परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रति भक्ति भावों को समर्पित करते हुए, किसी भक्त ने बहुत सुन्दर आरती लिखी है। छोटी सी आरती में गागर में सागर भरने का कवि ने प्रयास किया है। मुनिराज के गृहस्थावस्था के माता-पिता को सम्मान दिया है तो गुरु महाराज की महिमा और उपकार का भी वर्णन किया है। वैराग्य का कारण भी कुछ शब्दों में ही दर्शा दिया है। अंत में कवि कहता है — जो पथ आपने अपनाया है, वह सिद्धशिला से दोबारा वापस नहीं आएगा, यह मार्ग तो हमारे मन को भी भा गया है।
कम शब्दों में ही, कवि ने आरती में पूज्य मुनिवर के जीवन का चित्रण कर दिया है। भक्तजन प्रतिदिन सन्ध्या के समय इस आरती के साथ मुनिराज की भक्ति करते हैं और आनन्दित होते हैं।

