Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

15. मार्ग प्रभावना भावना

(सोलहकारण भावना)

मार्ग प्रभावना भावना

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सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरण को, जो नित ध्याता ध्यानी है
औरों को उपदेश दे रहा, वो भविजन ही ज्ञानी है
दुर्लभ से दुर्लभतम मारग, जिनवर का सब को हो ज्ञात
शिव मारग रत वही सन्त ही, स्वयं जगत में हो विख्यात॥2॥

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जिनवाणी के पोषण हेतू, नव श्रुत रचना श्रुत अनुरूप
तथा जीर्ण श्रुत की रक्षा भी, नव प्रकाश का भी प्रारूप।
किन्तु सूत्र, पद, अर्थ, भाव को, नहीं बदलता एक प्रवाह
धर्म बढ़ाता प्रभावना भी, उसकी जग में होती वाह॥4॥

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विकथा वचन नहीं जो करता. आगम के अनुरूप वचन
बिना गिने सामायिक करता, मन रहता निरपेक्ष चमन ।
साम्य भाव है धर्म हमारा, वह ही आतम का सुखकन्द
निरत रहा जो इसी भाव में, उसी श्रमण को है आनन्द॥6॥

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धर्म ग्रहण कर प्रभावना के, हेतु छोड़ता जो निज धर्म
वो मूरख जग-वैद्य बना है, रुग्ण कह रहा औषध मर्म।
ज्ञानी जन को हास्य पात्र जो, मरण समाधि रहित मुआ
अन्त नहीं खुद का यदि संभला, क्या प्रभावना अर्थ हुआ?॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं मार्ग प्रभावना भावना ममाSस्तु।


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