Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

6. तपो भावना

(सोलहकारण भावना)

तपो भावना

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अन्तरंग तप की वृद्धि का, कारण बाहर का तप है
जिस तप से संक्लेश न होवे, वह अन्तर का साधक है।
यथाशक्ति तप करना तपसी, शक्ति छिपाना धर्म नहीं
उस तप से क्या अर्थ रहा यदि, तपो भावना पुनः नहीं॥2॥

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बड़े-बड़े उपवासादिक यदि, करने की सामर्थ्य न हो
तो भी समकित की शुद्धि से, अल्प तपस्या बहुत अहो।
यदि तप फल से चाह रहा तू, कीर्ति कामिनी पूजा को
तो तप तेरा वह निष्फल ज्यों, कृषक चाहता भूसा को॥4॥

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तप करते-करते साधक के, भाव विकारी नशते हैं
क्रोध, मान, इच्छाएँ तम हैं, तप रति लख सब भगते हैं।
जैसे -जैसे बढ़ती जाएं, तपो भावना मुनि मन में
तैसे -तैसे बढ़ती जाए, निज रुचि-समता आतम में॥6॥

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जो अनादि से मोहजनित है, भ्रम तन में ही आतम का
वो अनादि भ्रम विगलित होवे, रूप दिखे परमातम का।
वह तप से ही होता देखा, चतु गति भ्रमण मिटा देना
तपो भावना निरत मनीषी, सुख दुख से फिर क्या लेना?॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं तपो भावना ममाSस्तु।


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