णवदेवदा थुदि

(नवदेवता स्तुति)

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An ornate text page featuring a prayer in Jain tradition, with stylized headings and footnotes. Accompanying the text is an image of a monk writing, symbolizing religious devotion.

सुरासुरेहि वंदिदा, मुणीसरेहि कामिदा।

सुभव्वजीवसंथुदा, णमामि सिद्धसंपदां ।।1।।

सुहं दिसंतु मे जिणा…

तवस्स वीरियस्स खं, सुणाणदंसणस्स जे।

चरित्तधम्मयस्स पालगा जयंतु सूरिणो।।

सुहं दिसंतु मे जिणा…

गजेहि साहिमाणगा समं सिहेहि पोरूसा,

महीव-खंतिमाणुसा सया जयंतु साहवो।

सुहं दिसंतु मे जिणा…

सणादणा णवावि देवदा सया जयंतु ते।

सुमंगला भवंतु में सुमंगला भवंतु में।।4।।

सुहं दिसंतु मे जिणा…



(1 )- जिनों को नमस्‍कार हो, आपके लिये नमस्‍कार हो। हे जिनेश! हे गणेश! आप मेरी अच्‍छी तरह रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो। जो सुर-असुरों से वंदित है तथा मुनीश्‍वरों द्वारा कामित (इच्छित) हैं, श्रेष्‍ठ भव्‍य जीवों के द्वारा जो स्‍तुत हैं, उस सिद्ध-सम्‍पदा को मैं नमन करता हूँ।

(2)- जो तप के, वीर्य के, श्रेष्‍ठज्ञान, दर्शन के, चारित्र धर्म के जो पालक हैं वह वास्‍तव में सूरी (आचार्य परमेष्‍ठी) जयवंत हों। समस्‍त शास्‍त्रों के सारभूत तत्त्व के धारक, पाठक धर्म को जानते हैं, ऐसे धर्मदेशक सदा शोभायमान रहें।

(3)- जो गज के समान स्‍वाभिमान को प्राप्‍त हैं तथा सिंह के समान पौरूष प्रधान हैं , पृथ्‍वी के समान क्षमा वाले मनुष्‍य साधु हैं, वे सदा जयवंत रहें। जिनेन्‍द्र भगवान के द्वारा कही हुई भारती ही महान जिनागम है। क्षमादि धर्म की देशना जिनेन्‍द्र भगवान द्वारा कहा हुआ शोभनीय धर्म है।

(4)- वे अकृत्रिम और कृत्रिम जिनालय जयवंत हों, पृथ्‍वीतल में जिनेन्‍द्र भगवान के बिम्‍बों की शोभा सदा जयवंत हो। वे नव ही देवता सनातन हैं, वे सदा जयवंत हों, मेरे लिए सदा मंगल हों, मंगल हों।

सुयपंचमी थुदि
(श्रुत पंचमी स्तुति)

Shrut Panchami Stuti in Prakrit

सुयपंचमी थुदि

(श्रुत पंचमी स्तुति)

रचयिता- मुनि प्रणम्य सागर जी महाराज

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जयउ सुयदेवदा सुगुरुमुहणिग्गदा ।

जयउ सुयपंचमी णाण चिंतामणी ।।

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जो जिणणाणदिवायर पूयं

भत्तिवसेण करेदि विमाणी ।

सो खलु जेट्ठसिदस्स तिहीए

पंचमवासर-मिच्छदि णाणी ।।

जयउ सुयदेवदा……..णाण चिंतामणी ।

भूयबलिस्स ससंघसुमज्झे

आगमपूयण- मच्चणकज्जं ।

पव्वमहोच्छवमत्थ कुणंति

भव्वजणा सुयपंचमिणामा ।।

जयउ सुयदेवदा…………णाण चिंतामणी ।

पायदसद्दमयी जिणवाणी

आइरियाण जए हिययारी ।

सुत्तमयी परमागमभासा

लोयविलोयणलोयणयारी ।।

जयउ सुयदेवदा……णाण चिंतामणी ।

चउवीस जिणभत्ति
(चौबीस  जिनभक्ति)

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जय उसह जिणेसर आदिदेव

जय अजिय सुरासुर-पाय-सेव ।

जय संभव जिद-भवसयल-दोस

जय अहिणंदण आणंद कोस ।। 1 ।।

जय सुमइणाह सम्मइपयास

जय पउमप्पह सिवलोयवास

जय जय सुपास णियभत्तपास

जय चंदप्पह-जिणवर चंदभास ।। 2 ।।

जय पुप्फदंत महिमामहंत

जय सीयल सीयलवयणकंत

जय सेय सेयपहदरिससुज्ज

जय वासुपुज्ज तियलोयपुज्ज ।। 3 ।।

जय विमलजिणेसर विजियचित्त ।

जय जय अणंतजिण अइपवित्त

जय धम्मणाह धम्माहिराय ।

जय संतिणाह जगसंतिदाय ।। 4 ।।

जय कुंथुजिणेसर दयावंत

जय अरजिण णाह विमुत्तिकंत

जय मल्लिजिणेसर विहदकम्म

जय मुणिसुव्वय जिण पत्तसम्म ।। 5 ।।

जय णमिजिण भवतणमोहमोक्ख

जय णेमिजिणेसर सीलसोक्ख

जय पासणाह सम्मेद- मुत्त

जय वड्ढमाण देसिदजिणुत्त ।। 6 ।।

चउवीस  जिणेसर वंदणेण

मम चित्तं णिम्मलयरं जेण

जिणवर-भत्ती पुण्णेण होइ जो करइ तियालं सुहं लेइ ।। 7 ।।

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हिंदी अर्थ


1.ऋषभ जिनेश्वर आदि देव जयवंत हों। सुर- असुर जिनके पद की सेवा करते हैं वह अजितनाथ जयवंत हों। संसार के सकल दोष जीतने वाले संभवनाथ जयवंत हों। आनंद के कोश अभिनंदननाथ जयवंत हों।

2  सन्मति का प्रकाश करने वाले सुमतिनाथ जयवंत हों। शिवलोक वासी पद्मप्रभ जयवंत हों। निज भक्तों के पास रहने वाले सुपार्श्वनाथ जयवंत हों। चन्द्रमा के समान चन्द्रप्रभ जिनवर जयवंत हों।

3 महिममहंत पुष्पदन्त जिन जयवंत हों। शीतल वचनों के कान्त शीतलनाथ जयवंत हों। श्रेय पथ को दिखाने के लिए सूर्य समान श्रेयोनाथ जयवंत हों। तीनलोक में पूज्य वासुपूज्य जिन जयवंत हों।

4 चिन्त विजेता विमल जिनेश्वर जयवंत हों।अति पवित्र अनंतजजिन जयवंत हों। धर्माधिराज धर्मनाथ जयवंत हों। जगत को शांति देने वाले शांतिनाथ जयवंत हों।

5 दयावंत कुंथुजिनेश्वर जयवंत हों। विमुक्ति के कान्त (प्रिय) अर जिननाथ जयवंत हों। कर्मनाशक मल्लि जिनेश्वर जयवंत हों।साम्य के पात्र मुनिसुव्रत जिन जयवंत हों।

6 भवतन मोह से मुक्त नमिजिन जयवंत हों। शील सौख्य नेमि जिनेश्वर जयवंत हों।सम्मेद शैल से मुक्त पार्श्वनाथ जयवंत हों।कहे हुए जिन को ही कहने वाले वर्धमान जयवंत हों।

7  चूँकि   चौबीस जिनेश्वर की वंदना से मेरा चित्त निर्मलतर होता है,जिनवर की भक्ति पुण्य से होती है जो यह भक्ति त्रिकाल करता है वह सुख प्राप्त करता है।

वीयराय भत्ति
(वीतराग भगवान भक्ति)

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हे वीयराय भयवंत विहो 

सव्वण्हु – हियंकर संति पहो। 

अण्णाणं हर जगजणमणहर !

अवमाणं वेरं पावं हर 

मंगलमय ! मंगलदाणकरं 

तव जुगचरणं सरणं सरणं ।।१।। 

हे वीयराय …..

भावार्थ: हे वीतराग भगवान विभो! सर्वज्ञ हितंकर शान्तिपथ! मेरे अज्ञान को हर लो!जगत के जन का मन हरण करने वाले भगवन! अपमान, वैर, पाप को हर लो। हे मंगलमय! आपके युगल चरण शरण हैं, शरण हैं और मंगलदान करने वाले हैं। हे वीतराग….

जीवा दु महामदमोहजुदा 

जणणं मरणं जणणं मरणं 

कुव्वंति सया बहुजोणिगदं 

तव जुगचरणं मदमोहहरं ।।२।।

हे वीयराय …..

भावार्थ: जीव तो महामद और मोह से युक्त हैं। वे सदा अनेक योनियों को प्राप्त हुए जन्म, मरण, जन्म, मरण करते रहते हैं। आपके युगल चरण मद और मोह को हरण करने वाले हैं। हे वीतराग….

जीवाण सया देहासत्ती

विसयासत्ती ण कदा तित्ती।

भयवंत जिणेसर मोक्खपहो

कुव्वदि णियतित्तिं जगमेत्तिं ।।३।।

हे वीयराय …..

भावार्थ: जीवों को सदा देह में आसक्ति है, विषयों में आसक्ति है लेकिन कभी भी तृप्ति नहीं है। हे भगवान जिनेश्वर का मोक्षपथ ही निज तृप्ति और जगत में मैत्री करता है। हे वीतराग….

वड्ढमाण सामि थुदि

(वर्धमान स्वामी स्तुति)

वड्ढमाणं जिणं धम्मतित्थंकरं

भव्वजीवाण सच्चं पहदेसगं।

भावार्थ: धर्म तीर्थंकर वर्धमान जिन हैं वह भव्यजीवों को सत्य पथ के देशक हैं।

पंचमे दुस्समे अम्हि काले तुमं

मे समक्खं सदा होहि वरभावणं।

वीयरागस्स चरणं हि सरणं परं

वड्ढमाणं जिणं धम्मतित्थंकरं ।।१।।

भावार्थ: इस पंचम दु:षम काल में आप मेरे समक्ष सदा रहो यही श्रेष्ठ भावना है। वीतराग के चरण ही परम शरण हैं।

जण्णहिंसा णिसिद्धा कदा जेण सा

जस्स माहप्पमेदं ण वचिगोयरा।

‘जीवहि जीवयंतु’ त्ति संदेसगं

वड्ढमाणं जिणं धम्मतित्थंकरं ।।२।।

भावार्थ: यज्ञ की वह हिंसा जिन्होंने निषिद्ध की, जिनकी यह महिमा वचन गोचर नहीं है। ‘जिओ और जीने दो’ का संदेश आपने दिया है।

दद्दुरो जस्स पूयासुभावं गदो

मिच्चुणा जो खणेणग्गसग्गी भवो।

चंदणा भत्तिबद्धा य पाव‌इ सुहं

वड्ढमाणं जिणं धम्मतित्थंकरं ।।३।।

भावार्थ: दर्दुर जिनकी पूजा के शुभभाव को प्राप्त हुआ जो मरकर क्षणभर में अग्र स्वर्ग में जन्म लिया। भक्ति से बद्घ चंदना सुह को प्राप्त होती है।

पूयचरणं हि चित्ते चिट्ठदुमुदा

सम्ममग्गं सुदिट्ठं लहेमु सदा

इत्थमेवज्ज! भावस्स कुरु पूरणं

वड्ढमाणं जिणं धम्मतित्थंकरं ।।४।।

भावार्थ: मेरे चित्त में आपके पवित्र चरण प्रसन्नता से तिष्ठें। आपके द्वारा दिखाया गया सम्यक् मार्ग सदा प्राप्त करूँ। इस प्रकार ही हे आर्य मेरे भावों की पूर्ति करो।

पागद धजगीत
(प्राकृत ध्वज गीत)

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पंचवण्णमय जेण्हधजो जयदु जयदु जयदु

सव्व -भव्व – मंगलयारी जयदु जयदु जयदु  (1)

सव्व विग्घणासणयारी जयदु जयदु जयदु

जिणमदमंगलचिण्हं एदं जयदु जयदु जयदु  (2)

अणेयंतमयधम्मो लोए जयदु जयदु जयदु

सच्च – अहिंसा – विजय पडागा जयदु जयदु जयदु  (3)

मंगलमय जिणसासण चिण्हं जयदु जयदु जयदु

घरे घरे जिणधम्म – पडागा जयदु जयदु जयदु  (4)

भारददेसे संतिकेदू जयदु जयदु जयदु

एसा विजयंती विस्सम्मि जयदु जयदु जयदु  (5)

हिन्दी अर्थ:

पंच वर्णमय जैन ध्वज जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

सभी भव्यों को मंगलकारी वह ध्वज जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

सभी विघ्नों को नाश करने वाला वह ध्वज जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

जिनमत का मंगल चिन्ह यह ध्वज जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

लोक में अनेकान्तमय धर्म का ध्वज जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

सत्य, अहिंसा की विजय पताका जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

मंगलमय जिनशासन का चिन्ह जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

घर  घर में जिनधर्म पताका जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

भारतदेश में शांति की ध्वजा जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

यह ध्वजा विश्व मे जयवंत हो, जयवंत हो, जयवंत हो।

भजन

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पसीयंतु ते पसीयंतु मे,

पसीयंतु ते पसीयंतु मे। 

जिणा केवली धम्मतित्थंकरा

पसीयंतु ते पसीयंतु मे ॥ 

भावार्थ: वे जिन, केवली और धर्म तीर्थंकर आप सबको प्रसन्न करें और मुझे प्रसन्न करें।

जे णिम्ममा जे णिरीहा सदा 

जे चेयणाए विलीणा मुदा

रमंति सदा सुद्धभावेसु जे

पसीयंतु ते पसीयंतु मे ॥

भावार्थ: जो निर्मल हैं और सदा निरीह हैं, जो चेतना में प्रसन्नता से विलीन होते हैं तथा जो शुद्धभावों में सदा रमण करते हैं, वे मुझे प्रसन्न करें। 

सिद्धारिहा सूरिणो साहवो

अज्झावगा पंच परमेट्ठिणो।

सुहं दिंतु सरणोत्तमा मंगला

पसीयंतु ते पसीयंतु मे।

भावार्थ: सिद्ध, अरिहंत, आचार्य, साधु और उपाध्याय ये पांच परमेष्ठी शरण है, उत्तम हैं, मंगल हैं, वे मुझे प्रसन्न करें।