प्रवचन वत्सलत्व भावना
सम्यग्दर्शन ज्ञान-चरण में, जो भविजन रत रहते हैं
वे भविजन प्रवचन कहलाते, उनमें वत्सल धरते हैं।
निश्छल वत्सल भाव कहाता, ख्याति लाभ ना पूजा चाह
प्रवचन वत्सलता का धारक, श्रमण चले तीर्थंकर राह ॥1॥
–o–
दश प्रकार के धर्म भाव में, विनय भाव से रमता है
सद्वृष्टि श्रावक साधु की, योग्य विनय भी करता है।
विनय भाव वात्सल्य भाव है, जो साधक यह जान रहा
प्रवचन वत्सल धारक साधक, तीर्थंकर पथ मान रहा॥2॥
–o–
सब जीवों में करुण हृदय है, दया भाव से सिंचित है
तन नो-कर्म राग से हटकर, कर्म राग से वंचित है।
शुद्धातम की छटा निरखता, प्रवचन वत्सल धारक है
तीर्थंकर पद पाने हेतु, भाव यही शुभ कारक है॥3॥
–o–
सहधर्मी स्नेह सलिल से, चित्त कलुषता को धोता
अन्तरमन से कोमल इतना, सुमन श्रमण का मन होता।
जिसके मन में प्रेमभाव है, क्षमाभाव है, सुन्दर है,
सहधर्मी वात्सल्य भाव ही, प्रवचन का नित आदर है॥4॥
–o–
कोई भी ना अपना जग में, कोई नहीं पराया है
सभी अचेतन चेतन पन में, समता भाव सुहाया है।
जो सब का सुख चाह रहा है, राग, द्वेष से दूर रहे
उसके मन में सहधर्मी से, वत्सलता का पूर बहे॥5॥
–o–
विनय और वात्सल्य भाव दो, गुण हैं पर सापेक्षित हैं
जहाँ एक है वहीं दूसरा, नयन मार्ग सम ऐच्छिक हैं।
दोनों में से एक भाव भी, जिसमें उसमें दूजा भी
प्रवचन वत्सलता में रहते, प्रेमभाव गुण पूजा भी॥6॥
–o–
तिरस्कार सहधर्मी का जो, करता है, वह मानी है
ऐसा कर निज धर्म घट रहा, ना जाने अज्ञानी है।
ईर्ष्या दाह कलुषता रखकर, शिव मारग का शत्रु बना
क्लेश भाव से शिवपथ चलना, गिर-गिर पंगु गिरि चढ़ना॥7॥
–o–
जो विशुद्ध समकित भावों से, समता सुख में डूब रहा
प्रेम भाव सब आतम पर रख, शुभ भावों में खूब रहा।
इसी भाव से आतम बांधे, तीन लोक सुखकारक कर्म
जिसके उदय फलों में होता, जग जीवों को अनुपम शर्म॥8॥
–o–
इस प्रकार तीर्थंकर भावन, श्रुतभक्ति से ग्रन्थ रचा
मुनि प्रणम्यसागर ने नित जो, गुरु भक्ति में रचा पचा।
ध्यान लगाकर भाव भक्ति से, जो जन इसे त्रिकाल पढ़े
वह अनन्त मुक्ति सुख पाकर, अक्षय पद में रहें खड़े॥9॥
–o–
ऊँ ह्रीं अर्हं प्रवचन वत्सलत्व भावना ममाSस्तु।
प्रवचन वत्सलत्व भावना ध्यान






