Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

10. अरिहंत भक्ति भावना

(सोलहकारण भावना)

अरिहंत भक्ति भावना

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मोह महा विष आतम भीतर, पग-पग मूर्छित करता है
वह विषनाशक जिनवर भक्ति, जिससे आतम जगता है।
मन में भरे मदन को मद को, आलस को जो दूर करे
उन जिनवर पदकमल भक्ति कर, पुण्य फलों को पूर अरे॥2॥

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हुए सुशोभित समवशरण में, तीस चार अतिशय वाले
अष्ट प्रातिहार्यों की शोभा, देख सभी हों मतवाले।
उन अरिहंत परम जिनवर की, भक्ति महा अतिशयकारी
बिना मूल्य बहुमूल्य पदों को, सहज दिलाती सुखकारी॥4॥

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श्री जिनवर की भक्ति बिना, तो सम्यग्दर्शन नहीं रहे
रत्नत्रय की प्राप्ति नहीं तो, कहो समाधि कहाँ रहे?
बोधि समाधि बिना वह दीक्षित, नग्न मात्र हो क्या पाए?
चतुर्गति का दुःख निवारण, कैसे भिक्षु कर पाए?॥6॥

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भव्य जीव जो जिन भक्ति में, सहज रुचि को रखता है
और अन्य को उसी भक्ति में, रूचि करा हर्षाता है।
ऐसा पुण्यवान ही प्राणी, तीन लोक में कीरत पा
क्या-क्या सुफल नहीं देती है, भक्तों को जिनदेव कृपा॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं अरिहंत भक्ति भावना ममाSस्तु।


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