महामह नंदीश्वर विधान

अपनी विलक्षण विशेषता के कारण साक्षात नंदीश्वर द्वीप में उपस्थित होकर पूजा करने जैसी अनुभूति करा देता है यह— अनूठा महामह नंदीश्वर विधान

परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज द्वारा रचित यह महामह नंदीश्वर विधान — चारों अनुयोगों के वर्णन के साथ एक नए तरह का अद्भुत, अभूतपूर्व विधान है, जिसमें ज्ञान भी है, स्वाध्याय भी है, भक्ति भी है, भावना भी है, पूजा भी है, विविधता भी है, ध्यान भी है, साधना भी है, आनंद भी है, अनुभूति भी है, नयापन भी है और मौलिकता भी है

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क्या अदभुत विशेषतायें है इस महामह नंदीश्वर विधान में —

(1)   यह विधान एक बड़े अभाव को दूर करता है। अभी तक नंदीश्वर द्वीप के 52 जिनालयों की पूजा तो उपलब्ध थी लेकिन ऐसा कोई विधान या महामह पूजा नहीं थी जिसमें नंदीश्वर द्वीप के सभी जिनालयों के 108 -108 जिनबिम्बों के लिए भी अर्घ्य समर्पित किए गए हो। इसी अभाव को इस विधान ने दूर किया और जिनागम को समृद्ध बनाया।

 ( 2)    यह नए तरह का और पहला ऐसा विधान है जिसमें सभी 52 जिनालयों के 108 (108 X 52 ) 5616 जिनबिम्बों को अर्ध्य समर्पित कर उनकी पूजा की गई है।

 (3)   इस महामह विधान को 8 दिन की पूजा में बहुत ही व्यवस्थित सुन्दर ढंग से विभाजित किया गया है जिसमें सभी की रुचि निरंतर बढ़ती जाती है।

 (4)   नंदीश्वर द्वीप में पूजा करने जैसी वास्तविक अनुभूति इस विधान के द्वारा प्राप्त होती है।

(5) इस विधान में चारों अनुयोगों प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग, द्रव्यानुयोग का वर्णन भी पूजाओं के माध्यम से मिलता है।

 (6)   इस विधान में पूजा अर्चना भक्ति के साथ व्यापक ज्ञान भी मिलता है ज्ञान का ऐसा भंडार इस विधान में समाया है।

(7)  देवों के अनेक प्रकारों, उनके नामों और उनके विमानों के बारे में सूक्ष्म ज्ञान इस विधान को करते करते हो जाता है इसके साथ ही ऐसी अनुभूति भी होती है कि देवों के इस मेले में हम भी सम्मिलित हो गए और देव बनकर उनके साथ मिलकर पूजा कर रहे हैं।

 (8)   इस विधान में किसी भी पूजा का बार-बार रिपीटेशन नहीं होता। संपूर्ण विधान को बहुत ही सुन्दर व्यवस्थित ढंग से आठ भागों में बांटा गया है। एक और विशेषता यह है कि इस विधान में 52 पूजा हैं और प्रत्येक पूजा को अलग-अलग विषय के साथ रोचक एवं हृदयस्पर्शी बना दिया गया है।

 (9)   आत्मा के स्वरूप का बहुत ही अनुपम वर्णन हिंदी पदों के साथ पांचवीं पूजा में मिलता है।

(10)   भगवान के 1008 नामों के स्मरण के साथ छठी पूजा में अर्ध्य चढ़ाए गए हैं जिससे भगवान के 1008 नामों के बारे में भी ज्ञान प्राप्त होता है।

(11)   इस विधान में महान ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र के सूत्रों और ग्रन्थराज प्रवचनसार के तत्वों के आधार पर भी अर्ध्य बनाए गए हैं  जिससे विधान करते-करते इन दोनों महान ग्रन्थों के तत्वों का भी ज्ञान हो जाता है।

(12)   एक या दो नहीं बल्कि 3 भाषाओं-  हिंदी, संस्कृत और प्राकृत का अनूठा संगम भी इस महामह विधान में  देखने को मिलता है जो अन्यत्र मिलना दुलर्भ होता है।

(13)   हिंदी के सरल पदों में पूजायें सरलता से समझ में आ जाती हैं जिससे पूजाओ में मन एकाग्र हो जाता है।

 (14)   इस विधान में भावों की अविरल भक्ति गंगा शुरू से अंत तक भक्तों के हृदय में बहती है जिसका कारण इसमें भरी विविध और रुचिकर विषय सामग्री है।

 (15)   विधान में विषय सामग्री को इस तरह से संयोजित किया गया है कि नंदीश्वर द्वीप की सभी दिशाओं, पर्वतों और उनमें स्थित 108 मनोहारी जिनप्रतिमाओं का ध्यान इस विधान के साथ अपने आप हो जाता है। इस तरह पूजा और विधान के साथ ध्यान का भी लाभ यहाँ मिल जाता है।

इन विविध और विशिष्ट खूबियों के कारण ही यह महामह नंदीश्वर विधान विधान आधुनिक समय की अनुपम एवं अतुलनीय कृति बन गया है।

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One Comment

  1. अरहम मुनि श्री द्वारा रचित” महामह श्री नंदीश्वर विधान” मुनि श्री के अभी क्षण ज्ञान उपयोग की सुंदर, मनभावन अद्वितीय कृति है।
    मैंने पिछले वर्ष कार्तिक महीने की अठाई में यह विधान घर पर बैठकर अकेले ही लगातार 8 दिन तक पूरा किया था।

    अरहम मुनि श्री के पावन चरणों में शत शत नमन
    ,🙏🙏

    J K Jain,Rohini sector 24 DELHI
    Mob 8851360031

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