साधु समाधि भावना
जिसके चित्त विशुद्धि रहती, क्लेश रहित जीवन जीता
धर्मध्यान औ शुक्लध्यान से, आतम अनुभव रस पीता।
आतम में ये भाव निराले, विरले जन में हैं मिलते
साधु समाधि भावना वाले, मुनियों के मन-मुख खिलते॥1॥
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मनो योग औ वचन योग से, काय योग से सहित हुआ
तीनों योग सहित श्रमणों का, सावधान उपयोग हुआ।
योग और उपयोग बने जब, निश्चल एक लक्ष्य संधान
एसा साधु सतत भा रहा, साधु समाधि भावना जान॥2॥
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किसी साधु के लिए कभी भी, नहीं सोचता वक्र सदोष
नहीं कभी भी अप्रिय बोले, वचन काय से मृदु निर्दोष।
छोटे-बड़े सभी सहधर्मी, सबके सुख की चाह करे
उस साधक के हृदय कमल में, साधु समाधि सुभाव भरे॥3॥
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स्वयं दुखी जो हो जाता है, देख दूसरों का अपमान
और देखना चाहे नित जो, निज-पर का हितकर सम्मान।
आत्म रूप में रुचि रखता है, करा रहा रुचि आतम में
साधु समाधि भावना उसके, प्रतिपल पलती आतम में॥4॥
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अन्त समय में मरण समाधि, धार रहा उत्साहित हो
क्षपक मोह क्षय करने वाला, देख रहा उसका भी हो।
जो उनकी परिचर्या में नित, तत्पर हो उपयोग लगा
साधु समाधि भावना धारक, तीर्थंकर पद बन्ध पगा॥5॥
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श्रुत को पढ़-पढ़ तप को तपकर, जो तप-श्रुत में निष्ठावान
वह साधक आराधक माना, दश धर्मों का निश्चय जान।
जो श्रद्धा से निज आतम को, आराधन में दृढ़ करता
साधु-समाधि भावना उर में, रात दिवस साधक धरता॥6॥
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मन चंचल है जिस साधक का, विचलित होता रहता जो
निजमति बल से मृदुवचनों से, उसको संबल देता जो।
मानो पवन वेग से दीपक, बचा रहा देकर कर ओट
साधु समाधि भावना भाता, देकर के आवश्यक चोट॥7॥
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सबका चित्त रहे अपने में, जो विचारता रखे विचार
यह मानुष तन अस्थिर सबका, आपस की सब कलह सुधार।
अपने व्रत का ध्यान धारकर, निज हित को जो करे विचार
साधु समाधि भावना उसको, कर देती है भव से पार॥8॥
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सदा रखे शुभ भाव हृदय में, जो प्रमाद से मुक्त सदा
चित्त ध्यान में तृप्ति आत्म में, पर तृष्णा से मुक्त सदा।
वह साधु ही नित समाधि की, रहे भावना में तल्लीन
जग मे रह कर मुक्त रहा है, वह ही जग में है परवीन॥9॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं साधु समाधि भावना ममाSस्तु।
साधु समाधि भावना ध्यान
