शीलव्रत अनतिचार भावना
धर्म देशना के अवसर पर, यत्र तत्र विचरण करते
अणुव्रत और महाव्रत का ही, वीर प्रभु वर्णन करते।
बिन अतिचार इसी संयम का, भाव सहित नित पालन कर
तथा भावना के पौरुष से, भाग्यवाद का वारण कर॥1॥
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जो समकित समदर्शी प्राणी, जिनवर कथित व्रतादिक को
रुचि से गहता भाग्य समझता, संयम, व्रत तप पालन को।
ग्रहण करूँ कब कठिन व्रतों को इस विधि भाव जगाता है
शील-व्रतों की करे भावना, भाव फलों को पाता है॥2॥
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ग्रहण किए हैं व्रत आदिक जो, उनके पालन में रमता
सावधान हो कायादिक से, प्राणिदया मन में रखता।
लोभादिक को जीत लिया तो, विकथा का क्या कारण हो
निरतिचार व्रत-शीलादिक को, पाल रहा साधारण हो॥3॥
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हो अनन्यमन एकमना वो, परमारथ रथ पर चढ़ता
स्वयं सारथी योद्धा भी हो, मन विकल्प रिपु से लड़ता।
पुण्य फलों से मिले भोग की, नाम, दाम की चाह बिना
बना विजेता मोक्षमार्ग का, व्रती वही निर्दोष बना॥4॥
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पंच व्रतों की रक्षा कारण, शील व्रतोंका अपनाना
बाड़ लगाकर बढ़ी फसल की, रक्षा करना ज्यों माना।
नित्य भावना उत्साहित हो, करे व्रती व्रत-शीलों की
लेखा-जोखा साफ-साफ, तो बहे धार गुण झीलों की॥5॥
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बाह्य जगत के कार्य-क्रमों में, निर्विकल्प जो बना हुआ
मन उलझन के भावों को तज, क्षोभ रहित हो तना हुआ।
इष्ट-अनिष्ट विकल्प मूर्खता, रही ज्ञानिता समता में
ऐसा मति में अवधारण कर, व्रती बढ़ रहा क्षमता में॥6॥
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शील महासागर लहराता, क्षमाभाव से अति गंभीर
नित उत्ताल तरंगों से जो, दोष फेंकता बाहर धीर।
आतम रत्नाकर गुण-वैभव, पर संयोग दोष का धाम
यह विचार कर शील व्रतों में, निरतिचार करता आराम॥7॥
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ग्रहण नहीं व्रत किये हैं मैने, किन्तु मुझे हैं प्राण मिले
व्रत मेरा आतम स्वरूप है, व्रत सेवन से त्राण मिले।
व्रत संयम में दोष लगाना, निज प्राणों की पीड़ा है
यह विचारता उसी व्रती का, दोष रहित व्रत बीड़ा है॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं शीलव्रतेषुअनति-चार भावना ममाऽस्तु।
शीलव्रत अनतिचार भावना ध्यान
