साहित्यिक विशेषताएं एवं जैन आगम के लिए अभूतपूर्व योगदान

           आपकी रूचि सदा ही ज्ञान के अर्जन, स्वाध्याय, अध्ययन ग्रंथों के पठन, चिंतन, मनन में रहती है। उसी का परिणाम है कि आप अपने अंदर ज्ञान का विशाल सागर समाये हुए हैं। आपके ज्ञान की पराकाष्ठा के कारण ही आपको अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, वर्तमान में श्रुत केवली, सरस्वती पुत्र, जैन दर्शन के परम ज्ञाता आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता है।

अद्भुत गहन और विस्तृत ज्ञान

            आप संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, अंग्रेजी, कन्नड़ आदि भाषाओं के ज्ञाता हैं। संस्कृत, प्राकृत, हिंदी में आपने 80 से भी ज्यादा ग्रंथों एवं कृतियों का सृजन किया।  युवाओं के मार्गदर्शन और सही दिशा बोध के लिए अंग्रेजी भाषा में भी आपने अनेक पुस्तकें लिखी।

            पर्वतों के शिखरों से निकलकर जैसे अनेक नदियां सागर में मिल जाती हैं, वैसे ही आपके उच्च कोटि के चिंतन, मनन,  विचार और विशुद्ध भावों के उच्च शिखर से संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, अंग्रेजी भाषाओं के ज्ञान व लेखन की नदियां निकलती हुई, आपके ज्ञान के सागर में समाती रहती हैं। आपके ज्ञान के अथाह सागर में इन नदियों का संगम हुआ तो उस सागर से रत्नों के रूप में अनेक बहुमूल्य, अनमोल ग्रंथों और कृतियों की प्राप्ति जिनागम को हुई।

            आपने जिनागम साहित्य सर्जन में अभूतपूर्व योगदान करते हुए अनेक ग्रंथों का लेखन, टीका, अनुवाद एवं संपादन किया। आज भी योगदान का यह कार्य निरंतर चल रहा है, जिनागम को समृद्ध बना रहा है और उसे विविधताओं से भर रहा है।

जैनआगम में सर्वप्रथम और बहुमूल्य योगदान

            आप निरंतर ज्ञान, अध्ययन, स्वाध्याय और लेखन में व्यस्त रहते हैं। अनेक प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते हुए आपने जैन आगम साहित्य में अनेक ग्रन्थों की टीकाओं व अनुवाद की कमी का अनुभव किया तो आपने अपनी लेखनी से अनेक टीकाओं एवं अनुवाद ग्रंथों की रचना करके इस अभाव की पूर्ति की।

            जैन आगम के इतिहास में लंबे समय के बाद अनेक टीकाओं, अनुवाद ग्रंथों का सृजन प्रथम बार आपकी लेखनी से ही हुआ। इन टीकाओं एवं ग्रंथो का विवरण इस प्रकार है –

(1) बारसाणुवेक्खा ग्रंथ पर प्रथम संस्कृत टीका —

बारसाणुवेक्खा ग्रंथ पर परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने संस्कृत में कादम्बिनी टीका की रचना की। इस ग्रंथ पर इससे पहले कोई संस्कृत टीका उपलब्ध नहीं थी। कादम्बिनी टीका इस ग्रंथ की प्रथम और सर्वश्रेष्ठ टीका है।

(2) तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ पर प्रथम संस्कृत-प्राकृत टीका —

तत्वार्थ सूत्र गन्थ पर पूज्य मुनि श्री ने तत्वसंदीपनी टीका लिखी। यह टीका संस्कृत-प्राकृत दोनों भाषाओं का प्रयोग करके सृजित की गई है। वर्तमान में उपलब्ध साहित्य में आचार्य श्री वीरसेन जी  महाराज की धवला टीका में ही दोनों भाषाओं का ऐसा प्रयोग मिलता है। भगवान महावीर की दीर्घकालीन परंपरा में तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ पर संस्कृत-प्राकृत  दोनों भाषाओं का प्रयोग कर सृजित की गई यह प्रथम टीका है।

(3) अष्टपाहुड 1-6 पर प्रथम प्राकृत टीका —

पूज्य मुनि श्री ने आचार्य श्री कुंदकुंद देव महाराज के द्वारा रचित निम्नलिखित पाहुड पर प्राकृत भाषा में प्रथम टीका लिखी —

  1. दर्शनपाहुड पर  प्रथम प्राकृत टीका   – नन्दिनी टीका
  2. चारित्रपाहुड पर प्रथम प्राकृत टीका – नन्दिनी टीका
  3. सुत्तपाहुड पर प्रथम  प्राकृत टीका     – नन्दिनी टीका
  4. बोध पाहुड पर प्रथम प्राकृत टीका  – नन्दिनी टीका
  5. भावपाहुड पर प्रथम प्राकृत टीका    – नन्दिनी टीका
  6. मोक्खपाहुड पर प्रथम प्राकृत टीका – नन्दिनी टीका
(4) धम्मकहा – प्राकृत साहित्य में दिगंबर जैन कथाओं का गद्य शैली में रचित प्रथम ग्रंथ —

धम्मकहा ग्रंथ में पूज्य मुनि श्री ने धर्म के फल का वर्णन करने वाली और वैराग्य उत्पन्न करने वाली कथाओं को समाहित किया है। प्राकृत कथाओं के साथ ही उनका हिन्दी में अनुवाद भी किया है। जिससे सभी पाठकगण कथाओं को सरलता से समझ सकें।

(5) सत्य शासन परीक्षा ग्रंथ का प्रथम हिंदी अनुवाद —

इस प्राचीन ग्रंथ को सरलता से समझा जा सके इसके लिए पूज्य मुनि श्री ने सर्वप्रथम इस ग्रंथ का हिंदी अनुवाद किया।

(6) नाममाला (भाष्य) कृति का प्रथम हिंदी अनुवाद —

इस कृति का हिंदी अनुवाद भी सर्वप्रथम पूज्य मुनि श्री ने ही  किया।

(7) प्रतिक्रमण ग्रन्थत्रयी की प्रथम हिंदी टीका —

प्रतिक्रमण ग्रन्थत्रयी की कोई हिन्दी टीका उपलब्ध नही थी। पूज्य मुनि श्री ने इस पर सर्वप्रथम हिन्दी टीका लिखकर इस अभाव को दूर किया।

(8) अनासक्त महायोगी – किसी आचार्य भगवंत के जीवन चरित्र पर संस्कृत- प्राकृत दोनों भाषाओं में लिखा गया प्रथम चंपू महाकाव्य —

इस महाकाव्य में संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं का प्रयोग किया है। 747 संस्कृत-प्राकृत छंदों का प्रयोग करके आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन चरित्र का सुंदर चित्रण इस महाकाव्य में किया गया है। पूज्य मुनि  श्री ने गुणों का वर्णन व गुरु का 108 नाम से शताष्ट स्त्रोत लिखकर अनुपम गुरुभक्ति एवं श्रद्धा भाव व्यक्त किये हैं।

(9) तित्थयर भावना – प्राकृत भाषा में सोलह करण भावनाओं पर रचित स्वतंत्र कृति—

यह सोलहकारण भावनाओं पर प्राकृत भाषा में लिखा गया महान ग्रंथ है। प्राकृत भाषा में सोलहकारण भावनाओं पर स्वतंत्र कृति की कमी को इस ग्रंथ ने पूरा किया।

अन्य बहुचर्चित और प्रसिद्ध कृतियां

(1) वर्धमान स्तोत्र

भगवान महावीर की स्तुति और भक्ति में रचित आधुनिक समय का यह अद्धितीय और अभूतपूर्व संस्कृत काव्य है। ये स्तोत्र भक्तामर स्तोत्र और कल्याण मंदिर स्तोत्र की तरह ही चर्चित, सर्वप्रिय और प्रसिद्ध है और यह भी संयोग है कि यह स्तोत्र भी भक्तामर स्तोत्र और कल्याण मंदिर स्तोत्र की तरह मालवा भूमि पर  ही लिखा गया है।

(2) स्तुति पथ

संस्कृत भाषा में  पूज्य पुरुषों के ऊपर लिखी गई भक्ति भाव से भरपूर, हृदय स्पर्शी स्तुतियाँ, अष्टक और पूजन इस कृति को अनुपम बना देते हैं।

(3) सात संस्कृत शतक —
  1. उपयोग शतकम 
  2. अर्हं अष्टांग योग शतकम
  3.  स्तुति शतकम (चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी महाराज की स्तुति) 
  4. श्री शांतिनाथ स्तुतिशतकम
  5. गोवैभव शतकम
  6. श्रायस पथ ( शतक द्वय – दोहरा शतक)

            इनमें से उपयोग शतकम, शान्तिनाथ स्तुतिशतकम और गोवैभव शतकम का हिंदी पद्य में भी अनुवाद किया गया है।  ये तीनों शतक संस्कृत शतक के साथ साथ हिंदी शतक भी हैं।

(4) परीक्षा मुख  हिंदी अनुवाद —

परीक्षा मुख विशिष्ट और महत्वपूर्ण न्याय ग्रन्थ है। पूज्य मुनि श्री ने इसका हिंदी अनुवाद करके इस को सरल रूप में उपलब्ध कराया है।

(5) कल्याण मंदिर स्तोत्र का हिंदी पद्यानुवाद —

प्रसिद्ध स्तोत्र कल्याण मंदिर स्तोत्र का हिंदी पद्य में अनुवाद करके विधान के रूप में भक्ति भाव से भरपूर अनूठी नई रचना की गई है।

(6) अर्हं दोहावली —

112 हिन्दी दोहों से रचित यह प्रभावी कृति है। इन दोहों में मन, चेतन, लेश्याओं, निजस्वरूप आदि का सुन्दर वर्णन किया गया है।

(7) लहर पर लहर —

यह 106 लघु कविताओं का संग्रह है। ये हृदय स्पर्शी लघु कवितायें अध्यात्मिक और संसारिक जगत के विविध विषयों और भावों पर आधारित हैं।

(8) महामह नंदीश्वर विधान —

यह चारों अनुयोगों के वर्णन के साथ एक नए तरह का अद्भुत, अभूतपूर्व विधान है, जिसमें ज्ञान भी है, स्वाध्याय भी है, भक्ति भी है, विधान भी है और पूजा व मंत्रों का संगम भी है।

(9) युवा पीढ़ी के लिए पौराणिक-ऐतिहासिक जीवन चारित्र —
  1. जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
  2. युग दृष्टा — भगवान ऋषभदेव के जीवन चरित्र पर आधारित कृति
  3. लक्ष्य — जीवंधर चरित्र पर कृति 
(10) खोजो मत पाओ —

लाइफ मैनेजमेंट पर भगवान महावीर के सिद्धांतों के आधार पर लिखी गई सरल, रोचक और चर्चित कृति।

(11) दार्शनिक प्रतिक्रमण —

श्रावकों के लिए लिखित सरल प्रतिक्रमण है। यह प्रतिक्रमण पूज्य मुनि श्री का श्रावकों के लिये महान उपकार है। इस प्रतिक्रमण के अभ्यास से श्रावक में अपनी गलतियों का प्रायश्चित करने के संस्कार आते हैं।

कवि हृदय संत कुशल काव्य शिल्पी

            आप बहुभाषा विद, लेखक, चिंतक ही नहीं; कुशल काव्य शिल्पी, महान दार्शनिक कवि भी हैं। जितना अद्भुत आपका गद्य लेखन है वैसा ही  अद्धितीय आपका पद्य लेखन भी है। आपके अथाह ज्ञान के सागर और हृदय पटल से उठने वाले भावों, विचारों की लहरें जब आपकी लेखनी के माध्यम से प्रतिबिम्बित हुई तो पाठकगण मंत्रमुग्ध हो उठे।

            संस्कृत भाषा आपका स्कूल, कॉलेज के पाठयक्रम में विषय नहीं थी फिर भी आपने संस्कृत भाषा और व्याकरण का स्वयं कठिन अभ्यास और परिश्रम से ज्ञान प्राप्त किया। आज  संस्कृत भाषा के आप प्रकाण्ड विद्धान और कवि हैं। जब आपकी लेखनी से संस्कृत भाषा के छंद, पद्य, श्लोक, स्तुतियाँ, भक्ति, अष्टक, पूजन रचित होते हैं तो बड़े-बड़े विद्वान भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं।

            इतना ही नहीं संस्कृत के सात शतक भी आपने लिखें। प्राय: देखा जाता है, लेखन कार्य के लिए लेखक को एकान्त की जरूरत होती है और आप तो संस्कृत के श्लोक श्रावकों से घिरे रहकर भी लिखते रहते हैं। श्रावकों के किसी प्रश्न का जवाब भी देते हैं, उनसे धार्मिक चर्चा भी करते हैं और एकाग्रता से लिखते भी जाते हैं। इस तरह की अनूठी क्षमता, कौशल विशेषता जो आपमें दिखती है, अन्यत्र बहुत ही दुर्लभ दिखती है। ऐसी अनोखी प्रतिभा को देखकर कोई भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पाता।

            संस्कृत भाषा में आपका काव्य अद्भुत है। प्रार्थना, पूज्य पुरुषों की स्तुति में लिखे गए अष्टक, स्तोत्र पाठकों को भक्ति रस में सराबोर कर देते हैं और भाव विशुद्धि का कारण बनते हैं। 

            आपके कवि हृदय से प्राकृत गाथाएं भी प्रवाहित हुईं। गोम्मटेस पंडिमा भत्ती,  गोमटेश भत्ती,  चौबीस तीर्थंकर भक्ति, ध्वज गीत, जिनवाणी स्तुति आदि को सुनकर जिसको प्राकृत भाषा न आती हो वह भी आनंदित हुए बिना नही रहता।

            हिंदी के तो आप कवि सम्राट हैं। हिंदी काव्य में आपने कल्याण मंदिर स्तोत्र, वर्धमान स्तोत्र, मंगलाष्टक, अभिषेक पाठ, अनेक अन्य स्तोत्र और ग्रंथों के हिन्दी पद्य में अनुवाद किए। इतना ही नहीं, अनेक विधान सुंदर भजन, गीत, गजल, स्तुतियां, चालीसा, पूजन भक्ति की भी रचना की। इन काव्य के पदों में भक्ति, अध्यात्म,  ज्ञान सभी कुछ गागर में सागर की तरह भरा पड़ा है। 100 के लगभग हाइकू (जापानी छन्द) भी आपने लिखे जो कम शब्दों में ही गहरी और सार्थक बात कह देते हैं।

            संस्कृत, हिंदी,  प्राकृत के कवि तो आप हैं ही, अंग्रेजी में भी आपने I Love My Soul, Twelve Contemplation कविता लिखीं, जो युवाओं को आकर्षित करती हैं और कम शब्दों में जीवन की सच्चाई और वास्तविकता से उनका परिचय करा देती हैं।