दार्शनिक प्रतिक्रमण

        अपने दैनिक जीवन में सामान्यजन व अव्रती श्रावक से कभी कभी अज्ञानता वश, अनजाने में, लापरवाही से अनेक गलतियाँ एवं भूलें हो जाती हैं। कभी लिए हुए नियमों का उल्लंघन हो जाता है, घर गृहस्थी के कायों में सूक्ष्म जीवों की हिंसा हो जाती है। इन सभी दोषों एवं अतिचारों की शुद्धि और इनसे होने वाले अशुभ कर्म के बन्ध को क्षय करने का आत्मकल्याणकारी माध्यम है- यह लघु पर अति उपयोगी कृतिदार्शनिक प्रतिक्रमण 

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यह कृति क्यों ?

        जो श्रावक व्रत धारण कर लेते हैं, वह अपने व्रतों के लिए निरन्तर जागरूक रहते हैं और अनजाने में या प्रमाद से व्रतों में कोई दोष या अतिचार लग गए हो तो उसके लिए, प्रतिदिन वे प्रतिक्रमण करते हैं। साधारण भाषा में अपने दोषों की आलोचना या प्रायश्चित करके उनकी शुद्धि करना ही प्रतिक्रमण कहलाता है।

       अज्ञानता, प्रमाद या लापरवाही से की गई किसी भी भूल या दोष का प्रायश्चित करने से, उस दोष के कारण हुए अशुभ कर्म बंध का क्षय होता है और मन भी उस दोष के भार से अपने को हल्का  अनुभव करता है। व्रती श्रावकों के लिए तो प्रतिक्रमण कैसे करें, यह विधि उपलब्ध थी पर सामान्य जन और अव्रती श्रावक किस प्रकार अपने दोषों की आलोचना करके अशुभ कर्म का क्षय करें ? इसके लिए प्रतिक्रमण विधि क्या हो? कैसे वे प्रतिक्रमण करें?  इस विधि का अभाव  अनुभव होता था। परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने श्रावकों की इस समस्या को समझा और दार्शनिक प्रतिक्रमण कृति की रचना कर, उनके इस अभाव को दूर कर दिया।

दार्शनिक प्रतिक्रमण कृति किसके लिए है —

            कृति के रचयिता पूज्य मुनि श्री कहते हैं — जिन दर्शन (कुल) में जन्म लेने वाले और विशेषतः श्रद्धा रखने वाले सभी दार्शनिक हैं। जिन्होंने दर्शन प्रतिमा मात्र को ग्रहण किया है, वे भी दार्शनिक हैं। इन सभी दार्शनिकों के लिए यह प्रतिक्रमण पाठ है।           इस प्रकार अव्रती श्रावक जिन्होंने कोई व्रत नहीं लिए  लेकिन देव, शास्त्र, गुरु पर दढ़ विश्वास रखते हैं। पाक्षिक श्रावक जो सप्त व्यसन का त्याग और अष्टमूल गुणों के साथ छोटे-छोटे नियमों व सकल्पों का भी पालन करते हैं।  प्रथम दर्शन प्रतिमा धारण करने वाले सभी श्रावक इस दार्शनिक प्रतिक्रमण द्वारा दोषों एवं अतिचारों की विशुद्धि कर  सकते हैं।

कृति की कुछ विशेषताएं—

(1)    इस कृति में भक्ति और प्रतिक्रमण दोनों ही समाहित हैं। श्रावक प्रतिक्रमण करते समय  एक ओर, अपने दोषों की आलोचना करता जाता है, दूसरी ओर, अनेक भक्तियों के माध्यम से भक्तिभावों में वृद्धि करता है।

 (2)    इस कृति से पांच अणुव्रत, सप्तव्यसन और अष्ट मूलगुणों के बारे में और कौन से कार्यों को करने से इनमें दोष लग जाते हैं? इस सम्बन्ध में पर्याप्त ज्ञान मिलता है।

(3)   प्रत्येक अणुव्रत, मूल गुण और सप्त व्यसन त्याग में लगे दोषों एवं अतिचारों की शुद्धि के लिए किस प्रकार अपनी आलोचना की जाती है? इस कृति के माध्यम से सीखा जा सकता है।

(4)    कृति में दी गई चौबीस तीर्थंकर भक्ति, वीर भक्ति और अन्य भक्तियों द्वारा प्रतिक्रमण में रुचि बढ़ती है और भावों में विशुद्धि आती है।

(5)   पूर्व आचार्यों के द्वारा बताए गए अनुक्रम से पूरी प्रतिक्रमण विधि को इस कृति में संयोजित किया गया है।

 (6)   इस कृति की प्रस्तावना में पूज्य मुनि श्री ने यह बताया है कि इस कृति की रचना कहाँ और किस प्रकार हुई, जिसको पढ़ कर मन उत्साह और प्रसन्नता से भर जाता है। 

(7)   कृति में  प्राकृत भाषा में प्रतिक्रमण एवं संस्कृत भाषा भक्ति के साथ उनका हिंदी में अर्थ भी दिया गया है, जिससे प्रतिक्रमण पाठ व भक्तियों को समझने में सहायता मिलती है और प्राकृत और संस्कृत भाषा का ज्ञान भी बढ़ता है।

 (8)   दूसरे की निन्दा करना, उनके लिये बुरे शब्द सोचना, ये तो व्यक्ति सरलता से कर लेता है लेकिन इस कृति के माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्म निन्दा करना, स्वयं को महामूर्ख, कपटी,आलसी, धूर्त, लोभी कहकर  अपनी आलोचना करना जैसा कठिन कार्य करन भी सीखता है।

 (9)      छोटे व ना दिखाई देने वाले, सूक्ष्म जीवों से क्षमा मांगना, भगवान के प्रति अपने गहन तीव्र समर्पण भाव व्यक्त करते हुए उनकी वन्दना करना, उनके जैसे गुणों की प्राप्ति की प्रार्थना करना, यह सभी, उत्कृष्ट गुण श्रावक में इस कृति के माध्यम से प्रतिक्रमण करने से आ जाते हैं।

 (10)   इसके अतिरिक्त, अंत में पूज्य मुनि श्री द्वारा रचित नई छह ढाला को भी इस कृति में सम्मलित  किया गया है जिससे प्रतिक्रमण के बाद पाठक गण नई छह ढाला का पाठ भी कर सकते हैं।

         निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं, इस लघु कृति में प्रतिक्रमण पाठ, अनेक भक्ति और नई छह ढाला जैसे  रोचक और उपयोगी विषयों का लाभ मिलता है।  यह कृति प्रतिदिन प्रतिक्रमण करने में सहायक होती है। इसी कारण यह लघु कृति सामान्य जन के लिये, अशुभ कर्मों का क्षय करने का उपयोगी माध्यम है और आत्म संतुष्टि प्रदान करने वाला एक अनमोल उपहार है।

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