय ना अरति मोह ना खेद नहीं निद्रा न कदा।

द्वेष, राग, मद, शोक स्वेद बिन दोष अठारह मुक्त रहे

इन दोषों से मुक्त आत्म ही जिनमत जिनवर गये कहे॥69॥

–o–

चर्म चक्षु से दिखे नहीं जो परमाणु जैसे अति सूक्ष्म

विगत काल में बहु अन्तर से हुए यथा रावण समभूप।

अथवा जो अति दूर तिष्ठते जैसे मेरु कुलाचल हों

एक साथ सब जानें देखें श्री भगवान चराचर को॥70॥

–o–

जो पदार्थ अवगत हैं उनको बिन जाने जो कह देता

वह ज्ञाता कैसे प्रामाणिक माना जाए वृष नेता।

जिस आतम में सूक्ष्मादिक सब सुख से जाने जाते हैं

दशा वहीं सर्वज्ञपने की अरु विरागता गाते हैं॥71॥

–o–

शान्तिनाथ हे भगवन्! तुम ही, शान्त रहे सर्वज्ञ रहे

हर वस्तु की गुण पर्यायों, को जानन में विज्ञ रहे।

पूर्ण लोक अवलोकन में रत, देव! आप प्रतिबोधन से

चित्रित सी सब सभासदों की, थिति मानो सम्मोहन से॥72॥

–o–

हे भगवन् श्री शान्तिनाथजी, आप शान्तिमय ही हो देव

मिथ्या अन्य कुदेवों कृत सब भ्रान्ति नाशती तुमरी सेव।

मोहरूप अन्धासुर का सर तुमने हरा प्रतापी हो

रत्नत्रय का अस्त्र धार अध वध कर भी निष्पापी ही॥73॥

–o–

हे प्रभु भव्यजीव के हित की अब यह वेला आयी है

मुख्य इन्द्र सब देवों के संग नत हो बात बतायी है।

पद विहार श्री जिन का होना यह पद्धति है नियति है

निज कर्तव्य पूर्ति करने को श्रीजिन की भी स्वीकृति है॥74॥

–o–

श्री भगवन् प्रस्थान काल में बजें नगाड़े होता नाद

मानो नित यह कहता है वह व्याप्त दिशा में है संवाद।

विहार करते यहाँ शान्ति जिन मानो यह घोषित करते

बिना विघ्न के आगे हर पल शान्ति रहेगी हित करते॥75॥

–o–

आगे आगे पवनदेव भी धरती धूलि हटा करके

चलते जाते सभी दिशाएं सुरभित पवन बहा कर के।

मेघ कुमार देव भी आगे पृथिवी पर जल सिंचन कर

सेवा करने नियत हुए हैं निज नियोग में निज मति धर॥76॥

–o–

चन्द्र सूर्य दोनों ही आगे धर्म चक्र धर कर चलते

मानो प्रभु प्रताप औ यश की मूर्त पुण्य राशी धरते।

धूप घटों को हाथ लिए वे नाग कुमार सुरेश चलें

लाजा अञ्जलि से बिखराती सुर कन्याएं साथ चलें॥77॥

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कदम जहाँ श्री जिन रखते हैं, वहीं कमल रच जाते दिव्य

नभ तल में पगतल के नीचे दो सौ पच्चीसा अतिनव्य।

श्रेष्ठ भव्य के भाग्य जहाँ पर जिनवर स्वयं ठहर जाते

उसी जगह पर दिव्य सभा में जिन वचनामृत वरषाते॥78॥

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द्रव्यार्थिक नय से तो जग में हर इक द्रव्य की है सत्ता

पर्यायार्थिकनय से दिखती विविधरूप वह परिणमता।

प्रतिवस्तु में स्वाभाविक है द्वयविध परिणति को हे आर्य

दो नय की सीमा के भीतर आप कहे द्वय हेतुक कार्य॥79॥

–o–

स्व स्वभाव से बने लोक में करने को कुछ भी ना है

फिर भी प्रति आतम में दिखती कर्ता बुद्धि करना है।

मोह जनित यह अहंकार ही महादोष चिति में फैला

जैसा देखा चिज्ज्योति में कहा वही ना मन खेला॥80॥

–o–

वस्तु एक ही भेदरूप है जो व्यवहार दृष्टि से है

निश्चय नय से मानी जाती वस्तु अभेदपने से है।

भेद-अभेद धर्मयुत वस्तु एक धर्ममय यदि मानी

तो वह गगन कुसुमवत् सत् ना असत् कहे गुरु की वाणी॥81॥

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पंच अस्तिकायों के साथ द्रव्य काल भी निवस रहा

कर्म धातु चउ औ परमाणु सूक्ष्मवर्गणा अवस कहा।

कर्मों का जीवों में बन्धन प्रति निषेक उदयादि दशा

सूक्ष्म घटित जो हुआ जगत में देखे वह सर्वज्ञ दशा॥82॥

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मन इन्द्रिय से जन्य ज्ञान भी जिनके मत प्रत्यक्ष कहा

वे ज्ञानी हो सकते लेकिन पूर्ण विज्ञता नहीं अहा।

जो आकाश पतित शास्त्रों को मान सनातन उनका बोध

हठ सर्वज्ञ ज्ञान की करते खण्डित करते पूर्ण विबोध॥83॥

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संसारी जीवों के दोनों मतिश्रुतज्ञान परोक्ष रहे

कहने की सामर्थ्य उसी में जिसको सब प्रत्यक्ष रहे।

निज आतम की ज्ञान शक्ति से निखिल वस्तु जो जान रहा

उसी चिदातम में हे भाई! सिद्ध धाम कैवल्य महा॥84॥

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शान्ति जिनेश्वर आप आत्म में जो उत्पन्न हुआ है बोध

वह प्रत्यक्ष उसे मैं जानूँ है परोक्ष यद्यपि मम शोध।

इसका कारण मन्द बोध मम तुमसे ही तो रहा प्रसूत

क्या अरण्य के पशु ना कहते वन राजा शिशु सिंह प्रसूत॥85॥

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अविकारी जिन रूप आपका नहीं अन्य का ऐसा रूप

नहीं जानते धरती पर जो वे धरती पर भार स्वरूप।

बड़े कष्ट की बात आपके यूँ समक्ष होने पर भी

देहधार कर पुनः ग्रहण कर मरते कष्ट धरें दुर्धी॥86॥

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शान्तिनाथ जिनवर के दोनों चरण कमल में नमन करे

नित्य भक्ति से चरण कमल को भव्य स्वयं जो हृदय धरे।

कार्य चित्त शुद्धि का है यह अथवा तन चिन्तन करना

ध्यान लगा के घाति कर्म की घनीभूत शक्ति हरना॥89॥

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उठे हुए अति चन्द्रबिम्ब के जैसा मुख का तेज सदैव

श्रेष्ठ फलों को देने वाले कल्पवृक्ष सम द्वय पद सेव।

ध्यान काल में हृदय थान में मन को ठहराने के हेतु

सभी प्राणियों को तरने को सुलभ रहे ये साधन सेतु॥90॥

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पाप कर्म अनुभाग शक्ति जो घनीभूत हो शैल समान

शान्तिनाथ जिन ध्यान करन से हो जाती है लता समान।

इसी तरह अमृत सम बढ़ता, जाता पुण्य कर्म अनुभाग

स्वर्ग मोक्ष सुख साधन पूरण जिनवर का ही तीव्र प्रभाव॥91॥

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तीर्थ प्रवर्तन काल इस तरह बीत गया पर हित द्वारा

मास मात्र अवशेष रह गया समय आयु का जब प्यारा।

श्री सम्मेदशिखर जा पहुँचे विहर-विहर कर तब जिन ईश

ठहर वहीं पर रोका चंचल योगों का भी कार्य मुनीश॥92॥

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ज्येष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की चौदस की रजनी का काल

आस्रव कारण योग रोक कर निश्चल आत्मा हुआ निहाल।

कर तृतीय तब शुक्लध्यान को हो अयोगि चौथा कर ध्यान

लोक अग्र पर वास किया था ज्ञान शरीरी मात्र वितान॥93॥

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जो अतीत काल में पहले सिद्ध वहाँ पर संस्थित हैं

अब अनन्त काल तक उनकी संगति पाए निश्चित है।

चार निकाय देव आ पहुँचे तभी साथ लेकर मुख्येन्द्र

पूर्ण करी निर्वाण काल की विधि लौटे निज नाक सुरेन्द्र॥94॥

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चक्रायुध आदिक गणधर तव नौ हजार संख्या मुनिराज

शान्ति प्रभु के साथ सभी ही गए मुक्ति में बहुऋषिराज।

निज पुरुषार्थ यथाविधि करके तदनुरूप की क्रिया विशाल

बुद्धिमान वह कौन पुरुष जो सत्संगति की छोड़े ढाल॥95॥

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चक्रायुध भी दशभव से जिन संगति को पाते आए

सहचरता के कारण से ही गणधर बन शिव सुख पाए।

सङ्ग रहित मुनि भी करते जब श्रेष्ठजनों की संगति को

सुखदायी फिर आर्य समागम क्यों न करो तुम धीमन् हो॥96॥

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तीन लोक के अग्र भाग की अन्तिम सीमा तक जाकर

सिद्ध जीव सब रुक जाते हैं शक्ति अनन्ता भी पाकर।

अस्तिकाय जो धर्म द्रव्य है वह आगे ना गमन अतः

इस निमित्त से ही सिद्धों की स्थिति नैमित्तिक कही ततः॥97॥

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कर्म अष्ट मल मूल नाश कर आतम में आतमगुण पा

सम्यग्दर्शन ज्ञान क्षायिके सूक्ष्मादिक अठ गुण को पा।

परमबोध औ धाम समाधि सिद्ध देव उनको देवें

बुद्धिमान जो निज हित चाहें नित संस्तुति करते सेवें॥98॥

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हे निज आतम के अनुरागी हे भवशून्य महा अनुभाव

हे विरक्त्त मन पंचेन्द्रिय से गुण आसक्त सहज निजभाव।

सिद्धों के जो आठ भाव हैं लीन उसी सुख दुख से दूर

सुख शान्ति के एक निकेतन है नमोSस्तु प्रभु को भरपूर॥100॥

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मोक्षमार्ग की पद्धति जो भी श्री जिन मुख से ज्ञात हुई

वह आगे निर्दोष रूप से बिन बाधा ही प्राप्त हुई।

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धन वैभव का अर्जन करना शिक्षा शादी आयोजन

मन वच तन की क्रिया तथा गृह या दुकान का निर्मापन।

धर्म, अर्थ पुरुषार्थ काम का जो प्रयास देखा जाता

बिना गन्ध के कास कुसुम सम व्यर्थ शान्ति बिन है भाता॥102॥

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लौकिकता से साध्य कार्य जो उसमें निज मन के सुख का

और शान्ति का लक्ष्य रखो तुम कहना शान्ति जिनेश्वर का।

निज कर्मों की महापाप की शान्ति का रखकर तुम लक्ष्य

आतम हित में पारलौकिकी विधि अपनाओ नित हे भव्य॥103॥

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क्रोधादिक दुर्भाव शमन कर वध हिंसा से रहना दूर

क्षेत्र धान्य धन वस्तु अन्य की, उसकी चोरी बड़ा कसूर।

मर्यादित औ भक्ष्य रहा जो वह ही भोजन पान करो

शान्ति मार्ग अनुसार चलन से हित आतम का नित्य धरो॥104॥

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शीघ्र चक्र संसृति का हन कर धर्म चक्रवर्ती होते

कर्म चक्र पर चक्र विजय कर मोक्ष थान स्वामी होते॥106॥

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कर्मचक्र परचक्र बना है जिसकी सेना नीच खड़ी

मोह महा बलवान बना है राजा सेना लिए बड़ी।

आप अनादि मोह शत्रु को निर्दय होकर नष्ट किए

निज आतम निज चक्र गुणों की वैभव लक्ष्मी प्राप्त किए॥107॥

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है विशाल पर्वतसम तन तो अतुलनीय शोभा वाला

अतुलवीर्य युत शुभ लक्षण युत तप्त स्वर्ण आभा वाला।

ऐसे तन को सर्प कांचली, सम तज कर जो बने निरीह

शान्तिनाथ मुनिश्रेष्ठ देव को सतत नमन करता बिन ईह॥108॥

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नेत्र युगल निष्पन्दन बिन हैं फिर भी सब कुछ देख रहे

बाह्य पदारथ बोध विमुख होने पर भी सर्वज्ञ रहे।

द्रव्येन्द्रिय के अल्प सुखों से शून्य रहे पर तुष्ट रहे

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमन बहुवार रहे॥109॥

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सिद्धालय में बहुत दूर तक जाकर के भी आप सदैव

सन्मुख हैं उन भव्य जीव को अपने निकट बुलाते एव।

करुणा भाव रहित होकर भी दया स्वभाव निजातम में

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमन करता हूँ मैं॥110॥

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सूक्ष्म और अवगाहन गुण से बाधित ना जो होते हैं

ना बाधा पहुँचाते अन को जो योगी निरपेक्षित हैं।

जो छोटे ना बड़े किसी से आत्म भाव सबका सम है

शान्तिनाथ मुनिवर को नित मैं सतत नमन करता शम है॥111॥

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इस धरती पर सभी सार में सार रहा निज का चिन्तन

शुद्ध पारिणामिक से होता जीव जीव में नित मन्थन।

जिनने हमें सिखाया करना अध्यातम का मनन यहाँ

ऐसे जिनवर शान्तिनाथ को सतत नमन करता है जहाँ॥112॥

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आत्मप्रदेशों में निबद्ध हैं अति गाढे निश्चेतन कर्म

विविध भेद युत कर्म धूलि को धोने का जो जाने धर्म।

निज आतम की गाढ रुचि से धोकर कर्म हुए जो मुक्त

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमन करता आसक्त॥113॥

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मूल और उत्तर कर्मों के कारण भूत बने जो भाव

वे दुर्बुद्धि असत् ध्यान से योग कषायों को कर चाव।

निज में निज पुरुषार्थ अस्त्र की शुद्धि से सब जीत लिए

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमन मन प्रीत लिए॥114॥

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कारज यह मैंने कर पाया मैं ही इसे करूँगा और

अन्य नहीं कोई भी रखता करने की शक्ति मद जोर।

जो मदान्ध का कारण है वह कर्ता मूलक भाव विनाश

करके पाए शान्ति शान्तिजिन को नित नमूँ हरो भव पाश॥115॥

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मैं ही कर्ता कार्य करन का इस वैभव का मैं भोक्ता

स्वामी भी मैं ही हूँ इसका, भव वर्धन कारण होता।

जो परमार्थ मुख्य ध्यान से निज से निज विधि नाश किए

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमन का भाव लिए॥116॥

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देह जनित जो दुःख सुखों को रोग वियोग दशाओं को

राग मोह के कारण उनको माने निज विपदाओं को।

इस मिथ्यात्व परिग्रह से ही रहित होय शम प्राप्त किए

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमन हम आज किए॥117॥

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राजा होने पर समाज की रक्षा में नित दान कुशल

यतिपति होने पर करुणा की सूक्ष्म जन्तु जो हैं दुर्बल।

अर्हत् पद पर संस्थित हो के जगती के उद्धारक जो

शान्तिनाथ उन मुनिवर जी को सतत नमूँ भवतारक जो॥118॥

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नित प्रति मंगल करने को जो जिनवर शंसा करते हैं

जो रुचि से पूजन विधान को करके संस्तुति पढ़ते हैं।

निज आतम उन्नति की श्रेणी पर जल्दी ही चढ़ करके

मुक्ति श्रेष्ठ वधु का मुख निश्चित वह देखे पहले बढ़ के॥120॥

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