.

अर्हं योग द्वारा मानवता का परोपकार करने वाले परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने मानव समुदाय की पीड़ा और कष्ट को समझा और उनका सही मार्गदर्शन करने के लिए “आध्यात्मिक यात्रा” के नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया। इस आध्यात्मिक यात्रा के प्रोग्राम ने मानव समुदाय को भय, चिंता, निराशा और depression की राह पर जाने से रोका और उन्हें एक नए उत्साह, उमंग और positiveness से भरे रास्ते पर चलना सिखाया।


अर्हं ध्यान योग

YouTube player

हमारी प्राचीन संस्कृति में बहुत से ज्ञान के खजाने छिपे पड़े हैं। ऐसे ही ज्ञान का एक खजाना है – योग। जैन संस्कृति में  प्रथम तीर्थंकर ऋषभ नाथ (आदिनाथ) भगवान के समय से ही योग की परंपरा शुरू हो गई थी, लेकिन समय के साथ हम इसे भूल गए।

योग के इसी ज्ञान को “अर्हं ध्यान योग” के रूप में परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने हमें re-introduce कराया और संपूर्ण मानव जाति पर करुणा, उपकार करते हुए जनकल्याण के लिए अर्हं ध्यान योग का उपहार पूरे विश्व को दिया।

अर्हं ध्यान योग प्राचीन संस्कृति की खूबियों और आधुनिक समय की आवश्यकता पर आधारित, एक अलग तरह का अदभुत और अनोखा ध्यान योग है। यह हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ और मानसिक रूप से मजबूत और शांत बनाता है। Negative thoughts, जो कि आज के समय की बड़ी समस्या हैं, उनको नियंत्रित करने में सहायता करता है। पंच परमेष्ठी के स्मरण पर आधारित “पंच मुद्रा” व्यक्ति को नई ऊर्जा और शक्ति से भर देती हैं।

इतना ही नहीं, अर्हं ध्यान योग हमें अपनी और दूसरे की वास्तविक पहचान करा कर, मानवता के गुण विकसित करता है, जिससे विश्व शांति की स्थापना में सहायता मिल सके। इसके साथ ही यह ध्यान योग आत्मा की शक्ति को बढ़ाकर, शून्य से अनंत (unlimited) शक्ति और आनंद –  zero to infinity की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

प्राकृत भाषा

YouTube player

संस्कृत और प्राकृत हमारे देश की प्राचीन भाषाएं हैं। प्राकृत भाषा से तो बहुत कम लोग परिचित हैं, जबकि देश में प्राचीन समय में यही भाषा बोलचाल की भाषा  के रूप में प्रचलित थी। यही नहीं, अनेकों प्राचीन ग्रंथ, शास्त्र आदि भी हमारे आचार्य और गुरुजनों द्वारा इसी प्राकृत भाषा में लिखे गए हैं। प्राकृत के इन ग्रंथों और शास्त्रों में अनेक विषयों का दुर्लभ और अनुपम ज्ञान भरा पड़ा है। प्राकृत भाषा को न जानने के कारण हम इस दुर्लभ ज्ञान से अनजान रहते हैं।

 परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने इस समस्या को समझा और प्राकृत भाषा को जन जन तक पहुंचाने के लिए ‘पाइया सिक्खा’ नाम से चार पुस्तकों की रचना की। इन पुस्तकों के माध्यम से प्राकृत भाषा को सरलता से सीखा जा सकता है

पूज्य मुनि श्री का सन्देश है, प्राकृत भाषा को जन जन पहुंचाया जाये और सभी को सिखाया जाये, जिससे सभी लोग अपने प्राचीन शास्त्रों एवं ग्रन्थों  के महत्व को समझ सकें और अपनी संस्कृति से जुड़ सकें। पूज्य मुनिश्री कहते हैं — “प्राकृत हमारी दादी मां की तरह है”। इस भाषा को अपनाने से हमारे व्यवहार में प्रेम भाव और स्नेह बना रहता है और हमारी सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा होती है।  पूज्य मुनि श्री के आशीर्वाद से रेवाड़ी (हरियाणा) में प्राकृत जैन विद्या पाठशाला की स्थापना हुई और एक जनवरी 2019 से प्राकृत भाषा की ऑनलाइन पाठशाला संचालित की गई है जिसमें भारत ही नहीं अपितु विदेशों से भी लोग प्राकृत भाषा सीख रहे हैं।

साहित्य

YouTube player

अभीक्ष्ण ज्ञान उपयोगी, प्राकृत भाषा मर्मज्ञ परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज चार भाषाओं – हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत और अंग्रेजी का ज्ञान रखते हैं। इन चार भाषाओं में पूज्य मुनि श्री ने 80 से भी अधिक ग्रंथों, टीका ग्रंथों, काव्यों, पद्यानुवादों, स्तोत्र आदि की रचना की।

पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की लेखन क्षमता अद्भुत है। उनके ज्ञान की पराकाष्ठा को देखकर ही — अभीक्ष्ण ज्ञान उपयोगी, वर्तमान में श्रुत केवली, जैन दर्शन के परम ज्ञाता, प्राकृत भाषा मर्मज्ञ, ज्ञान के सागर, विद्या के सागर आदि उपाधियों से उन्हें विभूषित किया जाता है।

पूज्य मुनि श्री के साहित्य को अनेक भागों में बांटा गया है – (1) संस्कृत भाषा में टीका ग्रंथ, (2) हिंदी में अनुवादित ग्रंथ, (3) पद्यानुवाद, (4) प्रवचन ग्रंथ, (5) संस्कृत भाषा में मौलिक काव्य ग्रंथ, (6) प्राकृत भाषा में मौलिक काव्य ग्रंथ, (7) अन्य मौलिक कृतियां, (8) संकलन, (9) अंग्रेजी भाषा में पुस्तकें आदि

पूज्य मुनि श्री के द्वारा रचित साहित्य में अनेक तरह की varieties देखने को मिलती हैं। इसमें संस्कृत भाषा में श्री वर्धमान स्तोत्र, स्तुति पथ, श्रायस पथ, अनासक्त महायोगी जैसी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। दूसरी तरफ प्राकृत भाषा में सोलह कारण भावनाओं पर आधारित तित्थयर भावणा, धम्मकहा, गोम्मटेस पंडिमा भत्ति जैसी दुर्लभ और अनोखी कृतियां हैं।


Facebook Feed


मुनि श्री यहाँ विराजमान हैं-