Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

8. साधु समाधि भावना

(सोलहकारण भावना)

साधु समाधि भावना

–o–

मनो योग औ वचन योग से, काय योग से सहित हुआ
तीनों योग सहित श्रमणों का, सावधान उपयोग हुआ।
योग और उपयोग बने जब, निश्चल एक लक्ष्य संधान
एसा साधु सतत भा रहा, साधु समाधि भावना जान॥2॥

–o–

–o–

स्वयं दुखी जो हो जाता है, देख दूसरों का अपमान
और देखना चाहे नित जो, निज-पर का हितकर सम्मान।
आत्म रूप में रुचि रखता है, करा रहा रुचि आतम में
साधु समाधि भावना उसके, प्रतिपल पलती आतम में॥4॥

–o–

–o–

श्रुत को पढ़-पढ़ तप को तपकर, जो तप-श्रुत में निष्ठावान
वह साधक आराधक माना, दश धर्मों का निश्चय जान।
जो श्रद्धा से निज आतम को, आराधन में दृढ़ करता
साधु-समाधि भावना उर में, रात दिवस साधक धरता॥6॥

–o–

–o–

सबका चित्त रहे अपने में, जो विचारता रखे विचार
यह मानुष तन अस्थिर सबका, आपस की सब कलह सुधार।
अपने व्रत का ध्यान धारकर, निज हित को जो करे विचार
साधु समाधि भावना उसको, कर देती है भव से पार॥8॥

–o–

–o–

ऊँ ह्रीं अर्हं साधु समाधि भावना ममाSस्तु।


Exit mobile version