विनय सम्पन्नता भावना
मोक्ष मार्ग का नेता वह ही, बनता जिसमें विनय रही
सम्यग्दृष्टि जन का लक्षण, सबसे पहले विनय कही।
दर्शन ज्ञान-चरित्र मयी जो, शिव पथ में रुचि रखता हो
शिवपथगामी जन से कैसे, भला अरुचि रख सकता वो?॥1॥
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जो रत्नत्रय धारण करके, नित उसका पालन करते
वही धर्म है जिसको धरके, धार्मिक सब जन हैं कहते।
जग में रहकर भी जो जग से, नहीं अपेक्षा कुछ रखते
उनके चरण कमल में दृष्टि, लगी सहज वो मद हरते॥2॥
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रत्नत्रय आतम का गुण है, आतम का ही धर्म कहा
अन्य द्रव्य में भला कहीं, यह पाया जाता कहो ? अहा!
धर्म, गुणों को धारण करते, वे धार्मिक जन कहलाते
उनकी भक्ति में जो लगते, वे सम्यक् सुख पा जाते॥3॥
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मोक्ष मार्ग में लगे हुए की, दर्प युक्त होकर के जो
विनय चाहता, भक्ति चाहता, मान कषाय बढ़ाकर जो।
स्वयं बना अभिमानी है जो, स्वयं कषायी होकर आप
विनय योग्य वह कहो कहाँ से, हो सकता जब ना निष्पाप॥ 4॥
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जो जन विनय नही करता है, कैसे ऋजुता धर्म धरे
ऋजुता बिन मन भारी रहता, कैसे मन को सौख्य अरे!
इस जीवन में सुखी नहीं जो, कैसे आगे सुख पाए
बीज नहीं बोया तो मानव, कैसे तरुवर फल खाए?॥5॥
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तीर्थंकर, गणधर देवों ने, दो प्रकार तप बतलाए
विनय कहा अभ्यन्तर तप है, इसमें साधक मन लाए।
निर्मद मन ही हलका होकर, आतम में गोते खाता
डूब-डूब कर डुबकी लेता, करम मैल धोता जाता॥6॥
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उच्च कुलीन महाजन हो या, सुन्दर हो चौखा हो रूप
ज्ञान प्रशंसा भी हो जग में, वैभव सहित बना हो भूप।
फिर भी आत्म प्रशंसा करके, नहीं गर्व जो मन धारे
पूज्य पुरुष लख नयन झुकाता, विनयपूर्ण वच-तन सारे॥7॥
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नहीं ज्ञान का, पूजा का मद, ना जाति ना कुल का मद
बल, ऋद्धि का तप तपने का, ना शरीर का जिसको मद।
ऐसे मृदुतम भावों वाला, साधक अठ मद नाश रहा
उछल-उछल कर आत्म शक्ति से, शिव-सुख करता वास अहा॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं विनय सम्पन्नता भावना ममाSस्तु।
विनय सम्पन्नता भावना ध्यान
