आचार्य भक्ति भावना
निज आतम उद्धार हेतु जो, साधु बने हैं भावों से
साथ-साथ जग का कल्याणक, बने सूरि सद्भावों से।
स्वयं पुण्य से बने, पुण्य से, लाभ मिले आचारज का
भव वैतरणी पार करन को, नाव मिली फिर अचरज क्या॥1॥
–o–
जो जन्म-जन्म के पुण्य भविक जन, जब संचित कर लेते हैं
गुण-गण भरे देह सूरी की, दिव्य मूर्ति तब लखते हैं।
सर्व लोक में जिनकी महिमा, जैन धर्म को बता रही
उन आचार्य देव की जग में, धर्म ध्वजा पथ बता रही॥2॥
–o–
जिनकी जग में निर्मल कीर्ति, दिगंतरों में छाती है
जैसे चन्द्र चाँदनी नभ में, उजली-उजली भाती है।
चन्द्र तुल्य जिनका मुख मण्डल, दर्शन शीतलता देता
रहें सदा जयवन्त जगत में, सूरि दर्श अघ हर लेता॥3॥
–o–
दो नय की आँखों से सबको, गुरुवर पथ दिखलाते हैं
बिना लोभ के ज्यों स्वभाव से, दीप प्रकाश दिखाते हैं।
व्रत-समिती-गुप्ति से पूरण, पंचाचार परायण हैं
जयवन्तें आचार्य देव जो, नर होकर नारायण हैं॥4॥
–o–
तीर्थंकर की दिव्य ध्वनी का, अति अथाह वच पान किया
अपनी मति अंजुलि से जिनने, पिया स्वयं फिर पिला दिया।
जो पाया वह बाँट रहे हैं, निज-पर उपकारक आचार्य
रहें सदा जयवन्त जगत में, परमेष्ठी पद धारक आर्य॥5॥
–o–
मत एकान्त समर्थन करने, वालों से ना घुले मिले
ख्याति लाभ की इच्छा से ना, मान दिलाते मान मिले
नहीं प्रतिष्ठापन, ईर्यादिक, समिति गुप्ति का नाश करें
वह आचार्य परम परमेष्ठी, जयवन्ते भवि पाप हरें॥6॥
–o–
उच्च मार्ग भ्रष्ट जो जीव रहे हैं, उनको सम्बोधन देकर
सम्यक् चारित ग्रहण कराते, शिव सुख का लालच देकर।
फिर उस शिष्य की रक्षा करते, विषय मोह से पापों से
सो जयवन्त रहें आचारज, पितु सम पाले प्राणों से॥7॥
–o–
महाव्रतों का भार धारते, निज आतम में बन अति नम्र
और शिष्य समुदाय पालते, महाबली जो पूरी उम्र।
भव दुख रोग विनाशन हेतू, दिव्य वैद्य बनकर आए
उनसे भक्ति प्रार्थना करके, बोधि-निरोग शक्ति पाए॥8॥
–o–
ऊँ ह्रीं अर्हं आचार्य भक्ति भावना ममाSस्तु।
आचार्य भक्ति भावना ध्यान
