Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

7. प्रासुक परित्याग भावना

(सोलहकारण भावना)

प्रासुक परित्याग भावना

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जो साधु प्रासुक खाता है, जिह्वा वश में रखता है
जो प्रासुक पथ पर चलता है, दया हृदय में रखता है।
उस साधु के वचनामृत ही, मोह महा विष शमन करें
ज्ञानामृत देने वाला ही, प्रासुक त्यागी नमन करें॥2॥

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वह उपदेश ही प्रासुक माना, जिसमें जीव दया का ज्ञान
संयम पथ पर बढ़ने की रूचि, बढ़ता जाए सम्यग् ज्ञान।
हेय रहा क्या उपादेय क्या, यह विवेक विज्ञान बने
भेदज्ञान का बढ़ता जाए, शिवपथ का सम्मान बने॥4॥

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श्रावक को यह त्याग भावना, यथाविधी फल देती है
उचित पात्र को दान चतुर्विध, बीज सौख्य का बोती है।
श्रमण संघ को जो भी देना, प्रासुक दो शक्ति अनुसार
प्रासुक परित्याग भावना फल, देती निज भाव विचार॥6॥

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जिसके मन में नहीं निवसती, हिंसा और मोह की खान
नहीं रहे मात्सर्य भाव भी, नहीं कलुषता औ अज्ञान।
उस साधु के वचन कहे हैं, ज्ञान दान शिव का आधार
वही रहा प्रासुक परित्यागी, पर निरपेक्ष दया आधार॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं प्रासुक परित्याग भावना ममाSस्तु।


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