16. प्रवचन वत्सलत्व भावना

(सोलहकारण भावना)

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प्रवचन वत्सलत्व भावना

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दश प्रकार के धर्म भाव में, विनय भाव से रमता है
सद्वृष्टि श्रावक साधु की, योग्य विनय भी करता है।
विनय भाव वात्सल्य भाव है, जो साधक यह जान रहा
प्रवचन वत्सल धारक साधक, तीर्थंकर पथ मान रहा॥2॥

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सहधर्मी स्नेह सलिल से, चित्त कलुषता को धोता
अन्तरमन से कोमल इतना, सुमन श्रमण का मन होता।
जिसके मन में प्रेमभाव है, क्षमाभाव है, सुन्दर है,
सहधर्मी वात्सल्य भाव ही, प्रवचन का नित आदर है॥4॥

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विनय और वात्सल्य भाव दो, गुण हैं पर सापेक्षित हैं
जहाँ एक है वहीं दूसरा, नयन मार्ग सम ऐच्छिक हैं।
दोनों में से एक भाव भी, जिसमें उसमें दूजा भी
प्रवचन वत्सलता में रहते, प्रेमभाव गुण पूजा भी॥6॥

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जो विशुद्ध समकित भावों से, समता सुख में डूब रहा
प्रेम भाव सब आतम पर रख, शुभ भावों में खूब रहा।
इसी भाव से आतम बांधे, तीन लोक सुखकारक कर्म
जिसके उदय फलों में होता, जग जीवों को अनुपम शर्म॥8॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं प्रवचन वत्सलत्व भावना ममाSस्तु।


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15. मार्ग प्रभावना भावना

(सोलहकारण भावना)

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मार्ग प्रभावना भावना

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सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरण को, जो नित ध्याता ध्यानी है
औरों को उपदेश दे रहा, वो भविजन ही ज्ञानी है
दुर्लभ से दुर्लभतम मारग, जिनवर का सब को हो ज्ञात
शिव मारग रत वही सन्त ही, स्वयं जगत में हो विख्यात॥2॥

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जिनवाणी के पोषण हेतू, नव श्रुत रचना श्रुत अनुरूप
तथा जीर्ण श्रुत की रक्षा भी, नव प्रकाश का भी प्रारूप।
किन्तु सूत्र, पद, अर्थ, भाव को, नहीं बदलता एक प्रवाह
धर्म बढ़ाता प्रभावना भी, उसकी जग में होती वाह॥4॥

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विकथा वचन नहीं जो करता. आगम के अनुरूप वचन
बिना गिने सामायिक करता, मन रहता निरपेक्ष चमन ।
साम्य भाव है धर्म हमारा, वह ही आतम का सुखकन्द
निरत रहा जो इसी भाव में, उसी श्रमण को है आनन्द॥6॥

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धर्म ग्रहण कर प्रभावना के, हेतु छोड़ता जो निज धर्म
वो मूरख जग-वैद्य बना है, रुग्ण कह रहा औषध मर्म।
ज्ञानी जन को हास्य पात्र जो, मरण समाधि रहित मुआ
अन्त नहीं खुद का यदि संभला, क्या प्रभावना अर्थ हुआ?॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं मार्ग प्रभावना भावना ममाSस्तु।


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14. आवश्यकापरिहाणी भावना

(सोलहकारण भावना)

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आवश्यकापरिहाणी भावना

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आवश्यक हैं छह प्रकार के, परम श्रमण इनको साधे
रत्नत्रय के पालनहारे, रत्नत्रय को आराधे।
शिक्षा, दीक्षा आदि काल जो, साथ-साथ में साध रहा
श्रमण वही निज चरित धर्म को, पाल रहा निर्बाध रहा॥2॥

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सामायिक, वन्दन आदिक जो, श्रमण नहीं नित करता है
उसको भेष मात्र से लख यदि, श्रावक पूजा करता है।
धर्म रहित का पूजक जन भी, धर्म रहित हो जाता है
भाव रहित, अज्ञानी जन वो, भव वन में खो जाता है॥4॥

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जिस विधि से जिस समय पे करना, कह गया जिनवाणी में
उस विधि से उस समय पे करता, नहीं रमें मनमानी में।
जीवन भर जिन आज्ञा का जो, भार धार भी हल्का है
आवश्यक परिपूर्ण यती को, नहीं भरोसा पल का है॥6॥

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प्रतिक्रमण आदिक आवश्यक, शब्द बोल जो करता है
आवश्यक व्यवहार कहे हैं, उनसे भी मन भरता है।
मन भरकर फिर वचन बिना जो, मौन ध्यान के आश्रय से
निश्चय को पा लेता मुनि जो, पूर्ण हुआ आवश्यक से॥8॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं आवश्यकापरिहाणी भावना ममाSस्तु।


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13. प्रवचन भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

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प्रवचन भक्ति भावना

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जिन प्रवचन के बिना कभी भी, ज्ञान पा सके तीर्थंकर
चरम शरीरी ज्ञानी जन भी, जिस बिन नहीं लहें शिववर।
उच्च नीच का भाव छोड़कर, सबके लिए समान रहे
उन प्रवचन को मन में रखकर, मन ही मन हम विलस रहे॥2॥

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भवनाशन के साधक कारण, चार कहे जिन-आगम में
द्वादशांग का ज्ञान प्रथम है, दूजा भक्ति जिनागम में।
तथा तीसरा करण भाव ही, कारण तीजा कहलाता
समुद्घात श्री जिन केवलि का, चौथा कारण मन भाता॥4॥

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आतम का स्वरूप कैसा है, कैसा है परमातम रूप
चतुर्गति में दुख सुख कितना, क्या सुख बना मही का भूप।
क्या शरीर है, क्या स्वभाव है, भोग सुखों में दुख का मूल
श्री जिनवाणी प्रकट दिखाती, शिव सुख का भी सम्यक् कूल॥6॥

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शुद्धातम ही निज स्वभाव है, राग-विभाव बना दुखकार
भेदज्ञान के बल से भासे, पृथक-पृथक सब का आकार।
मनुज जन्म का सार मुक्ति है, मुक्ति सुखो को पाने हेतु
नमन करूँ मैं जिनवाणी को, मुक्ति का जो है नित सेतु॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं प्रवचन भक्ति भावना ममाSस्तु।


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12. बहुश्रुत भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

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बहुश्रुत भक्ति भावना

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शास्त्र ज्ञान के भाव ज्ञान से, शीतल जल से नहा रहे
स्वयं धो रहे विधि-अघ रज को, पाप कलुषता बहा रहे।
देह आत्म का विभ्रमनाशी, तत्त्व दिखाकर भविकों को
स्वयं स्वस्थ हैं स्वस्थ , नमूँ-नमूँ श्रुत श्रमिकों को॥2॥

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महामुनीश्वर जिनने सीखा, गुरु पद निकट शास्त्र का ज्ञान
विनय भरी निज हृदय वेदि पर, किया मनन चिंतन संधान।
रत्नत्रय संयुक्त ऋषिवर, श्रुतज्ञानी जिनमत आधार
उनकी पदरज से मम मस्तक, शोभित होवे हर्ष अपार॥4॥

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धवल आदि सिद्धांत ग्रन्थ के, जो रहस्य को जान रहे
वे ही समयसार को पढ़कर, निज आतम को जान रहे।
कर विश्वास निजातम पर जो, शुद्धातम को ध्याते हैं
उन पाठक साधु के चरणन, नित हम शीश झुकाते हैं॥6॥

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निश्चय और व्यवहार नयों से, निर्विरोध सब अर्थ यहाँ
हर पहलू से वस्तु समझते, ऐसे साधु विरल यहाँ।
सदा दे रहे धर्म देशना, दोनों नय से भक्ति से
बहुश्रुतवन्त महामुनिवर को, नमन कर रहा निज मति से॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं बहुश्रुत भक्ति भावना ममाSस्तु।


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11. आचार्य भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

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आचार्य भक्ति भावना

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जो जन्म-जन्म के पुण्य भविक जन, जब संचित कर लेते हैं
गुण-गण भरे देह सूरी की, दिव्य मूर्ति तब लखते हैं।
सर्व लोक में जिनकी महिमा, जैन धर्म को बता रही
उन आचार्य देव की जग में, धर्म ध्वजा पथ बता रही॥2॥

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दो नय की आँखों से सबको, गुरुवर पथ दिखलाते हैं
बिना लोभ के ज्यों स्वभाव से, दीप प्रकाश दिखाते हैं।
व्रत-समिती-गुप्ति से पूरण, पंचाचार परायण हैं
जयवन्तें आचार्य देव जो, नर होकर नारायण हैं॥4॥

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मत एकान्त समर्थन करने, वालों से ना घुले मिले
ख्याति लाभ की इच्छा से ना, मान दिलाते मान मिले
नहीं प्रतिष्ठापन, ईर्यादिक, समिति गुप्ति का नाश करें
वह आचार्य परम परमेष्ठी, जयवन्ते भवि पाप हरें॥6॥

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उच्च मार्ग भ्रष्ट जो जीव रहे हैं, उनको सम्बोधन देकर
सम्यक् चारित ग्रहण कराते, शिव सुख का लालच देकर।
फिर उस शिष्य की रक्षा करते, विषय मोह से पापों से
सो जयवन्त रहें आचारज, पितु सम पाले प्राणों से॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं आचार्य भक्ति भावना ममाSस्तु।


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10. अरिहंत भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

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अरिहंत भक्ति भावना

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मोह महा विष आतम भीतर, पग-पग मूर्छित करता है
वह विषनाशक जिनवर भक्ति, जिससे आतम जगता है।
मन में भरे मदन को मद को, आलस को जो दूर करे
उन जिनवर पदकमल भक्ति कर, पुण्य फलों को पूर अरे॥2॥

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हुए सुशोभित समवशरण में, तीस चार अतिशय वाले
अष्ट प्रातिहार्यों की शोभा, देख सभी हों मतवाले।
उन अरिहंत परम जिनवर की, भक्ति महा अतिशयकारी
बिना मूल्य बहुमूल्य पदों को, सहज दिलाती सुखकारी॥4॥

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श्री जिनवर की भक्ति बिना, तो सम्यग्दर्शन नहीं रहे
रत्नत्रय की प्राप्ति नहीं तो, कहो समाधि कहाँ रहे?
बोधि समाधि बिना वह दीक्षित, नग्न मात्र हो क्या पाए?
चतुर्गति का दुःख निवारण, कैसे भिक्षु कर पाए?॥6॥

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भव्य जीव जो जिन भक्ति में, सहज रुचि को रखता है
और अन्य को उसी भक्ति में, रूचि करा हर्षाता है।
ऐसा पुण्यवान ही प्राणी, तीन लोक में कीरत पा
क्या-क्या सुफल नहीं देती है, भक्तों को जिनदेव कृपा॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं अरिहंत भक्ति भावना ममाSस्तु।


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