14. आवश्यकापरिहाणी भावना

(सोलहकारण भावना)

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आवश्यकापरिहाणी भावना

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आवश्यक हैं छह प्रकार के, परम श्रमण इनको साधे
रत्नत्रय के पालनहारे, रत्नत्रय को आराधे।
शिक्षा, दीक्षा आदि काल जो, साथ-साथ में साध रहा
श्रमण वही निज चरित धर्म को, पाल रहा निर्बाध रहा॥2॥

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सामायिक, वन्दन आदिक जो, श्रमण नहीं नित करता है
उसको भेष मात्र से लख यदि, श्रावक पूजा करता है।
धर्म रहित का पूजक जन भी, धर्म रहित हो जाता है
भाव रहित, अज्ञानी जन वो, भव वन में खो जाता है॥4॥

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जिस विधि से जिस समय पे करना, कह गया जिनवाणी में
उस विधि से उस समय पे करता, नहीं रमें मनमानी में।
जीवन भर जिन आज्ञा का जो, भार धार भी हल्का है
आवश्यक परिपूर्ण यती को, नहीं भरोसा पल का है॥6॥

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प्रतिक्रमण आदिक आवश्यक, शब्द बोल जो करता है
आवश्यक व्यवहार कहे हैं, उनसे भी मन भरता है।
मन भरकर फिर वचन बिना जो, मौन ध्यान के आश्रय से
निश्चय को पा लेता मुनि जो, पूर्ण हुआ आवश्यक से॥8॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं आवश्यकापरिहाणी भावना ममाSस्तु।


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