मार्ग प्रभावना भावना
रत्नत्रय ही मोक्षमार्ग है, मारग अन्तर आतम का
इसको प्राप्त करे जो रुचि से, तिमिर भगाए आतम का।
भव्य वही जो इस मारग पर, हो आरूढ़, वही राही
उसी भरोसे मोक्षमार्ग की, नित होती है बड़वाही॥1॥
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सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरण को, जो नित ध्याता ध्यानी है
औरों को उपदेश दे रहा, वो भविजन ही ज्ञानी है
दुर्लभ से दुर्लभतम मारग, जिनवर का सब को हो ज्ञात
शिव मारग रत वही सन्त ही, स्वयं जगत में हो विख्यात॥2॥
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पहले जिसने दूर किया है, निज आतम का मिथ्या मल
वही दूसरों में भर सकता, मारग पर चलने का बल।
दोष छिपाकर गुण प्रशंसकर, सम्बल देकर बढ़ा रहा
सन्मारग की प्रभावना का, पाठ मौन रह पढ़ा रहा॥3॥
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जिनवाणी के पोषण हेतू, नव श्रुत रचना श्रुत अनुरूप
तथा जीर्ण श्रुत की रक्षा भी, नव प्रकाश का भी प्रारूप।
किन्तु सूत्र, पद, अर्थ, भाव को, नहीं बदलता एक प्रवाह
धर्म बढ़ाता प्रभावना भी, उसकी जग में होती वाह॥4॥
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जिनशासन आज्ञा का बन्धन, गुरु आज्ञा का भी बन्धन
संयम पालन का भी बन्धन, बन्धन माने भाग्य सघन।
बन्धन ही निर्बन्ध मुक्ति का, बीज रहा ज्यों तरु एरण्ड
प्रभावना हो जैन धर्म की, भाव यही है शुद्ध प्रचण्ड॥5॥
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विकथा वचन नहीं जो करता. आगम के अनुरूप वचन
बिना गिने सामायिक करता, मन रहता निरपेक्ष चमन ।
साम्य भाव है धर्म हमारा, वह ही आतम का सुखकन्द
निरत रहा जो इसी भाव में, उसी श्रमण को है आनन्द॥6॥
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धर्म ग्रहण कर प्रभावना के, हेतु छोड़ता जो निज धर्म
वो मूरख जग-वैद्य बना है, रुग्ण कह रहा औषध मर्म।
ज्ञानी जन को हास्य पात्र जो, मरण समाधि रहित मुआ
अन्त नहीं खुद का यदि संभला, क्या प्रभावना अर्थ हुआ?॥7॥
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धर्माचरण निरत भविजन को, नेह भाव से लखता है
उनकी संगति की भी इच्छा, वत्सल भाव झलकता है।
धर्माचरण विमुख जग जन से, करुणा की बुद्धि धारे
श्री जिनवाणी उन्हें सुनाकर, उपकृत करता जन सारे॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं मार्ग प्रभावना भावना ममाSस्तु।
मार्ग प्रभावना भावना ध्यान
