Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

9. वैयावृत्यकरण भावना

(सोलहकारण भावना)

वैयावृत्यकरण भावना

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भूल रहा तू जो मुनि जन हैं, रत्नत्रय से नित्य पवित्र
तपोधनों का तन चेतन संग, पूज्य बना ज्यों पट संग इत्र ।
रत्नत्रय के दिव्य लाभ की, हो इच्छा यदि तुमको मित्र
तो तुम मुनितन सेवा करना, पा लोगे जिनदेव चरित्र॥2॥

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इस पंचम कलि काल में देखो, तन आश्रित हैं मन परिणाम
मृत्यु समय पर इसीलिए ही, तन सेवा चेतन की जान।
जीवन भर जो धर्म आराधन, किया निरालम्बन सुख से
उस साधक को अन्त समय में,यदि आलम्बन मृति सुख से॥4॥

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वैयावृत्य महागुणकारी, तप है पूज्य बनाता है
चित्त विशुद्ध करे तपसी का, निज-पर का हितदाता है।
नारायण श्रीकृष्ण गृही ने, औषधि देकर कर सेवा
तीर्थंकर पद बन्ध किया है, तीन लोक को सुख-देवा॥6॥

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भावचित्त में जो आते हैं, देहाश्रित ही दिखते हैं
क्लेश, विशुद्धि, सुख, दुख, समता, पर आश्रित फल रखते हैं।
तन सेवा से हो प्रसन्न मन, शल्य छोड़ बनता है शान्त
इसीलिए यह वैयावृत्ति, क्षपक चित्त करता निर्भ्रान्त॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं वैयावृत्यकरण भावना ममाSस्तु।


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