अरिहंत भक्ति भावना
भूत काल में जो नर मुक्ति, गये, जा रहे, जाएंगे
वे अरिहन्त चरण की भक्ति, का फल पाए पाएँगे।
जिनकी भक्ति करते करते, परिणति सम्यक् हो जाती
ऐसी अर्हंद् भक्ति करने, क्यों तव मति ना लग जाती॥1॥
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मोह महा विष आतम भीतर, पग-पग मूर्छित करता है
वह विषनाशक जिनवर भक्ति, जिससे आतम जगता है।
मन में भरे मदन को मद को, आलस को जो दूर करे
उन जिनवर पदकमल भक्ति कर, पुण्य फलों को पूर अरे॥2॥
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दूर रहे अरिहन्त देव की, भक्ति का माहात्म्य यहाँ
उनकी प्रतिमा की भक्ति भी, भव वृद्धि की रोक यहाँ।
ज्यों विषनाशक मन्त्र शक्ति से, विष तन का हो दूर अवश्य
त्यों श्रद्धा से श्री जिनेन्द्र की, मोह महाविष हरे अवश्य॥3॥
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हुए सुशोभित समवशरण में, तीस चार अतिशय वाले
अष्ट प्रातिहार्यों की शोभा, देख सभी हों मतवाले।
उन अरिहंत परम जिनवर की, भक्ति महा अतिशयकारी
बिना मूल्य बहुमूल्य पदों को, सहज दिलाती सुखकारी॥4॥
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मैने दीक्षा धारण कर ली, श्री जिनवर का रुप मिला
रहा प्रयोजन क्या भक्ति से, संयम का उपहार मिला।
जो विचारता ऐसा साधु, वह संयम की बाधाएँ
कैसे नाश करेगा फिर वह, कर्मों की आबाधाएँ॥5॥
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श्री जिनवर की भक्ति बिना, तो सम्यग्दर्शन नहीं रहे
रत्नत्रय की प्राप्ति नहीं तो, कहो समाधि कहाँ रहे?
बोधि समाधि बिना वह दीक्षित, नग्न मात्र हो क्या पाए?
चतुर्गति का दुःख निवारण, कैसे भिक्षु कर पाए?॥6॥
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भव्य जीव जो जिन भक्ति में, सहज रुचि को रखता है
और अन्य को उसी भक्ति में, रूचि करा हर्षाता है।
ऐसा पुण्यवान ही प्राणी, तीन लोक में कीरत पा
क्या-क्या सुफल नहीं देती है, भक्तों को जिनदेव कृपा॥7॥
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देह-आत्म के भेद ज्ञान की, शक्ति मिले जिन भक्ति से
निज इन्द्रिय को वश में रखकर, कर्म हने निज शक्ति से।
कर्मों की जो शक्ति निकाचित, औ निधत्ति भी विनश रही
सब जप-तप से बढ़कर भक्ति, अचरज रखकर विलस रही॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं अरिहंत भक्ति भावना ममाSस्तु।
अरिहंत भक्ति भावना ध्यान
