पूजन, विधान, स्तुति, भक्ति के साथ-साथ, शान्तिनाथ भगवान चरित्र, कथा, पुराण एवं ज्ञान का उत्कृष्ट भंडार है— यह श्री शान्तिनाथ स्तुति-शतकम् (पूजन एवं विधान)

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किसी भी व्यक्ति के पास कितना भी धन, सम्पत्ति, वैभव हो लेकिन यदि उसके जीवन में, मन में शान्ति नहीं है तो इस धन-सम्पदा का भी, उसके जीवन में कोई आनन्द नही रहता। शान्ति (peace) वह बहुमूल्य सम्पदा है, जिसको प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में प्राप्त करना चाहता है। जिनालयों में भी प्रातः काल की बेला में, सर्वप्रथम शान्ति धारा के माध्यम से विश्व शान्ति की मंगल कामना की जाती है। पूजन, विधानआदि का समापन भी शान्ति पाठ से किया जाता है। विघ्न, बाधाओं और अशुभ कर्मों की शान्ति के लिए समय-समय पर शान्ति विधान के आयोजन भी किए जाते हैं। परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान की भक्ति और स्तुति में एक नई कृति की रचना की है।
परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज द्वारा रचित यह कृति “श्री शान्तिनाथ स्तुति-शतकम् (पूजन एवं विधान)” विलक्षण विशेषताएं लिए हुए, एक अतुलनीय,अनुपम कृति है।
क्या है विशिष्ट इस शान्तिनाथ स्तुति-शतकम् (पूजन एवं विधान) में—
(1) सर्वप्रथम वह सुन्दर संयोग, जब इस कृति की रचना हुई। इस कृति की रचना उस क्षेत्र पर हुई, जहाँ श्री शान्तिनाथ भगवान का जन्म हुआ, गर्भ कल्याणक हुआ, जिस धरा पर भगवान ने तप किया, इस पावन भूमि पर भगवान के समवशरण भी लगे। भगवान की पावन वर्गणायें जहाँ बिखरी पड़ी है, ऐसी पावन धरा पर,जब परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रथम बार मंगल प्रवेश का समय आया, तो इन शुभ वर्गणाओं का ऐसा अद्भुत प्रभाव रहा कि वहाँ प्रवेश से दो-तीन दिन पूर्व ही, पूज्य मुनि श्री की कलम से संस्कृत में भगवान शान्तिनाथ की स्तुति में भक्ति-श्लोकों की रचना प्रारंभ हो गई।
(2) वर्ष 2019, दिसंबर के अन्तिम सप्ताह की भीषण सर्दी का समय, शीत का असहनीय परिषह सहते हुए भी, पूज्य मुनि श्री निरन्तर अपना लेखनकार्य करते रहे। सभी को आश्चर्यचकित करते हुए, पूज्य मुनि श्री की अद्भुत लेखनी से संस्कृत के 120 श्लोकों की रचना, हस्तिनापुर प्रवास के लघु समय में ही हो गई।
(3) भगवान ने किस तरह, इस पावन धरा पर तप किया होगा, इसका अहसास वहाँ पर पूज्य मुनि श्री के शीत परिषह-जय को देखकर हो रहा था। भगवान के समवशरण और दिव्य ध्वनि से पावन हुए इस क्षेत्र पर पूज्य मुनि श्री के लेखन कार्य को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भगवान की दिव्यध्वनि ही लिपिबद्ध हो रही हो। संस्कृत के 120 श्लोक तो यहाँ पूर्ण हुए ही, इसके साथ-साथ हिंदी के पदों की रचना भी इस पावन धरा पर प्रारम्भ हो गई।
ऐसा संयोग बहुत दुर्लभ देखने को मिलता है, पर ऐसा संयोग हुआ और भव्यजनों को शान्तिनाथ स्तुति-शतकम् (पूजन एवं विधान) के रूप में एक अनुपम उपहार पूज्य मुनि श्री की ओर से मिल गया।
(4) पूज्य मुनि श्री ने संस्कृत में अनेक शतकों की रचना की है, उसी श्रंखला में यह, श्री शान्तिनाथ स्तुति-शतकम् , पूज्य मुनि श्री द्वारा रचित एक नया संस्कृत शतक है। इस शतक में 100 नहीं, अपितु 120 संस्कृत श्लोक हैं। इसके साथ ही इसमें हिंदी के भी 120 काव्य पद हैं। इस तरह इस कृति में संस्कृत के साथ, हिंदी शतक भी समाहित है। इसके अतिरिक्त विधान की प्रारम्भिक क्रियाएं और प्रत्येक श्लोक-पद के पश्चातअर्घ्य मंत्र को भी इसमें दिया गया है, जिससे यह पूजन-विधान भी बन गया है। श्रावकों का जब मन करे, संस्कृत में श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान की स्तुति पढ़ें या हिंदी में भक्ति करें या जब चाहें पूजन-विधान करें, इन तीनों का अनोखा समावेश इस कृति में किया गया है।
(5) इस स्तुति-शतकम् एवं विधान में भक्ति, स्तुति, पूजा, अर्चना, तो है ही, जैसे अन्य स्तोत्र एवं पूजा विधानों में होती है, इसके अतिरिक्त इसमें भगवान शान्तिनाथ के जीवन की संपूर्ण कथा भी साथ साथ चलती है।
(6) स्तुति को पढ़ते हुए या विधान को करते हुए ऐसा अनुभव होता है जैसे शान्तिनाथ भगवान की पूरी चरित्रकथा या शान्तिनाथ पुराण ही पढ़ लिया हो, वह भी इतने कम समय में। भक्ति के साथ, स्वाध्याय जैसा आनन्द इस स्तुति एवं विधान में आता है।
(7) जैसे किसी कथा में बीच-बीच में भजन आ जाते हैं तो भक्तों में उत्साह बढ़ जाता है, वैसे ही इस स्तुति एवं विधान में शान्तिनाथ भगवान की कथा जैसे जैसे आगे बढ़ती है, बीच-बीच में भगवान की भक्ति, स्तुति के पद आते रहते हैं, जिससे भावों में विशुद्धि व आनन्द बढ़ता जाता है।
(8) इस स्तुति- शतकम् विधान में संस्कृत के सुन्दर ,अद्धितीय श्लोक हैं। साथ ही उनके हिन्दी पद एवं प्रत्येक श्लोक के ऊपर एक शीर्षक भी दिया गया है, जिससे पदों की विषय वस्तु स्पष्ट हो जाती है और उनको समझना सरल हो जाता है।
(9) आरम्भ के 5 पदों में रचयिता कवि, पूज्य मुनि श्री का समर्पण, भाव देख सभी के मस्तक प्रभु चरणों में झुक जाते हैं। पूज्य मुनि श्री जब स्वयं को शक्तिविहिन, मतिविहिन प्रभु चरणों का भ्रमर, कहकर सम्बोधितकरते हैं तो समझ आ जाता है, इस स्तुति- विधान में भक्ति व समर्पण की पराकाष्ठा देखने को मिलेगी और यह अनुमान पूर्णतया: सत्य साबित होता है।
(10) रचयिता पूज्य मुनि श्री स्वयं को ऐसा पक्षी बताते हैं, जिसको नहीं पता कि उसमें उड़ने की शक्ति है या नहीं, फिर भी वह गगन में उड़ता है। वे कहते हैं, पक्षी की तरह मुझे भी नहीं पता, मेरी सामर्थ्य प्रभु भक्ति करने की है या नहीं, फिर भी मैं भगवान की स्तुति करने के लिए तैयार हो गया हूं। सर्मपण भक्ति के ये प्रारंभिक पद ही भक्तों को श्रद्धा ,विश्वास व विनय भावों से भर देते हैं।
(11) शान्तिनाथ भगवान के 12 भवों का रोचक वर्णन इस स्तुति एवं विधान में मिलता है– किस प्रकार पूर्व भवों में आहार दान की महिमा से भोगभूमि, फिर देवगति, उसके बाद विदेह क्षेत्र में, तत्पश्चात देव गति, पुनः मनुष्य और देव गति के क्रम के साथ ऊपर ऊपर के देव विमानों में प्रभु का गमन हुआ और फिर जन्म से 2 भव पूर्व सोलहकारण भावना भाकर, प्रभु ने तीर्थकर नाम कर्म प्रकृति का बन्ध किया।
(12) प्रभु के 12 भवों के वर्णन के साथ ही, पांचों कल्याणक का इतना सजीव चित्रण, स्तुति एवं विधान के पदों में मिलता है कि एक चलचित्र सा ही मस्तिष्क में चलने लगता है।
(13) भगवान के बाल्यकाल, कुमारावस्था का वर्णन, भगवान के पुण्य की महिमा, 14 रत्न एवं 9 निधियों का वर्णन भी भक्तों को उत्साहित कर देता है। कौन से 7 अचेतन रत्न होते हैं और वे कहां प्रकट हुए? 7 चेतन रत्न शान्तिनाथ प्रभु को कैसे प्राप्त हुए। नौ निधियां कहां-कहां प्रकट हुईं? इसका गहन ज्ञान भी भक्तों को प्राप्त हो जाता है।
(14) भगवान को वैराग्य कैसे हो गया? इतने वैभव में उनकी मनोस्थिति अचानक किस तरह परिवर्तित हो गई? संसार,शरीर, और भोगों के बारे में भगवान अब क्या सोचने लगे ? इसका भी हृदयस्पर्शी चित्रण यहाँ प्राप्त होता है।
(15) भगवान का दीक्षाभिषेक, तप कल्याणक, ज्ञान कल्याणक, समवशरण की महिमा, दिव्य ध्वनि, प्रभु का विहार, निर्वाण कल्याणक, इन सभी का ज्ञान से परिपूर्ण वर्णन इस स्तुति-विधान में मिलता है।
(16) इस स्तुति-विधान में जो अद्भुत सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त होता है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। तीन-चार घंटे के विधान में यदि भक्त एकाग्रता रखता है तो उसकी झोली ऐसे सूक्ष्म ज्ञान से भर जाती है जिसका उसको इससे पहले कोई अनुमान नहीं होता। यह विशेष ज्ञान भक्तों को सन्तोष, आत्मिक आनन्द और मानसिक शान्ति की अनुभूति देता है।
(17) बहुत से प्रश्न, सवाल, जिज्ञासाओं का भी समाधान इस स्तुति- शतकम् एवं विधान में स्वयंमेव प्राप्त हो जाता है।
(18) इस स्तुति एवं विधान की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि जितनी बार इसको पढ़ा जाता है, विधान को किया जाता है, आनन्द की निरन्तर वृद्धि होती जाती है, साथ ही उसमें रुचि और ज्यादा बढ़ने लगती है।
(19) इस कृति में विधान की सभी प्रारम्भिक क्रियाएं भी शीर्षक के साथ, क्रम से इस तरह दी गई हैं कि जो पहली बार विधान कर रहे हैं, उन्हें भी सरलता से समझ में आ जाता है कि कब क्या करना है और किस विधि से करना है। कब क्या मंत्र, अर्घ्य पढ़ना है, शुद्धि करनी है, नियम लेने हैं, मंगल कलश कब, कैसे स्थापित करना है? आदि।
(20) इस कृति में श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान का संस्कृत में पूजन और जयमाला भी दी गई है। संस्कृत में पूजा, जयमाला पढ़ना अलग ही विशिष्ट तरह का अनुभव भक्तों को देता है।
निष्कर्ष रूप में– इस स्तुति-शतकम् (पूजन व विधान) में इतना विलक्षण ज्ञान और विविधता हैं कि श्री शान्तिनाथ भगवान की स्तुति को पढ़कर या विधान करके, भक्तों का हृदय आत्मिक और मानसिक शान्ति का अनुभव करता है। भक्ति-स्तुति के साथ, ज्ञान-स्वाध्याय का नया प्रयोग, इस स्तुति एवं विधान में देखने को मिलता है। यह नया प्रयोग निश्चित ही भक्तों को उत्साह और आनन्द से भर देता है।