अनासक्त महायोगी, संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज

                                                                      संक्षिप्त जीवन परिचय

पूर्व नाम : विद्याधर अष्टगे
जन्म : 10  अक्टूबर 1946 ( शरद पूर्णिमा)
जन्म स्थान : सदलगा जिला बेलगाँव (कर्नाटक)
पिता : श्री मल्लप्पा जी अष्टगे
    (समाधिस्थ 108 मुनि श्री मल्लिसागर जी महाराज) 
माता : श्रीमती जी अष्टगे
    (समाधिस्थ आर्यिका श्री समय मति जी)
मातृभाषा : कन्नड़
शिक्षा : हाई स्कूल (कन्नड़ माध्यम से नवमी कक्षा)
ब्रह्मचर्य व्रत : 1967 में, आचार्य देशभूषण जी महाराज से
मुनि दीक्षा : 30 जून, 1968 ,आषाढ़ शुक्ल पंचमी,अजमेर (राजस्थान ) में                                 
दीक्षा गुरू : आचार्य प्रवर ज्ञानसागर जी महाराज
आचार्य पद : 22 नवम्बर,1972, मार्गशीष कृष्णा दोज ,नसीराबाद,
    अजमेर (राजस्थान) में
कृतित्व : मूकमाटी महाकाव्य, काव्य-संग्रह, हिंदी-संस्कृत शतक
    संग्रह, आगमिक ग्रंथों के पद्यानुवाद-संग्रह,प्रवचन-संग्रह,
    स्फुट रचनायें आदि।

जीवन परिचय, व्यक्तित्व, साहित्य एवं जन कल्याणकारी मार्गदर्शन

            जिनका व्यक्तित्व, तप, संयम और त्याग सागर जितना विराट है, विशाल है, उनके बारे में लिखते लिखते कलम भी थक जाए। उनके गुण इतने अगणित हैं, कि गुणगान करते करते जिह्वा भी थक जाए। उनके नाम के साथ जुड़ने वाली उपाधियां इतनी हैं, उनको लिखते लिखते ही एक बड़ा लेख बन जाए।

            हम बात करे रहे हैं -अनासक्त महायोगी, अपराजेय साधक, संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महा मुनिराज के बारे में। वर्तमान में साक्षात तीर्थंकर भगवान जैसे, चलते फिरते भगवान, धरती के देवता, प्रखर तपस्वी, अनासक्त महायोगी, महामनीषी, निस्पृही संत,  युग दृष्टा, युग प्रवर्तक, कठोर साधक, श्रमण संस्कृति के उन्नायक, श्रेष्ठ चर्या पालक, राष्ट्रीय चिंतक, अनियत विहारी, महापुरुष, प्रवचन प्रभाकर, ज्ञान सागर के विद्या हंस, दार्शनिक, आत्मानिष्ठ, कवि हृदय, संस्कृति के रक्षक, राष्ट्रसंत और भी ना जाने कितनी उपाधियां और गुण विशेषण उनके नाम के साथ लगाए जाते हैं। ऐसा गुणों के महासागर जैसा उनका जीवन चरित्र है।

जन्म व परिवार —

            कर्नाटक राज्य के बेलगांव जिले में सदलगा गांव के पास, चिक्कोड़ी नामक गांव के एक परिवार में, 10 अक्टूबर 1946 को, शरद पूर्णिमा के पावन दिन शिशु के रूप में एक चांद का अवतरण हुआ। उस शिशु का नाम रखा गया विद्याधर अष्टगे। यही बालक विद्याधर अष्टगे संयम पथ पर चलते हुए, आज आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के रूप में हमारे सामने हैं।

            विद्याधर जी के पिता श्री का नाम श्री मल्लप्पा अष्टगे जी और माता श्री का नाम श्रीमती जी अष्टगे था। आपके माता-पिता ने भी आगे भविष्य में संयम पद को अपनाया और मुनि व आर्यिका दीक्षा ग्रहण की।

            विद्याधर जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहां पर धार्मिक संस्कारों पर बहुत ध्यान दिया जाता था और धार्मिक चर्या का अनुशासन के साथ पालन किया जाता था। साधु संगति और सेवा में भी परिवार सदा आगे रहता था। पारिवारिय जन धार्मिक-आध्यात्मिक विचारों वाले थे। ऐसे पारिवारिक वातावरण का प्रभाव विद्याधर जी पर भी पड़ा और बचपन से ही उनकी धार्मिक क्रियाकलापों के प्रति रुचि बढ़ गई। परिवार की धार्मिक पृष्ठभूमि का ऐसा प्रभाव रहा कि विद्याधर जी के माता पिता और दो अनुज भ्राताओं ने भी दिगम्बरी दीक्षा को अंगीकार किया और अपने मानव जीवन को सफल बनाया। दोनों बहनों ने भी आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर साधना पथ पर अपने को अग्रसर किया।

बाल्य काल —

            बालक विद्याधर को बचपन में मिले धार्मिक संस्कार धीरे-धीरे बढ़ते गए। मंदिर जाना, देव दर्शन करना, भगवान की प्रतिमा देखकर चिंतन करना, साधु संतों के दर्शन करना, उनका प्रवचन सुनना बालक विद्याधर की दिनचर्या के हिस्सा थे। वे कभी भी इन कार्यों को नहीं छोड़ते थे।

            इसके साथ ही वे अपने अन्य सभी कार्य भी कुशलता से और निश्चित समय पर पूरा करते थे। बालक विद्याधर बचपन से ही बहुत सहनशील थे। एक बार बिच्छू ने उन्हें काट लिया तो भी उस असीम दर्द को वे हंसते हुए सह गए पर अपनी धार्मिक चर्या को नहीं छोड़ा। छोटी अवस्था में ही उन्होंने  संस्कृत के कठिन सूत्र और पदों को याद कर लिया था।

लौकिक शिक्षा और रुचियां–

            बालक विद्याधर की मातृभाषा कन्नड़ थी। पढ़ाई में वे बहुत मेधावी थे। कन्नड़ माध्यम से उन्होंने नवमी तक लौकिक शिक्षा प्राप्त की। प्रथम स्थान प्राप्त करना उनके लिए बहुत सरल कार्य जैसा था। गणित के सूत्र और भूगोल के नक्शे आदि सभी कार्य को वे बड़ी मेहनत और लगन से करते थे। शतरंज खेलना, शहीद महापुरुषों के तैल चित्र बनाना, गिल्ली डंडा, तकली कातना आदि रुचियां भी उनके अंदर थी पर उनका सबसे ज्यादा झुकाव धार्मिक रूचि की तरफ ही था।

बाल्यअवस्था में वैराग्य भाव–

            कहा जाता है भव्य आत्माओं के कुछ चिन्ह बचपन में ही दिखाई दे जाते हैं। विद्याधर जी भी बचपन से ही सामान्य बच्चों से अलग अनेक तरह के विशेष गुण रखते थे। वे बाल्य अवस्था से ही शुद्ध और सात्विक भोजन करते थे। मंदिर व भगवान के प्रति उनकी अटूट आस्था थी और इस बारे में चिंतन उनके मन में चलता रहता था। 9 वर्ष की अवस्था में जब उन्होंने आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रवचन सुने तो उनके हृदय में वैराग्य की लहरें उठने लगीं।धर्म और आत्म तत्व के प्रति जिज्ञासा बढ़ने लगी। लौकिक पढ़ाई से उनका मन उचट गया था। अब वे जिंदगी के रहस्य और आध्यात्मिक मूल्यों को जानना चाहते थे। इसलिए उनके पिता श्री ने घर पर ही उनके लिए धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था कर दी। उम्र के साथ विद्याधर जी के अंतरंग में वैराग्य की भावना बढ़ती जा रही थी।

गृह त्याग और ब्रह्मचर्य व्रत–

            हृदय में जब वैराग्य का सागर उमड़ने लगता है तो भला कौन उसे रोक सकता है। आपने 20 वर्ष की युवावस्था में अपने घर का सदा के लिए त्याग कर दिया और आध्यात्मिक जीवन की खोज में जयपुर आ गए। 1967 में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर लिया और संयम मार्ग पर अपना पहला कदम बढ़ा दिया। ब्रह्मचारी विद्याधर जी इस समय ज्ञान साधना और सेवा में लगे रहते थे। उन्हें देखकर सभी उनसे प्रभावित हुए बिना ना रह पाते और तप एवं सेवा की प्रेरणा उनसे लेते। संसार की असारता का चिंतन करते हुए आपके अंदर एक तरफ वैराग्य भाव बहुत तेजी से बढ़ते जा रहे थे तो दूसरी तरफ आगम को जानने की इच्छा भी तीव्र होती जा रही थी।

साहित्य मनीषी, महाकवि, तपोनिधि आचार्य प्रवर ज्ञान सागर जी महाराज का सानिध्य–

            ब्रह्मचारी विद्याधर जी की ज्ञान पिपासा उनको आचार्य प्रवर ज्ञानसागर जी महाराज के पास खींच लाई। गुरु किसी को भी शिष्य बनाने से पहले उसकी परीक्षा लेते हैं। ब्रह्मचारी विद्याधर जी की भी जब गुरु ने परीक्षा ली तो उन्होंने उस परीक्षा को पास किया और गुरु का दिल जीत लिया। उन्होंने उसी समय से आजीवन वाहन के प्रयोग का त्याग कर दिया। गुरु ने अपने शिष्य को सुयोग्य जानकर आगम के सभी विषयों का ज्ञानार्जन कराया और अपना सम्पूर्ण ज्ञान का भंडार आपको दे दिया। ब्रह्मचारी विद्याधर जी, गुरु के द्वारा दिए गए ज्ञान का खूब चिंतन-मनन करते थे। इस तरह उन्होंने दर्शन, न्याय, अध्यात्म ग्रंथों आदि का मन लगाकर अध्ययन किया और जिनागम के गूढ़तम रहस्यों को समझा। यही नहीं, प्राप्त हुए ज्ञान को, वे अपने चरित्र में भी उतारते गए, संयम और साधना को अपने जीवन में बढ़ाते गए।

मुनि दीक्षा–

            आपकी योग्यता और प्रखर प्रतिभा ने आपके गुरु को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने आपको मुनि दीक्षा प्रदान करने का निश्चय किया। 30 जून 1968,आषाढ़ शुक्ल पंचमी के दिन अजमेर (राजस्थान) की पुण्य भूमि पर आपके मुनि दीक्षा के संस्कार हुए और आपने दिगंबर निग्रन्थ स्वरुप को धारण किया।

            गुरु से जिनागम के सभी ग्रंथों का ज्ञान आपको मिलता रहा। आपने गुरु से प्राप्त ज्ञान को अमूल्य उपहार की तरह संभाला और कुछ ही समय में आप व्याकरण, साहित्य, न्याय, अध्यात्म और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान बन गए। इसके अतिरिक्त कन्नड़, मराठी सहित प्राकृत, अपभ्रंश , संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, बंगला आदि 8 भाषाओं के भी आप ज्ञाता बन गए।

आचार्य पद–

            आप ग्रंथों का स्वाध्याय, अध्ययन करते तो दूसरी तरफ गुरु की सेवा में भी लगे रहते। गुरु ने अपने जीवन के अंतिम समय में आपको ही योग्य जानकर, आप से ही सल्लेखना व्रत लेने का मन बनाया। इसके लिए जब उन्होंने एक सभा में आपको आचार्य पद स्वीकार करके, सल्लेखना व्रत देने का निवेदन किया तो आपके लिए, गुरु के निर्णय को स्वीकार करना मुश्किल हो गया। आप इस निर्णय के लिए तैयार नहीं हो पाए। पर जब गुरु ने समझाया, गुरु आज्ञा, आगम आज्ञा, गुरु भक्ति की बात रखी, तभी आप गुरु के इस निर्णय के लिए अपने को तैयार कर पाये।

            आपने आचार्य पद स्वीकार करके अपने गुरु को सल्लेखना व्रत दिलाया। दिन-रात गुरु की सेवा में तन-मन से अपने को लगा दिया। गुरु के प्रति आपकी सेवा ऐसी अद्वितीय और अपूर्व थी कि जिसने भी उसके बारे में सुना, वह आश्चर्य से भर गया और प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाया। आपकी अद्भुत सेवा के साथ, आपके गुरु ने समता भाव और अत्यंत शांत परिणामों से इस नश्वर देह का त्याग कर समाधि को प्राप्त किया।

दीक्षा देने का शुभारंभ–

           आपके गुरु ने भविष्य के जीवन के बारे में आपको अनेक तरह से मार्गदर्शन किया था। उनके मार्गदर्शन के अनुसार ही आपने योग्य और भव्य जनों को दीक्षा देने का निर्णय लिया। उसके बाद दीक्षा लेने वाले दीक्षर्थियों का ऐसा क्रम शुरू हुआ कि वह अभी तक जारी है। आपका चुम्बकीय व्यक्तित्व, तप का प्रकाश, आभा मंडल का तेज व कठिन साधना भव्य जनों को ऐसा आकर्षित करती है कि आपसे दीक्षा लेने के लिए वे तरसते हैं और दीक्षा मिलने पर अपने को सौभाग्यशाली मानते हैं। दीक्षा लेने की प्रतीक्षा में समृद्ध, धनी घरों के उच्च शिक्षित युवक और युवतियों की लंबी कतार लगी रहती है। 1000 से भी ज्यादा युवक-युवतियों ने आपसे ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया है और अपने को साधना के पथ पर आगे बढ़ाया है।

           आपके गृहस्थ जीवन के दोनों अनुज भ्राता भी आपके संयम मार्ग से प्रभावित हुए और उन्होंने आपसे मुनि दीक्षा ली। वर्तमान में वे ‍निर्यापक मुनि श्री समयसागर जी महाराज और निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी महाराज के नाम से आपके संघ में की शोभा बढ़ा रहे हैं।

विशाल संघ–

           दीक्षा लेने के क्रम में अनेक भव्य जन आपके शिष्य पद को पाते रहे। धीरे धीरे आपका संघ एक विशाल संघ के रूप में आ गया। अभी तक आपने अपने पवित्र कर कमलों से 130 मुनि दीक्षा, 172 आर्यिका दीक्षा,  20 ऐलक दीक्षा, 14 क्षुल्लक दीक्षा एवं 3 क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की हैं। आपका संघ अपने कठोर तप, कठिन साधना, दुर्लभ व दढ़ चर्या के पालन और अनुशासन के लिए जाना जाता है।

कठोर साधना और तप का जीवन–

           आपकी चर्या में चतुर्थ कालीन मुनि चर्या के दर्शन होते हैं। पंचम काल का प्रभाव भी आपकी कठोर तप चर्या पर कोई प्रभाव नहीं डाल सका। पंचम काल में आश्चर्यचकित करने वाली तप,त्याग ,संयम और कठिन साधना से भरी आपकी दुर्लभ जीवन चर्या और आभा मंडल का तेज, सभी को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। सामान्य जन से लेकर विशिष्ट जन, विदेशी तक सभी आपके दर्शन कर आप से आशीर्वाद पाकर अपने को धन्य मानते हैं।

           आपका अनुशासन, समता, सहिष्णुता तथा चर्या का दढ़ता के साथ पालन करना, मोक्ष मार्ग पर बढ़ने वाले भव्य जीवो के लिए प्रेरणा स्रोत बनता है और उन्हें इसी तरह की साधना, तप व त्याग से परिपूर्ण चर्या के पालन के लिए साहस और उत्साह से भर देता है।

पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने आपके इस प्रेरणादायी चारित्र के बारे में इन पंक्तियों में अपने श्रद्धा भाव प्रकट किए हैं-

जो स्वयं मोक्ष पथ पर बढ़े जा रहे।

और भव्यों को भी साथ ले जा रहे।।

जिनकी वाणी में तत्वों का होता जिकर, 

जिनका मन इतना पावन हो करुणा का घर,

जो सदाचार संयम का मेरु शिखर,

जिनके चरणों में देवों की रहती बसर,

वो गुरु मेरा विद्या का सागर महां,

जिनके चरणों में झुकता है सारा जहां,

उनके चरणों में हम भी चढ़े जा रहे।

जो स्वयं मोक्ष पथ पर बढ़े जा रहे,

और भव्यों को भी साथ ले जा रहे।।

           आपका व्यक्तित्व, मधुर वाणी, सरलता, संयम, त्याग से भरा जीवन और वीतरागी छवि ऐसा अमिट प्रभाव छोड़ती है कि दर्शन करने वाले को ऐसा महसूस होता है – भगवान को साक्षात तो नहीं देखा पर भगवान बिल्कुल ऐसे ही होते होंगे।

साहित्य एवं कृतियां

           आप उच्च कोटि के दार्शनिक, कुशल काव्य शिल्पी, बहुभाषाविद, कवि हृदय संत हैं। ज्ञान का जो भन्डार आपने अपने चिन्तन, मनन, विचार, स्वाध्याय, अध्ययन से एकत्र किया, उसे दूसरों तक पहुंचाने के लिए आपने अनेक कालजयी और अमूल्य ग्रंथों एवं कृतियों की रचना की।

हिंदी  पद्यानुवाद —

           आपने जैन आचार्यों के द्वारा संस्कृत और प्राकृत में लिखे गये 25 प्राचीन ग्रंथों का हिंदी पद्य में अनुवाद किया। जिससे संस्कृत और प्राकृत भाषा को ना समझने वाले पाठक इन ग्रंथों को सरलता से समझ सकें । इनमें प्रमुख हैं– समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, पंचास्तिकाय, अष्टपाहुड, वारसाणुवेक्खा, इष्टोपदेश, समाधिसुधा  शतक, स्वयंभू स्तोत्र, रतनकरण्डक श्रावकचार, द्रव्य संग्रह, योगसार, आत्मानुशासन आदि।

संस्कृत शतक–

           आपने संस्कृत भाषा में 6 शतकों एवं शारदा स्तुति की रचना की —1.श्रमण  2.निरंजन  3.भावना  4.परिषह जय  5.सुनीति   6.चैतन्य चन्द्रोदय 7.शारदा स्तुति।

हिंदी शतक–

           अध्यात्म, नीति, दर्शन आदि विषयों पर आपने 12 हिंदी शतकों का सर्जन किया। जिनमें प्रमुख हैं – निजानुभव, मुक्तक, श्रमण, भावना, परिषह जय, सुनीति, दोहा दोहन, निरंजन, पूर्णोदय, सूर्योदय, सर्वोदय, जिन स्तुति आदि।

लघु कविताओं के संग्रह–

           आपके द्वारा रचित लघु कविताओं के इन 4 संग्रहों ने काव्य जगत की शोभा को बढ़ाया है— (1) नर्मदा का नरम कंकर (2) तोता क्यों रोता (3) डूबो मत लगाओ डुबकी (4) चेतना के गहराव में ।

इसके अतिरिक्त आपने लगभग 500 हाइकू (जापानी छंद) और अनेक सुन्दर स्तुतियों की भी रचना की है।

मूकमाटी–

           आपके द्वारा रचित सर्वाधिक चर्चित और प्रसिद्ध ‘मूकमाटी’ महाकाव्य ने साहित्य जगत में धूम ही मचा दी। साहित्यकारों ने इसे नए युग का काव्य, Future poetry, ‘आधुनिक काव्य’ की संज्ञा दी। मूकमाटी महाकाव्य अध्यात्मिक, क्रांतिकारी, युग प्रवर्तक और प्रेरणादायक, नई तरह की अनुपम काव्य रचना है। इसमें अध्यातम, प्रकृति, नीति, दर्शन, युग चेतना आदि का अद्भुत संगम साहित्यकारों ने पाया। अनेक विद्वान मूकमाटी महाकाव्य पर डी.लिट., पी.एच.डी., एम. फिल. शोध प्रबन्ध रिसर्च पेपर लिख चुके हैं। इस कालजयी अनमोल ग्रंथ पर विद्वानों द्वारा की गई लगभग 1000 से भी अधिक समीक्षाओं को ज्ञानपीठ प्रकाशन ने “मूकमाटी मीमांसा” नामक ग्रंथ के रूप में तीन खंडों में प्रकाशित किया है। अनेक भाषाओं अंग्रेजी, मराठी, कन्नड़, बंगला, गुजराती में इसका अनुवाद हो चुका है और उर्दू व जापानी भाषा में चल रहा है।

जन कल्याणकारी कार्य

           आपने जहां एक ओर अपनी आत्मा के कल्याण के लिए युवावस्था में ही संयम पथ पर अपने कदम बढ़ा दिए, पर-कल्याण की भावना से अन्य भव्यजनों को भी मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर किया, वहीं दूसरी ओर आपका कोमल हृदय समाज और राष्ट्र प्रेम की भावनाओं से भी भरा रहा। आप ऐसे युग दृष्टा महापुरुष, संस्कृति के रक्षक, राष्ट्र प्रेमी, राष्ट्र चिंतक, महान संत हैं जिसने घर-परिवार-मोह सब कुछ त्याग दिया, पर अपने राष्ट्र, समाज और संस्कृति के हित के बारे में सोचना नहीं छोड़ा। आपके इसी दूरदर्शी चिंतन और समाज, संस्कृति, राष्ट्र के लिए आप की प्रेरणा और मार्गदर्शन से निम्न जन कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं–

प्रतिभा स्थली ज्ञानोदय विद्यालय–

           कहा जाता है, एक नारी पूरे घर परिवार को अच्छे संस्कारों से भर देने की सामर्थ्य रखती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आपके मार्गदर्शन से, युवतियों को उच्च स्तर का ज्ञान और सुसंस्कारित,आधुनिक उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली पर आधारित 3 आदर्श विद्यालयों की स्थापना की गई है। यह प्रतिभा स्थली विद्यालय जबलपुर (मध्यप्रदेश), डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़), रामटेक (महाराष्ट्र) में स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा इंदौर में “प्रतिभा प्रतीक्षा” कन्या आवासीय छात्रावास भी संचालित किया गया है।

भाग्योदय तीर्थ धर्मार्थ चिकित्सालय–

           आज के युग में सभी वर्गों के लोगों को सस्ती, सुलभ, प्रभावी और सही चिकित्सा मिल सके। बीमार गरीब लोग भी चिकित्सा का लाभ ले सकें, इस जनकल्याण और जन सेवा के लिए, आप की पावन प्रेरणा से सागर (मध्य प्रदेश) में भाग्योदय तीर्थ चिकित्सालय की स्थापना की गई है।

हथकरघा केन्द्र–

           देश में बढ़ती बेरोजगारी, युवाओं में बढ़ते असंतोष को दूर करने के लिए, युवाओं और देश को आत्मनिर्भर बनाने की भावना से अहिंसक, स्वदेशी, पर्यावरण रक्षक, स्वरोजगार को प्रोत्साहन देने के लिए 35 से भी ज्यादा स्थानों पर हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र और हथकरघा केंद्रों  की स्थापना आपके आर्शीवाद से की गई है। इन केंद्रों पर 1000 से भी ज्यादा युवा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं और स्वरोजगार की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

दयोदय जीव रक्षा के केंद्र–

           आपका करुणामय, दयालु हृदय देश में हो रहे पशुधन के वध को देख कर करुणा से भर गया, द्रवित हो गया। आपकी मंगलकारी प्रेरणा से जीव दया के प्रयास शुरू हुए और 130 गौशालाओं में एक लाख से भी ज्यादा पशुधन को रख कर उनको अभय दान दिया गया है और सुरक्षा प्रदान की गई है। इसके अतिरिक्त  “धारा दुग्ध योजना” के अंतर्गत बीना बारहा, सागर में 500 देशी गिर गाय का पालन करके दुग्ध उत्पादन किया जा रहा है।

पूरी मैत्री–

           गरीब असहाय लोगों को सहारा देने के उद्देश्य से और जनता को डिब्बाबंद अशुद्ध, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों से बचाने के लिए, जबलपुर में “पूरी मैत्री” नाम से लघु उद्योग योजना आरंभ की गई है।

प्रशासनिक प्रशिक्षण केंद्र–

           नव युवा आदर्श नागरिक बनें। नई ऊर्जा, उत्साह और उचित दिशा बोध के साथ देश की सेवा में लग सकें , इसी मंगल भावना से दिल्ली, मढ़िया जी जबलपुर में प्रशासनिक प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित किए गए हैं।

राष्ट्रहित में विचार–

           राष्ट्र प्रेम की भावना से, राष्ट्रहित को दृष्टि में रखकर, राष्ट्रीय चिंतक की तरह, आपने निम्न विचारों के माध्यम से राष्ट्र का मार्गदर्शन किया है–

(1) इंडिया नहीं, भारत बोलो —  ‘इंडिया’ शब्द विदेशी गुलामी का प्रतीक है और ‘भारत’ शब्द का संबंध हमारी प्राचीन गौरवमय संस्कृति से है।

(2) शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं भारतीय भाषा हो।

(3) राष्ट्र भाषा हिंदी को सम्मान मिले।

(4) भारतीय शिक्षा पद्धति को लागू किया जाए।

(5) गौशालाओं और कृषि को प्रोत्साहन मिले।

(6) मांस निर्यात देश पर कलंक के समान है।

(7) स्वरोजगार को बढ़ाया जाए, प्रोत्साहन दिया जाए।

(8) प्रतिभा पलायन को रोका जाए आदि।

जैन संस्कृति की रक्षा के लिए प्रयास–

           आपका चिन्तन इतना दूरदर्शी, विस्तृत और व्यापक है कि आपने सभी क्षेत्रों के बारे में बहुत गहराई से विचार किया। जैन संस्कृति और जिनालयों की रक्षा व विकास के लिए आपके मार्गदर्शन और पावन प्रेरणा से निम्न कार्य प्रारंभ हुए—-

(1) पाषाण के जिनालय–

           पाषाण के बने जिनालय भविष्य में अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं। इसी उद्देश्य से अनेक स्थानों पर पाषाण के जिनालय निर्माण करने की प्राचीन परम्परा को दोबारा शुरू किया गया है।

(2) नए तीर्थों की स्थापना–

           आपके आशीर्वाद से नए तीर्थों की कल्पना को साकार रूप दिया गया। नए तीर्थों के रूप में – सर्वोदय तीर्थ (अमरकंटक), भाग्योदय तीर्थ (सागर), दयोदय तीर्थ (जबलपुर) की स्थापना की गई है।

(3) प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार–

           अपने चातुर्मास, शीतकालीन, ग्रीष्मकालीन प्रवास के समय आपने प्राचीन धरोहर की रक्षा करने के लक्ष्य से, अनेक प्राचीन और कमजोर जीर्ण हुए मंदिरों का जीर्णोधार करा कर, उन्हें नवीन रूप प्रदान कराया। सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर (दमोह), अतिशय तीर्थ क्षेत्र पटनागंज, बीना जी बारहा (सागर), तीर्थ क्षेत्र कोनी जी, जबलपुर आदि इनमें प्रमुख हैं।

जिन शासन की शान–

           आपके जीवन को “जिन शासन की शान- मूलाचार की पहचान” के रूप में देखा जाता है। आपके जीवन में महावीर स्वामी के जिन शासन की चर्या और आचार्य श्री कुन्द कुन्द स्वामी का मूलाचार झलकता है। आपका चुम्बकीय व्यक्तित्व, सागर जैसा गहरा अद्भुत ज्ञान, भव्य जनों को मोक्ष मार्ग पर अग्रसर करने वाला पर-कल्याण एवं समाज व राष्ट्र हित में आपके मार्गदर्शन से हुए जन कल्याणकारी कार्यों के बारे में जानकर, सभी का मन व हृदय आपके चरणों में झुक जाता है और आप जैसे तीर्थंकर समान महान संत को पाकर अपने को भाग्यशाली मानता है।

परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज द्वारा रचित यह पंक्तियां बहुत सुन्दर शब्दों में आपके व्यक्तित्व को दर्शाती हैं —

शरद पूर्णिमा की उजली सी, रात में कोई आया था।

होके युवा तप को धारण कर, चाँद निशा में छाया था।

आज उसी की शीतलता में, आनन्दित है जग सारा।

जिससे ही बस फैल रहा, जिनशासन का उजयारा।

तुमसे चांद सितारों को भी, और फिजाओं को है गुरूर।

करके जग का हित मेरे गुरुवर, जग में रहते जग से दूर।।

विद्यासागर इस धरती पर,  कोई फरिश्ता का है नूर।

जिसने देखा तुमको गुरुवर, उसको  चैन मिला भरपूर।।