संवेग भावना
श्री जिनधर्म अतिविशुद्ध है, कर्म नाश का कारण है
पुण्य फलों को देने वाला, निःश्रेयस सुख धारण है।
इसका सेवन करने से जो, भवि जन मन में हर्ष धरे
निश्चित ही संवेग भावना, जीवन में निर्वेग भरे॥1॥
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काल अनादि से यह आतम, कर्म बन्ध से सहित रहा
नहीं हुआ उत्पन्न किसी से, इस भव वन में घूम रहा।
नित्य निगोद वास ही सबका, इस विधि जो चिंतन करता
वह भव-वन के भ्रमण दुखों से, डर संवेग भार भरता॥2॥
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जन्म मरण परिवर्तन के ये, दुःख जीव बहु भोगा है
दो इन्द्रिय आदिक भव पाके, पंचेन्द्रिय संयोगा है।
थावर जंगम सब जीवों के, दुःखों का चिन्तन करना
नित्य नयें संवेग भाव का, इसी तरह वर्धन करना॥3॥
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मोक्ष जो मनुष्य तिर्यंच गति के, गर्भ वास में वास किए
जन्म प्राप्त कर संयोगों से, अरु वियोग से व्यथित हुए।
बड़े हुए तो रोग-बुढ़ापा, पीड़ाओं ने घेर लिया
इसी तरह के चिन्तन से मन, संवेगित सन्नीर पिया॥4॥
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महापुण्य के महाफलों से, महा-महा वैभवशाली
देव-इन्द्र, चक्री राजा का, दुख से होता मन खाली।
ऐसे महापुण्यवन्तों को, जग में यदि दुख होता है
तो सुख किसको होगा सोचो, क्यों विषयों में खोता है॥5॥
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प्रथम, करण अरु चरण, द्रव्य से, चतु अनुयोग शास्त्र आधार
इन शास्त्रों के पढ़ने से ही, होता है संवेग अपार।
धर्म कार्य से हो मन हर्षित, भाव विराग बढ़े उर धार
नए-नए संवेग भाव की, बढ़ती होवे तो जग पार॥6॥
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पर कार्यों में उत्कण्ठित जो, तीव्रतमा आवेग कहा
तीव्रतरी फिर वही लालसा, ध्यानी का उद्वेग रहा।
मन्द-मन्द आकांक्षा रहना, उत्सुकता का होना है
शान्त ध्यान निर्वेग भाव से, मन संवेग सलोना है॥7॥
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चारों गति से त्रस्त हुआ जो, जिन स्वरूप में लीन हुआ
श्री जिनवर के कथित धर्म में, हर्षित होकर शुद्ध रहा।
जिसका चित्त विमुक्त हुआ है, सांसारिक अभिलाषा से
नया-नया संवेग भाव वह, अनुभव करे शिवाशा से॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावना ममाSस्तु।
संवेग भावना ध्यान
