वैयावृत्यकरण भावना
यह शरीर तो रहा अचेतन, दुर्गन्धित है अशुचि निधान
चर्म मात्र से शोभ रहा है, भीतर रुधिर-मांस-मल खान।
यदि नितान्त एकान्त रूप से, ऐसा तन तू मान रहा
फिर तू वैयावृत्य करे क्यों, क्या चेतन पहचान रहा?॥1॥
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भूल रहा तू जो मुनि जन हैं, रत्नत्रय से नित्य पवित्र
तपोधनों का तन चेतन संग, पूज्य बना ज्यों पट संग इत्र ।
रत्नत्रय के दिव्य लाभ की, हो इच्छा यदि तुमको मित्र
तो तुम मुनितन सेवा करना, पा लोगे जिनदेव चरित्र॥2॥
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हे साधो! केवल चेतन ना, तन का भी अवबोध रखो
क्या तन में है रोग देह का, क्या स्वभाव त्रय दोष लखो।
यदि निदान तुम नहीं जानते, देह रोग का ऋतु अनुसार
तो साधु का मरण समाधि, कैसे हो आराधन सार॥3॥
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इस पंचम कलि काल में देखो, तन आश्रित हैं मन परिणाम
मृत्यु समय पर इसीलिए ही, तन सेवा चेतन की जान।
जीवन भर जो धर्म आराधन, किया निरालम्बन सुख से
उस साधक को अन्त समय में,यदि आलम्बन मृति सुख से॥4॥
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कौन करे इसकी तन सेवा, ऐसा सोच तजे यदि साधु
तो वह आत्म धर्म ही तजता, कहते हैं साधक तप साधु।
धर्म अकेला कहाँ रहेगा धार्मिक जन बिन मुझे बता
धर्मी सेवा धर्म बनी है, धर्मी ही है धर्म पता॥5॥
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वैयावृत्य महागुणकारी, तप है पूज्य बनाता है
चित्त विशुद्ध करे तपसी का, निज-पर का हितदाता है।
नारायण श्रीकृष्ण गृही ने, औषधि देकर कर सेवा
तीर्थंकर पद बन्ध किया है, तीन लोक को सुख-देवा॥6॥
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भावचित्त में जो आते हैं, देहाश्रित ही दिखते हैं
क्लेश, विशुद्धि, सुख, दुख, समता, पर आश्रित फल रखते हैं।
तन सेवा से हो प्रसन्न मन, शल्य छोड़ बनता है शान्त
इसीलिए यह वैयावृत्ति, क्षपक चित्त करता निर्भ्रान्त॥7॥
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करो भावना सेवा की तुम, साधु का यह मुख्य धरम
धर्म मार्ग को प्रकट दिखाता, नष्ट करे अघ अष्ट करम।
श्री जिनवर वाणी सिखलाती, निश्चय अरु व्यवहार धरम
उभय धरम का ध्यान रखो तो, कभी नहीं हो मन विभ्रम॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं वैयावृत्यकरण भावना ममाSस्तु।
वैयावृत्यकरण भावना ध्यान
