दर्शन विशुद्धि भावना
ज्ञानोदय छन्द
तीर्थंकर केवलि भगवन को, हाथ जोड़कर झुककर के
मन से, तन से और वचन से, भाव शुद्धि को रख कर के।
मैं प्रणाम करता हूँ नित ही, और उन्हीं को ध्याता हूँ
आत्म विशुद्धि बढ़े हमारी, भाव यही मन लाता हूँ॥1॥
–o–
दरश विशुद्धि आदि सोलह का, आतम में रखना सद्भाव
तीर्थंकर से महा पुण्य का, बन्ध कराते हैं यह भाव।
सम दृष्टि वह साधु पुरुष ही, पुण्य कर्म का बन्ध करे
स्वयं तिरे अनगिन जन तारे, तीन लोक में क्षोभ करे॥2॥
–o–
तीर्थंकर नामक इस विधि का, बन्ध यहाँ हो या ना हो
हमको आतम शुद्धि करना, इसी लक्ष्य को ठाना हो।
कर्म निर्जरा भव्य जीव को, इस विधि निश्चित होती है
यही निर्जरा धीरे-धीरे, बीज मोक्ष का बोती है॥3॥
–o–
तीर्थंकर भगवान पुरुष के, चौंतीस अतिशय होते हैं
प्रातिहार्य आठों ही जिनके, दर्शक के मन खोते हैं।
तथा चतुष्टय आतम के जब, विषय ध्यान के बनते हैं
आत्म विशुद्धि के कारण ये, दरशन शुद्धि करते हैं॥4॥
–o–
श्री जिनेन्द्र की जिन प्रतिमाएं, शुद्ध सदा हैं जिनवर सी
सौम्य रूप हैं निर्विकार हैं, वस्त्र रहित हैं मुनिवर सी।
भव्य जीव तुम नित ही इनका, पूजन, वन्दन ध्यान करो
समकित भाव विशुद्ध बना के, आत्मशुद्धि का भान करो॥5॥
–o–
जहाँ-जहाँ से सिद्ध हुए हैं, तीर्थंकर केवली भगवान्
उन सब स्थानों को नित मैं, वन्दन करके करता ध्यान।
सम्मेदाचल पर्वत हो या, उर्जयन्त के शिखर महान
हैं सम्यक्त्व विशुद्धि हेतू, आत्म शुद्धि की जो पहिचान॥6॥
–o–
जो विहार में मिलते जाएं, सिद्ध क्षेत्र तीरथ लघुग्राम
जिनालयों में सदा विराजे, बिम्ब अपूर्व सदा अभिराम।
उन सबकी भक्ति से नित ही, संस्तुति पूजन वन्दन हो
यही विशुद्धि हेतु बने हैं, सद्दर्शन के भाव अहो!॥7॥
–o–
जिन वचनों को धारण करने, की बुद्धि भी हेतु है
युक्ति से श्रुत को समझाना, भी शुद्धि का सेतु है।
श्रुत, सिद्धान्त पठन-पाठन से, सम-दर्शन दृढ़ होता है
भक्तिभाव से रुचि बढ़ने से, मन आतम में खोता है॥8॥
–o–
तत्त्वभावना में रुचि रखता, निःशंकादि गुणों में लीन
सम्यग्दर्शन के दोषों को, तजने में जो बहुत प्रवीण।
शम, संवेग, दया अरु श्रद्धा, निकट भव्य के चिन्ह रहे
सम दर्शन की शुद्धि हेतु, गुण-दोषों का ज्ञान रहे॥9॥
–o–
ऊँ ह्रीं अर्हं दर्शन विशुद्धि भावना ममाSस्तु।
दर्शन विशुद्धि भावना ध्यान
