ज्ञान भावना
संवर तत्त्व समादर करता, नित्य निर्जरा को चाहे
आतम का वह रसिक बना है, आत्म भावना को भाए।
जिसको लगन लगी आतम की, शिवपथ को जो चाह रहा
ज्ञान भावना लीन यती वह, ज्ञानामृत रस पाग रहा॥1॥
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न सुगुण से भरा हुआ है, आतम पूरा चारों ओर
निज स्वभाव को यूँ विचारकर, अन्य विषय पर ना है गौर।
इष्ट-अनिष्ट विषय को जो नित, ज्ञेय मात्र ही जान रहा
वह विरक्त साधू ही जग में, ज्ञान भावनावान रहा॥2॥
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सम्यग्दर्शन और चरित में, सम्यग्ज्ञान प्रमुख माना
यही संभाले दोनों गुण को, इसीलिए नायक माना।
सम्यग्दर्शन की सेवा हो, या हो सम्यक्चारित की
ज्ञान निरन्तर जान रहा है, ज्ञानी के मन भावन की॥3॥
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सम्यक्चारित पालन करता, नित रक्षण में भी दे ध्यान
सम्यग्दृष्टि वह अवश्य ही, भाता रहता ज्ञान प्रमाण।
शुद्ध आत्म परमार्थ भावना, के वश जो भी करता है
वह अभीक्ष्ण ज्ञानी माना है, भवि जन मन को हरता है॥4॥
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वैसे तो सिद्धान्त शास्त्र में, पाँच ज्ञान गाये जाते
मति श्रुत अवधि मनःपर्यय, औ केवलज्ञान नाम पाते।
किन्तु ज्ञान श्रुत भाव रूप से, परिणत होता मात्र यही
इसी भाव में परिणत ज्ञानी, निजानुभूति का पात्र सही॥5॥
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जो कुछ हमें दिखाई देता, वह पदार्थ मम रुप नहीं
मैं शरीर ना वचन रूप ना, कर्म रुप मन रूप नहीं।
मैं आतम हूँ ज्ञान मात्र हूँ, नित्य भावना में लवलीन
ज्ञान मात्र उपयोग मात्र रस, ज्ञानी पी पी होता पीन॥6॥
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ज्ञेय विश्व इस ज्ञानातम के, दर्पण में आ स्वयं गिरे
विश्व ज्ञेय से बड़ा ज्ञान है, इसमें क्या आश्चर्य अरे।
ज्ञान मात्र का आश्रय लेकर, भाव कलुषता न्यून करे
ज्ञान योग-उपयोग लगाकर, ज्ञानी ज्ञान स्वभाव भरे॥7॥
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ऊँ ह्रीं अर्हं ज्ञान भावना ममाSस्तु।
ज्ञान भावना ध्यान
