13. प्रवचन भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

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प्रवचन भक्ति भावना

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जिन प्रवचन के बिना कभी भी, ज्ञान पा सके तीर्थंकर
चरम शरीरी ज्ञानी जन भी, जिस बिन नहीं लहें शिववर।
उच्च नीच का भाव छोड़कर, सबके लिए समान रहे
उन प्रवचन को मन में रखकर, मन ही मन हम विलस रहे॥2॥

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भवनाशन के साधक कारण, चार कहे जिन-आगम में
द्वादशांग का ज्ञान प्रथम है, दूजा भक्ति जिनागम में।
तथा तीसरा करण भाव ही, कारण तीजा कहलाता
समुद्घात श्री जिन केवलि का, चौथा कारण मन भाता॥4॥

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आतम का स्वरूप कैसा है, कैसा है परमातम रूप
चतुर्गति में दुख सुख कितना, क्या सुख बना मही का भूप।
क्या शरीर है, क्या स्वभाव है, भोग सुखों में दुख का मूल
श्री जिनवाणी प्रकट दिखाती, शिव सुख का भी सम्यक् कूल॥6॥

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शुद्धातम ही निज स्वभाव है, राग-विभाव बना दुखकार
भेदज्ञान के बल से भासे, पृथक-पृथक सब का आकार।
मनुज जन्म का सार मुक्ति है, मुक्ति सुखो को पाने हेतु
नमन करूँ मैं जिनवाणी को, मुक्ति का जो है नित सेतु॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं प्रवचन भक्ति भावना ममाSस्तु।


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