Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

11. आचार्य भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

आचार्य भक्ति भावना

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जो जन्म-जन्म के पुण्य भविक जन, जब संचित कर लेते हैं
गुण-गण भरे देह सूरी की, दिव्य मूर्ति तब लखते हैं।
सर्व लोक में जिनकी महिमा, जैन धर्म को बता रही
उन आचार्य देव की जग में, धर्म ध्वजा पथ बता रही॥2॥

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दो नय की आँखों से सबको, गुरुवर पथ दिखलाते हैं
बिना लोभ के ज्यों स्वभाव से, दीप प्रकाश दिखाते हैं।
व्रत-समिती-गुप्ति से पूरण, पंचाचार परायण हैं
जयवन्तें आचार्य देव जो, नर होकर नारायण हैं॥4॥

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मत एकान्त समर्थन करने, वालों से ना घुले मिले
ख्याति लाभ की इच्छा से ना, मान दिलाते मान मिले
नहीं प्रतिष्ठापन, ईर्यादिक, समिति गुप्ति का नाश करें
वह आचार्य परम परमेष्ठी, जयवन्ते भवि पाप हरें॥6॥

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उच्च मार्ग भ्रष्ट जो जीव रहे हैं, उनको सम्बोधन देकर
सम्यक् चारित ग्रहण कराते, शिव सुख का लालच देकर।
फिर उस शिष्य की रक्षा करते, विषय मोह से पापों से
सो जयवन्त रहें आचारज, पितु सम पाले प्राणों से॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं आचार्य भक्ति भावना ममाSस्तु।


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