गुरु पूजन – 1

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परम पूज्य मुनि श्री १०८ प्रणम्य सागर जी एवं मुनि श्री चन्द्र सागर जी महाराज जी की पूजा

संकलन कर्ता – श्री अक्षय जी डांगरा, बांसवाड़ा

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मेरे मन मन्दिर में यतिवर, मैंने तुम्हें बुलाया है ।
सुन्दर भावों की माला संग, पूजन थाल सजाया है ।
वीर के पथ पर चलने वाले, वीर के नन्दन-चन्दन हो ।
मेरे गुरुवर प्रणम्य चन्द्र हैं, तुमको शत-शत वन्दन हो ।

ॐ ह्रीं मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चंद्र सागर मुनिभ्यो अत्र अवतर-अवतर संवौषट आह्वाननं ।
अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ॥ अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं ।।।

ना तो मिलता गंगाजल, मिले ना यमुना का पानी ।
चरण चढ़ाने गुरूवर लाए, केवल आँखों का पानी ॥
यही चढ़ाने लाये चरणों, इसको ऋषि स्वीकार करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं जल से भी सरल मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलम् निर्वपामिति स्वाहा ।

ना मलयागिर चन्दन है गुरु, ना काश्मीर का चन्दन है।
तेरे चरणों में वन्दन करने, तन-मन-जीवन अर्पण है ॥
मेरा जीवन चन्दन हो गुरु, चन्दन मन स्वीकार करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं चन्दन सम सुगन्ध फैलाने वाले मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो भव ताप विनाशनाय चन्दनम् निर्वपामिति स्वाहा ।

क्षत-विक्षत ये जीवन मेरा, अक्षय पद को पाना है ।
तुम्हें छोड़ कर मेरे गुरुवर, और कहीं ना जाना है ॥
हे अक्षय पद के अभिलाषी, हमको अक्षयवान करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं साक्षात विराजमान मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो अक्षय पद प्राप्ताय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।

विषय भोग में युग-युग बीते , खिली ना रत्नत्रय बगिया ।
तेरी कृपा से इस जीवन में, पाई संयम की घड़ियाँ ॥
संयम से सुरभित हो जीवन, सुमनावली स्वीकार करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं रत्नत्रय मार्ग प्रदाता मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो काम बाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामिति स्वाहा ।

भोजन करते-करते अब तक, अनगिन जीवन बीत चुके ।
फिर भी भूख ना शान्त हुई, लख चौरासी हम घूम चुके ॥
अर्पित ये नैवेद्य गुरुवर मेरी तृष्णा शान्त करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं कुशल वैद्य मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामिति स्वाहा ।

बाहर दीपक जले अनेकों, अन्तर दीपक नहीं जला ।
केवल रवि के बिन कर्मों ने, रहा आज तक अन्धियारा ॥
श्रद्धा दीप समर्पित गुरुवर, अंतर दीप प्रकाश भरो
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं सम्यक दर्शन दीपक मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो मोह अन्धकार विनाशनाय दीपम् निर्वपामिति स्वाहा ।

अष्ट कर्म की जंजीरों ने, जकड़ा है इस चेतन को ।
सुप्त चेतना हुई इसी से, समझा ना आतम धन को ॥
अष्टांगी ये धूप समर्पित, अष्ट कर्म मम नाश करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं त्याग तपस्या में लीन मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो अष्ट कर्म दहनाय धूपम् निर्वपामिति स्वाहा ।

साध्य तुम्हीं आराध्य तुम्हीं गुरू, तुम ही मेरे भगवन हो ।
मेरी श्रद्धा मेरी निष्ठा, तुम ही पूजा वन्दन हो ॥
मेरी मुक्ति फल के दाता, फल मेरा स्वीकार करो ।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं मोक्ष फल प्रदाता मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो मोक्ष फल प्राप्ताय फलम् निर्वपामिति स्वाहा।

अनर्घ पद को पाने गुरूवर, मेरा अर्घ समर्पित है ।
जीवन की हर आने वाली, साँसें तुम्हें समर्पित हैं ॥
रही अधूरी जीवन यात्रा, पूर्ण इसे अभिराम करो।
डूब रहे हैं भव सागर में, हमको मुनिद्वय पार करो ॥

ॐ ह्रीं अनर्घ पद के अभिलाषी मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घम् निर्वपामिति स्वाहा ।

जयमाला

श्रद्धा से अर्पित हे गुरुवर, शुभ भावों से वन्दन है।
आर्ष मार्ग के गौरव गुरूवर, तीन काल में वन्दन है ॥
उन्नीस सौ पचहत्तर सन् में, पर्युषण की अष्टमी को ।
मैनपुरी के भोगांव में, श्री सर्वेश प्रकाश हुआ ॥
अक्षय पद को पाने गुरूवर, वीर सरिता छोड़ दिये ।
भीतर की ज्योति पाने गुरू, विद्या के चरण समीप गये ॥
क्षुल्लक व ऐलक दीक्षा में प्रणम्य सागर नाम पाया ।
सिद्धोदय श्री सिद्ध क्षेत्र के नेमावर में यश पाया ॥
विद्या गुरु के चरणों में आ जीवन अपना वार दिया ।
मुक्तागिरी श्री सिद्ध क्षेत्र में प्रणम्य सागर जन्म लिया ॥
ऋपभ नाथ के जीवन को, युगदृष्टा का स्वरूप दिया ।
महावीर के वीर मंत्र खोजो मत पाओ गुंजाया ॥
वर्तमान के शासन नायक वर्धमान गुणगान किया ।
वर्धमान स्त्रोत लिख कर वर्धमान विधान रचा ॥
कल्याण मन्दिर तत्वार्थ सूत्र का तुमने पद्यानुवाद किया ।
आगम ग्रन्थों की टीकाकर जैनागम को पुष्ट किया ॥
श्रायस पथ आलेख पथ अन्तर्गुंज को स्वीकार किया ।
जैन सम्राट चन्द्र गुप्त को आप लेखनी योग्य मिला ॥

धत्ता

विद्या के सागर प्रणम्य चन्द्र बार-बार हम नमन करें।
गुरू को पूजें वन्दन करके कोटी-कोटी हम नमन करें ॥

ॐ ह्रीं अनर्घ पद के अभिलाषी मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर चन्द्र सागर मुनिभ्यो अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घम् निर्वपामिति
स्वाहा ।

विद्या गुरू के शिष्य हो सागर बड़ा विशाल
शब्दों में ना बन सके अत: पूर्ण जयमाल

दुर्लभ गुरु का दर्श है दुर्लभ गुरू संस्पर्श, दुर्लभ गुरू दर्शन पुनः दुर्लभ गुरू से हर्ष ।
दुर्लभ गुरू मुख से वचन दुर्लभ गुरू मुस्कान, दुर्लभ गुरू आशीष है दुर्लभ गुरू से ज्ञान ॥
दुर्लभ से दुर्लभ रहा गुरू गरिमा गुण गान, गुरू आज्ञा पूरण पले, दुर्लभतम यह जान ।।।

                  परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज और परम पूज्य मुनि श्री चंद्र सागर जी महाराज मुनि संघ का जिस क्षेत्र पर भी प्रवास, विहार  होता है, वहाँ भक्तों के हृदय में भक्ति की लहरें उठने  लगती हैं। भक्ति की इन्हीं लहरों से प्रेरित होकर, बांसवाड़ा राजस्थान के रहने वाले गुरु भक्त अक्षय डांगरे जी ने भक्ति भावों से भरपूर, इस सुन्दर गुरु पूजन का संकलन किया है।

                  पूजन में कवि ने भक्ति के रंगों की ऐसी धाराएं बहा दी हैं, भक्ति की ऐसी वर्षा कर दी है कि पूजन करने वाले भक्ति के रंग में रंग जाएं। कवि कहता है — गुरुवर हमने तो आपका पूजन करने के लिए भावों की माला से पूजन थाल सजाया है। हम तो आपके चरणों में जल की जगह अपनी आंखों का पानी चढ़ाने के लिए लाए हैं। मेरे तो आप ही साध्य हो, आप ही अराध्य हो, आप ही गुरु हो और आप ही भगवान हो। मेरी श्रद्धा, मेरी निष्ठा, पूजा, वन्दन सब आप ही हो। अंत में भक्ति की पराकाष्ठा में कवि कहता है — मेरे जीवन की आने वाली सांसे भी गुरुवर आप को समर्पित है। हे मुनिद्वय हम तो भवसागर में डूब रहे हैं, हमें आप ही पार लगाओ।

             भक्ति के रंगों में रंगी हुई ये पूजन पढ़ते  हुए, सभी आनन्द का अनुभव करते हैं। प्रात:काल जब प्रवचन से पहले गुरूपूजन होता है तो भक्तजन इस पूजन के साथ मुनिवर को अपनी श्रद्धा भक्ति सुमन समर्पित करते हैं।