बहुश्रुत भक्ति भावना
जो सिद्धांत महाशास्त्रों का, पार पा लिए, सरलमना
फिर भी आत्म प्रशंसा बिन हैं, श्रुत भक्ति से शुद्धमना।
कर्म निर्जरा कारण पढ़ते, और पढ़ाते भविजन को
बहुश्रुतधारक पाठक मुनि को, वन्दन है मतिवर्धन हो॥1॥
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शास्त्र ज्ञान के भाव ज्ञान से, शीतल जल से नहा रहे
स्वयं धो रहे विधि-अघ रज को, पाप कलुषता बहा रहे।
देह आत्म का विभ्रमनाशी, तत्त्व दिखाकर भविकों को
स्वयं स्वस्थ हैं स्वस्थ , नमूँ-नमूँ श्रुत श्रमिकों को॥2॥
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जन्म जरा मृति वर्धन कारक, दुःखों की नित ही भरमार
अन्धकार में रखने वाले, कुमति प्रदायक तीर्थ अपार।
अनेकान्त से खण्डित करके, मण्डित करते जिनमत को
जिनवर भाषित श्रुत को नमता, सर्वसमर्थ बना श्रुत जो॥3॥
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महामुनीश्वर जिनने सीखा, गुरु पद निकट शास्त्र का ज्ञान
विनय भरी निज हृदय वेदि पर, किया मनन चिंतन संधान।
रत्नत्रय संयुक्त ऋषिवर, श्रुतज्ञानी जिनमत आधार
उनकी पदरज से मम मस्तक, शोभित होवे हर्ष अपार॥4॥
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हीन काल यम के मुख से जो, बचे हुए हैं शास्त्र महा
न्याय, पुराण और अध्यातम, जीवकाण्ड सिद्धान्त अहा।
उन सबको जो जान रहे हैं, बहुश्रुत मुनिजन कहलाते
उनके चरण कमल की भक्ति, मन हरती है सुख पाते॥5॥
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धवल आदि सिद्धांत ग्रन्थ के, जो रहस्य को जान रहे
वे ही समयसार को पढ़कर, निज आतम को जान रहे।
कर विश्वास निजातम पर जो, शुद्धातम को ध्याते हैं
उन पाठक साधु के चरणन, नित हम शीश झुकाते हैं॥6॥
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निश्चय और व्यवहार नयों से, निर्विरोध सब अर्थ यहाँ
हर पहलू से वस्तु समझते, ऐसे साधु विरल यहाँ।
सदा दे रहे धर्म देशना, दोनों नय से भक्ति से
बहुश्रुतवन्त महामुनिवर को, नमन कर रहा निज मति से॥7॥
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शब्द, अर्थ, पद की महिमा से, विपुल भार श्रुत द्रव्य रहा
उसको तज निज ज्ञान सुधा से, चित् चिन्मय को जान रहा।
निर्विकल्प हो ज्ञान मात्र ही, निज आतम अनुभव करते
बहुश्रुत समतारत साधक के, पद रज की संस्तुति करते ॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं बहुश्रुत भक्ति भावना ममाSस्तु।
बहुश्रुत भक्ति भावना ध्यान
