12. बहुश्रुत भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

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बहुश्रुत भक्ति भावना

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शास्त्र ज्ञान के भाव ज्ञान से, शीतल जल से नहा रहे
स्वयं धो रहे विधि-अघ रज को, पाप कलुषता बहा रहे।
देह आत्म का विभ्रमनाशी, तत्त्व दिखाकर भविकों को
स्वयं स्वस्थ हैं स्वस्थ , नमूँ-नमूँ श्रुत श्रमिकों को॥2॥

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महामुनीश्वर जिनने सीखा, गुरु पद निकट शास्त्र का ज्ञान
विनय भरी निज हृदय वेदि पर, किया मनन चिंतन संधान।
रत्नत्रय संयुक्त ऋषिवर, श्रुतज्ञानी जिनमत आधार
उनकी पदरज से मम मस्तक, शोभित होवे हर्ष अपार॥4॥

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धवल आदि सिद्धांत ग्रन्थ के, जो रहस्य को जान रहे
वे ही समयसार को पढ़कर, निज आतम को जान रहे।
कर विश्वास निजातम पर जो, शुद्धातम को ध्याते हैं
उन पाठक साधु के चरणन, नित हम शीश झुकाते हैं॥6॥

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निश्चय और व्यवहार नयों से, निर्विरोध सब अर्थ यहाँ
हर पहलू से वस्तु समझते, ऐसे साधु विरल यहाँ।
सदा दे रहे धर्म देशना, दोनों नय से भक्ति से
बहुश्रुतवन्त महामुनिवर को, नमन कर रहा निज मति से॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं बहुश्रुत भक्ति भावना ममाSस्तु।


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