तपो भावना
तीर्थंकर भगवन्त सभी ने, एक मार्ग दिखलाया है
अष्ट कर्म के नाश करन का, तप उपाय बतलाया है।
अनशन अवमोदर भेदों से, छह प्रकार तप बाह्य रहा
अन्तरङ्ग तप विनय आदि भी, छह प्रकार से सदा कहा॥1॥
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अन्तरंग तप की वृद्धि का, कारण बाहर का तप है
जिस तप से संक्लेश न होवे, वह अन्तर का साधक है।
यथाशक्ति तप करना तपसी, शक्ति छिपाना धर्म नहीं
उस तप से क्या अर्थ रहा यदि, तपो भावना पुनः नहीं॥2॥
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जीव कर्म का ज्यों अनादि से, बन्ध रहा त्यों तन का भी
तन में आतम रमता भ्रमता, मोह बढ़ाता ममता भी।
इसी मोह का क्षय कर देना, तप का काम अनूठा है
किए बिना तप मोक्ष दिखाए, सच मानो वह झूठा है॥3॥
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बड़े-बड़े उपवासादिक यदि, करने की सामर्थ्य न हो
तो भी समकित की शुद्धि से, अल्प तपस्या बहुत अहो।
यदि तप फल से चाह रहा तू, कीर्ति कामिनी पूजा को
तो तप तेरा वह निष्फल ज्यों, कृषक चाहता भूसा को॥4॥
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सभी जगह पर सभी मतों में, अनशन आदिक तप देखे
सुलभ दीखते सभी जनों को, आत्म ज्ञान से अनदेखे।
जीवदया सह इन्द्रिय संयम, वा शिवपथ की अभिलाषा
समीचीन संयम सह तपना, दुर्लभ ना हो जग आशा॥5॥
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तप करते-करते साधक के, भाव विकारी नशते हैं
क्रोध, मान, इच्छाएँ तम हैं, तप रति लख सब भगते हैं।
जैसे -जैसे बढ़ती जाएं, तपो भावना मुनि मन में
तैसे -तैसे बढ़ती जाए, निज रुचि-समता आतम में॥6॥
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जो अनादि से मोहजनित है, भ्रम तन में ही आतम का
वो अनादि भ्रम विगलित होवे, रूप दिखे परमातम का।
वह तप से ही होता देखा, चतु गति भ्रमण मिटा देना
तपो भावना निरत मनीषी, सुख दुख से फिर क्या लेना?॥7॥
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तप तपने का मुख्य कार्य है, पाप हानि अठविध विधि की
आत्म भावना देती सबको, मोह हानि फिर चिर अघ की।
तपो भावना ज्ञान भावना, दोनों का संयोग बने
आत्म शुद्धि हो निज स्वभाव की, उपलब्धि का योग बने॥8॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं तपो भावना ममाSस्तु।
तपो भावना ध्यान
