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परिवर्तन जीवन का ऐसा नियम है जो सृष्टि के कण कण में दिखता रहता है। मनुष्य के जीवनयात्रा चक्र में बाल्यावस्था से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था में परिवर्तन होता है। व्यक्ति के भावों में तो निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। कर्मों के उदय में भी शुभ-अशुभ कर्म का परिवर्तन चलता रहता है। जलवायु में भी परिवर्तन होता है, हृदय परिवर्तन भी होता है और ऋतु परिवर्तन भी होता है। वर्षा ऋतु के बाद मौसम में परिवर्तन होता है और शरद ऋतु का आगमन होता है। इसी समय जैन साधु सन्तों और गुरुजन के वर्षा योग के बाद एक अन्य परिवर्तन का समय आता है और वह होता है – पिच्छिका परिवर्तन का समय।



मुनिमहाराज, आर्यिका माता जी आदि गुरुजन का सबसे ज्यादा सानिध्य यदि किसी को मिलता है, तो वह उनके संयम का उपकरण पिच्छी होती है। कमण्डल को तो विहार के समय श्रावक अपने हाथ में पकड़कर चल भी लेते हैं परन्तु पिच्छी तो सदा ही गुरुजन के साथ रहती है। पिच्छी अचेतन पदार्थ है पर उसके इसी सौभाग्य को देखकर, भक्तजन भजन बोलते रहते हैं– —
पिच्छी रे पिच्छी, ये तो बता तूने कौन सा पुण्य किया है ?
गुरुवर ने खुश होकर तुझे हाथों में थाम लिया है ।
पिच्छी बोलो ना, पिच्छी बोलो ना।
पिच्छिका परिवर्तन के समय गुरुजन जैन साधु इसी पिच्छी का परिवर्तन करते हैं और वर्षभर उनके पास रहने वाली पिच्छी को प्राप्त करने का अवसर, किसी एक सौभाग्यशाली श्रावक को मिलता है।



पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ससंघ के पिच्छिका परिवर्तन समारोह का आयोजन मानसरोवर, जयपुर में 17 नवंबर 2024 को हुआ। विशाल जनसमूह इस समारोह में उपस्थित हुआ। दूर दूर के नगरों से भी बड़ी संख्या में श्रावक और भक्तगण इस समारोह में पहुंचे। रोहतक, रुड़की, गाजियाबाद, सांगली के भक्तों ने गुरु चरणों में पंचकल्याणक के लिए और किशनगढ़ के श्रावकों ने शीतकालीन प्रवास के लिए निवेदन किया। अन्य नगरों के भक्तजन पूज्य मुनि श्री के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो जयपुर के श्रावकों ने अपनी श्रद्धा एवं भक्ति भावों की डोर को मजबूत करते हुए और गुरु के प्रति अपने समपर्ण को बढ़ाते हुए, फरवरी में एक नहीं, अपितु दो- दो पचकल्याणकों के लिये पूज्य मुनि श्री के समक्ष निवेदन रख दिया।
पिच्छिका परिवर्तन कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्जवलन, पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट आदि मांगलिक क्रियाओं से हुआ। व्रती श्रावक श्रेष्ठी श्री धर्मचंद जी जैन परिवार को पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके बाद बालिकाओं द्वारा सुन्दर नृत्य की प्रस्तुति की गई और जयपुर और अन्य नगरों से पधारे भक्तों ने, पूज्य मुनि श्री के चरणों में अष्ट द्रव्य अर्पित करते हुए, अपने भक्ति भावों को समर्पित किया।





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इस समारोह में राजस्थान सरकार के नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन मन्त्री माननीय श्री झाबरसिंह खर्रा जी, राज्य सभा सांसद माननीय श्री चुन्नीलाल गरासिया जी एवं JDA Secretary श्री निशांत जैन जी IAS, भी उपस्थित हुए और सभी ने पूज्य मुनि श्री के दर्शन करके, आशीर्वाद प्राप्त किया। माननीय मन्त्री जी ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में देश की प्रगति, उन्नति एवं जीव कल्याण के लिए जैन समाज द्वारा किए गए प्रयासों और योगदान की सराहना की और इन्हें सभी के लिए अनुकरणीय बताया।






इसके साथ ही जैन दर्शन के न्यायशास्त्र पर आधारित, पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर महाराज द्वारा रचित विलक्षण, अपूर्व और 21 वीं सदी की प्रथम कृति, न्याय सूत्रम् का विमोचन माननीय मन्त्री जी के द्वारा किया गया। अर्हं कैलेंडर और पूज्य मुनि श्री के प्रवचनों पर आधारित कृति, वैराग्य शतकम् का भी विमोचन इस अवसर पर हुआ।
इसके पश्चात बालिकाओं ने अर्हं घोष भजन पर अपनी प्रस्तुति देकर सबका मन मोह लिया। जयपुर चार्तुमास से सम्बन्धित एक डॉक्यूमेंट्री भी इस अवसर पर प्रस्तुत की गई।






तत्पश्चात वह क्षण आया, जिसके आने पर अनेक श्रावकों और भक्तों के दिल की धड़कन बढ़ जाती है। वह क्षण था- पूज्य मुनि श्री की पिच्छिका प्राप्त करने का। अष्टम प्रतिमाधारी, दानवीर, व्रती श्रावक श्रेष्ठी श्री धर्मचंद जी जैन (डी सी जैन जी) और उनकी धर्मपत्नी श्राविका श्रेष्ठी श्रीमती शकुन जैन जी को, पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पिच्छी प्राप्त करने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। गुरु सेवा, समर्पण, दान, संयम-तप-त्याग और सोलहकारण व अष्टान्हिका पर्व में निरन्तर अनेकों उपवास रखकर, आत्म विशुद्धि की ओर अग्रसर, व्रती श्रावक श्री धर्मचंद जी जैन को 8 वर्ष बाद यह सौभाग्य प्राप्त हुआ।






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पूज्य मुनि श्री को नई पिच्छी देने का सौभाग्य श्री अरुण कुमार जी जैन और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती संस्कृति जैन (मानसरोवर, जयपुर) को और उनके साथ ही अनेक श्रावकों को प्राप्त हुआ। पूज्य मुनि श्री विश्वाक्ष सागर जी महाराज की पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य श्री प्रेम चन्द्र जी जैन और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती बीना जैन जी (मानसरोवर, जयपुर) को प्राप्त हुआ।





पिच्छिका परिवर्तन के बाद पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के द्वारा आर्शीवचन का समय आया। पूज्य मुनि श्री ने कहा पिच्छी एक होती है, निवेदन बहुत हो जाते हैं, ऐसे में पिच्छी न मिलने के कारण किसी को भी दुखी नहीं होना चाहिए। पिच्छी देने वालों को भी बहुत पुण्य मिलता है। पिच्छी परिवर्तन को देखकर हर्षित होने और उसकी अनुमोदना करने वाले को भी बहुत पुण्य प्राप्त होता है। अपनी आत्मविशुद्धि को इतना बढ़ाएं कि आपको एक दिन नई पिच्छी ही प्राप्त हो जाए। इसके साथ ही पूज्य मुनि श्री ने भविष्य की चिन्ता से, मन में अनायास आने वाले नकारात्मक विचारों पर नियन्त्रण करने के लिए, जो हो सो हो– भजन के माध्यम से अपना सकारात्मक चिन्तन बनाए रखने के लिए कहा और वर्तमान की परिस्थितियों के अनुसार भविष्य की रूपरेखा बनाने के लिए उपस्थित जनसमूह को मार्गदर्शन प्रदान किया।
इस प्रकार पंचकल्याणक महोत्सव की विशुद्धि, आनन्द, उमंग और उल्लास के बाद, यह पिच्छिका परिवर्तन का समारोह भी बहुत ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ।



ज्ञान, ध्यान और भक्ति के रसों से परिपूर्ण और अनेक कार्यक्रमों, समारोह, विधानों, आयोजनों, शिविरों, सेमिनार, गोष्ठियों और पंच कल्याणक के रंगों से सजा हुआ पूज्य मुनि श्री का, मानसरोवर (जयपुर) का यह ऐतिहासिक चातुर्मास सदा ही स्मरणीय रहेगा।
