व्यक्तित्व एवं नया दृष्टिकोण

चुम्बकीय आकर्षक व्यक्तित्व

            आपका व्यक्तित्व इतना प्रभावी और चुम्बकीय है कि जो एक बार आपके दर्शन कर लेता है, वह बार-बार आपके दर्शन करना चाहता है। आपके सानिध्य में बैठकर वहाँ से जाने का मन ही नही करता। केशलोंच के बाद तो आप साक्षात भगवान जैसे नजर आते हैं और भक्तों की दृष्टि एक क्षण के लिए भी आप के दर्शन से इधर-उधर नहीं होती, आपके दर्शन से ऐसा आनन्द अनुभव होता है। 

सरल स्वभाव

            आपका सरल स्वभाव सभी को आकर्षित कर लेता है। आपकी मधुर वाणी और आप के मुख पर प्रतिपल खिली हुई मुस्कान किसी को भी प्रसन्न बना देती है और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।

मितभाषी एवं करुणामय

            आपका हृदय दया, करुणा और वात्सल्य से भरा रहता है। आप सभी का ध्यान रखते हैं। आप मितभाषी हैं, पर कम शब्दों में बहुत कुछ समझा देते हैं। आप मनोवैज्ञानिक की तरह सभी आयु वर्ग के लोगों की मनोस्थिति समझकर उनका मार्गदर्शन करते हैं।

दूरदर्शी व साहसी

            आप दूरदर्शी भी हैं और साहसी भी हैं। कभी कभी प्रवचनों के माध्यम से समाज और श्रावक के जीवन में पनपी हुई गलत परम्पराओं और बुराइयों को बहुत ही साहसिक ढंग से दर्शा देते हैं और समाज को सुधार के लिये प्रेरित कर देते हैं। आप नई सोच के साथ निरंतर नये नये कार्यों और योजनाओं के लिए भी प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं।

कठोर तप साधना

            पंचम काल में भी आप चतुर्थ कालीन मुनिचर्या का पूरी दृढ़ता के साथ पालन करते हैं। अनेक तरह के उपसर्गों व परीषहों   को शांत भाव से सह जाते हैं। आपकी समता, सहिष्णुता, सरलता, वीतरागी छवि सभी के हृदय में बस जाती है।

नए तरह के प्रवचन

            आपके ज्ञान के अपार भंडार से निकलने वाले आप के प्रवचन एक अलग तरह की अनूठी विशेषता लिए होते हैं। आपने जैनागम के महान, विशिष्ट आध्यात्मिक ग्रंथों के ऊपर प्रवचनों की श्रंखला प्रारम्भ की। बारसाणुवेक्खा, तत्वार्थ सूत्र, समाधि तंत्र, इष्टोपदेश, श्रायस पथ, द्रव्य संग्रह, प्रवचनसार,  वर्धमान स्तोत्र,  ज्ञानार्णव आदि प्राचीन और महान ग्रंथों पर आपने ज्ञान की अविरल गंगा को बहाते हुए प्रवचन दिए।

प्रवचनों का जनमानस पर प्रभाव

            प्रवचनों की ये श्रृंखला जनसमुदाय पर आपका एक परम उपकार है। इन महान ग्रंथों पर हुए आपके प्रभावशाली, सरल, धर्म के मर्म को समझाने वाले प्रवचनों से जन समुदाय को अनेक लाभ हुए —

  1. जिन ग्रंथों को समझने में उनको मुश्किल होती थी उनको वे सरलता से समझने लगे।
  2. उनके जिनागम से संबंधित ज्ञान में वृद्धि हुई।
  3. प्रवचन के साथ-साथ उनका स्वाध्याय भी हो गया और ज्ञान पिपासुओं के लिए तो ज्ञान अमृत की वर्षा ही हो गई।
  4. इन प्रवचनों को सुनकर श्रावक जन के अधूरे और भ्रमित  ज्ञान को सही दिशा भी मिली ।
  5. ग्रंथो के बारे में सही ज्ञान होने से उनमें आत्मविश्वास बढ़ा और जिनागम के प्रति श्रद्धा और रुचि में भी वृद्धि हुई।
व्यापक जन समुदाय को महान ग्रन्थों का ज्ञान

            आप के नए तरह के प्रवचनों की तरफ जनसमुदाय तेजी से आकर्षित हुआ। पारस, जिनवाणी चैनल, यूट्यूब से प्रवचनों का प्रसारण शुरू हुआ तो उनका प्रतिदिन बेसब्री से इंतजार होने लगा। एक समय में जहाँ गुरुजन कुछ ही श्रावकों को ग्रंथों का अध्ययन करा पाते थे, वहीं आपने इन नए तरह के प्रभावशाली प्रवचनों के माध्यम से पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में बैठे श्रावक जन को भी प्राचीन ग्रंथों का ज्ञान और अध्ययन करा दिया। ऐसा महान उपकार और अतिशय आप के प्रवचनों का रहा।

अनोखी प्रवचन शैली

            ज्ञान का अपार भण्डार,  प्रवचनों की विषय वस्तु के साथ, उस ज्ञान और विषय वस्तु को जन-जन तक पहुंचाने वाली आपकी प्रवचन शैली अद्धितीय है। आपकी सरल, सहज, बोधगम्य भाषा और प्रवचन शैली श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

            माता जैसे नीरस भोजन को अनेक तरह की भोज्य सामग्री प्रयोग करके स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर बना देती है। कुशल शिक्षक जैसे कठिन विषय को अनेक तरह की शिक्षण सामग्री प्रयोग कर रुचिकर बना देता है। वैसे ही आप अपनी अनोखी प्रवचन शैली से कठिन विषय को इतना स्पष्ट और सरल बना देते हैं कि श्रोता के मन, मस्तिक में वह विषय स्थायी रूप से अपनी जगह बना लेता है, अंकित हो जाता है और उसके चिंतन मनन में आने लगता है।

            बहुत से विषय तो श्रावकजन अनेक बार पढ़ चुके होते हैं पर जब उन विषयों  को आपकी प्रवचन शैली में सुनते हैं तो उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि अभी तक तो इस विषय का बहुत कम ज्ञान था, वास्तविक ज्ञान तो अब हुआ ।

            उदाहरण के लिए  ज्ञाणार्नव ग्रन्थराज पर प्रवचन श्रखंला के समय आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान आदि विषयों पर आप के प्रवचन और आपकी प्रवचन शैली ने  श्रोताओं की जैसे आंख ही खोल दी उनके मन को झकझोर कर रख दिया और उन्हें अपना analysis करने पर मजबूर कर दिया।

व्यापक जन समुदाय को महान ग्रन्थों का ज्ञान

            आपकी प्रवचन शैली वैज्ञानिक है जो एक सिस्टम से आगे बढ़ती है। एक सीढ़ी की तरह व्यक्ति के आध्यात्मिक ज्ञान को नीचे से उच्च स्तर की ओर ले जाती है। यही नहीं, आपकी प्रवचन शैली मनोवैज्ञानिक भी है क्योंकि श्रावकजन के ज्ञान के स्तर और मनोस्थिति को देखकर ही आप प्रवचन की विषय वस्तु को आगे बढ़ाते हैं और उसे रुचिकर बना देते हैं। यही कारण है जन समुदाय निरंतर आपके प्रवचनों को सुनने को लालायित रहता है और उनको सुनकर अपने को धन्य मानता है।

अनोखी प्रवचन शैली

            आपके व्यक्तित्व में अनेक तरह की प्रतिभाओं का संगम स्पष्ट झलकता है। आपके द्वारा रचित काव्य ने जहां एक ओर जिनागम की बगिया को विविधताओं से भर दिया है, वहीं दूसरी ओर जब आप की मधुर वाणी में आपके ही द्वारा रचित भजन, स्तोत्र, स्तुतियां, पद्य, श्लोक, गाथाएं आदि श्रोता गण सुनते हैं तो वे मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और उनका मन पुष्प की तरह खिल उठता है। आपकी वाणी आवाज कानों में ऐसा रस घोल देती है कि रसना इन्द्रिय के सभी रस भी उसके सामने फीके हो जाते हैं।

            संगीत को Healing का एक माध्यम माना जाता है। आपकी मधुर, मीठी, कर्णप्रिय आवाज में भजन, स्तोत्र आदि काव्य सुनकर उपस्थित श्रोतागण ऐसी healing और आनन्द1514 का अनुभव करते हैं कि किसी वाद्ययंत्र वाले संगीत में भी फिर उन्हें ऐसा आनन्द नहीं आता।  किसी वन में बांसुरी की आवाज भी इतनी मोहक नहीं लगती, जितनी भरी सभा में आपकी आवाज में काव्य रचना को सुनना मोहक, आनंददायक, मधुर और कर्णप्रिय लगता है।

            आपकी यह बेजोड़ प्रतिभा और उसके साथ आपके त्याग, तप, संयम एवं आत्म विशुद्धि के संयोग का ही यह प्रभाव है कि आपकी मधुर वाणी में एक बार किसी काव्य को सुनकर, उसको  सुनते जाने का ही मन करता है। आपकी आवाज का जादू ऐसा चलता है कि उससे श्रोतागण न केवल आनंद, शांति का अनुभव करते हैं बल्कि भक्ति रस में मग्न होने से उनके भावों में भी विशुद्धि बढ़ती है। 

नई सोच, नया चिंतन, नए विचार

            आप अद्भुत प्रतिभा के धनी हैं। आपके अंदर निरंतर नए विचारों व चिंतन का प्रवाह चलता रहता है। अपने इन नए विचारों के कारण ही आपने मानवता के परोपकार के लिये भी नए नए उपायों के बारे में सोचा और उनको कार्यरूप दिया।

            भगवान ने जैसे भक्तों को स्वयं भगवान बनने का रास्ता दिखाया, वैसे ही आप भी सामान्य श्रावक जन को संयम मार्ग पर आगे बढ़ने का रास्ता निरन्तर दिखाते हैं। श्रावक का मनुष्य जन्म वास्तव में तभी सफल होता है, जब वह अपने अस्तित्व की पहचान कर सके, बाह्य जगत से कुछ समय निकालकर आत्मा के अन्तरंग जगत में भी आ सके। आज के समय में श्रावक इस आध्यात्मिक ज्ञान से अनभिज्ञ रहता है और उस ज्ञान का कैसे प्रयोग करें यह भी नहीं जान पाता।

            आपने  इस समस्या को समझा। कभी अपने साहित्य के माध्यम से, कभी ध्यान और कभी प्रवचनों के माध्यम से सामान्य जन को वह ज्ञान दिया, वे उपाय समझाए कि वे भी अपने आध्यात्मिक स्तर को ऊंचा बना सकें, अपनी आत्मा को विशुद्ध बनाने के लिए प्रयास करना सीख सकें और बहिरात्मा से अन्तरात्मा बनने के मार्ग पर अग्रसर हो सकें।

         तीर्थंकर भगवान समान आपका यह अभूतपूर्व, महान उपकार है। इस तरह के उपकार दुर्लभ होते हैं और बहुत कम देखने को मिलते हैं।