आवश्यकापरिहाणी भावना
श्रमण वही जो षट् आवश्यक, पाल रहा है निज रुचि से
धर्म क्रिया के वशीभूत है, मन-वच-तन त्रय की शुचि से।
आवश्यक में हानी करना, धर्म हानि जो जान रहा
उसके द्वारा ही आवश्यक, पूर्ण हुए श्रुतगान रहा॥1॥
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आवश्यक हैं छह प्रकार के, परम श्रमण इनको साधे
रत्नत्रय के पालनहारे, रत्नत्रय को आराधे।
शिक्षा, दीक्षा आदि काल जो, साथ-साथ में साध रहा
श्रमण वही निज चरित धर्म को, पाल रहा निर्बाध रहा॥2॥
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आवश्यक पालन ना करता, श्रमण नहीं वह जिनमत में
जिनवर की आज्ञा ना माने, सदा भटकता भव वन में।
स्वयं रहित वह समदर्शन से, आत्म प्रशंसा में रमता
मन के इस मिथ्या सुख से वह, कितना भ्रम खुद में रखता?॥3॥
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सामायिक, वन्दन आदिक जो, श्रमण नहीं नित करता है
उसको भेष मात्र से लख यदि, श्रावक पूजा करता है।
धर्म रहित का पूजक जन भी, धर्म रहित हो जाता है
भाव रहित, अज्ञानी जन वो, भव वन में खो जाता है॥4॥
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क्वचित् कदाचित् यदि वह साधू, अन्य कार्य में लग जाता
अप्रमत्त वह सावधान हो, उन्हें छोड़ निज में जाता।
नहीं शीघ्रता आवश्यक के, पूरण में वह कभी करे
या विलम्ब भी यथाकाल का, उल्लंघन कर नहीं करे॥5॥
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जिस विधि से जिस समय पे करना, कह गया जिनवाणी में
उस विधि से उस समय पे करता, नहीं रमें मनमानी में।
जीवन भर जिन आज्ञा का जो, भार धार भी हल्का है
आवश्यक परिपूर्ण यती को, नहीं भरोसा पल का है॥6॥
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प्रतिदिन प्रति रजनी में रहता, श्रमण जागता खेद बिना
आवश्यक की हानि उसे तो, नहीं सहन निर्वेद बना।
ढोता नहीं कर्म रज धोता, नव विशुद्धि से मन भरपूर
उसके ही षट् आवश्यक का, योग बना है संयम पूर॥7॥
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प्रतिक्रमण आदिक आवश्यक, शब्द बोल जो करता है
आवश्यक व्यवहार कहे हैं, उनसे भी मन भरता है।
मन भरकर फिर वचन बिना जो, मौन ध्यान के आश्रय से
निश्चय को पा लेता मुनि जो, पूर्ण हुआ आवश्यक से॥8॥
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जनरंजन का ध्यान छोड़कर, नित्य निरंजन आतम में
मन वच तन के द्वारा रमता, साधू षट् आवश्यक में।
ज्यों विशिष्ट विद्या का अर्थी, पूर्ण अंक की चाह रखे
त्यों ही श्रमण सभी आवश्यक, पूर्ण करन की चाह रखें॥9॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं आवश्यकापरिहाणी भावना ममाSस्तु।
आवश्यकापरिहाणी भावना ध्यान
