प्रासुक परित्याग भावना
दान मिला है महाजनों से, तीर्थंकर का ज्ञान मिला
इस अपार संसार सुखाने, जिन-वाणी रस पान पिला।
दिव्यपुरुष के दिव्य वचन ही, दिव्य दान हैं ग्रहण करो
पर पीड़ा-हिंसा बिन प्रासुक, त्याग वचन का श्रवण करो॥1॥
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जो साधु प्रासुक खाता है, जिह्वा वश में रखता है
जो प्रासुक पथ पर चलता है, दया हृदय में रखता है।
उस साधु के वचनामृत ही, मोह महा विष शमन करें
ज्ञानामृत देने वाला ही, प्रासुक त्यागी नमन करें॥2॥
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सभी त्याग में महा त्याग है, रत्नत्रय का त्याग कहा
रत्नत्रय ही आत्मधर्म है, धर्मदान बड़भाग कहा।
बड़भागी जो साधु बना है, उसका ही यह कार्य रहा
प्रासुक का वह ही परित्यागी, श्रमण बना है आर्य महा॥3॥
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वह उपदेश ही प्रासुक माना, जिसमें जीव दया का ज्ञान
संयम पथ पर बढ़ने की रूचि, बढ़ता जाए सम्यग् ज्ञान।
हेय रहा क्या उपादेय क्या, यह विवेक विज्ञान बने
भेदज्ञान का बढ़ता जाए, शिवपथ का सम्मान बने॥4॥
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जिस धर्मोपदेश में ना हो, सम्यग्दर्शन अरु वैराग्य
जिसमें फूहड़ हास्यपना हो, लोग लुभाना समझे भाग्य।
वह उपदेशक प्रासुक त्यागी, नही कहा है जिनमत में
तीर्थंकर पद बन्ध प्रबन्धन, भाव नहीं उस आतम में॥5॥
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श्रावक को यह त्याग भावना, यथाविधी फल देती है
उचित पात्र को दान चतुर्विध, बीज सौख्य का बोती है।
श्रमण संघ को जो भी देना, प्रासुक दो शक्ति अनुसार
प्रासुक परित्याग भावना फल, देती निज भाव विचार॥6॥
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जिसके मन में नहीं निवसती, हिंसा और मोह की खान
नहीं रहे मात्सर्य भाव भी, नहीं कलुषता औ अज्ञान।
उस साधु के वचन कहे हैं, ज्ञान दान शिव का आधार
वही रहा प्रासुक परित्यागी, पर निरपेक्ष दया आधार॥7॥
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ज्ञान दान का मुख्य धर्म तो, श्रमणराज के योग्य कहा
पर गृहस्थ भी इसी धर्म को, गौण रूप से पाल रहा।
दान-त्याग का मुख्य प्रयोजन, ममता मोह विनाशन हैं
पात्र और दाता का संगम, धर्म विवर्धन कारण है॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं प्रासुक परित्याग भावना ममाSस्तु।
प्रासुक परित्याग भावना ध्यान
