Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

5. संवेग भावना

(सोलहकारण भावना)

संवेग भावना

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काल अनादि से यह आतम, कर्म बन्ध से सहित रहा
नहीं हुआ उत्पन्न किसी से, इस भव वन में घूम रहा।
नित्य निगोद वास ही सबका, इस विधि जो चिंतन करता
वह भव-वन के भ्रमण दुखों से, डर संवेग भार भरता॥2॥

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मोक्ष जो मनुष्य तिर्यंच गति के, गर्भ वास में वास किए
जन्म प्राप्त कर संयोगों से, अरु वियोग से व्यथित हुए।
बड़े हुए तो रोग-बुढ़ापा, पीड़ाओं ने घेर लिया
इसी तरह के चिन्तन से मन, संवेगित सन्नीर पिया॥4॥

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प्रथम, करण अरु चरण, द्रव्य से, चतु अनुयोग शास्त्र आधार
इन शास्त्रों के पढ़ने से ही, होता है संवेग अपार।
धर्म कार्य से हो मन हर्षित, भाव विराग बढ़े उर धार
नए-नए संवेग भाव की, बढ़ती होवे तो जग पार॥6॥

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पर कार्यों में उत्कण्ठित जो, तीव्रतमा आवेग कहा
तीव्रतरी फिर वही लालसा, ध्यानी का उद्वेग रहा।
मन्द-मन्द आकांक्षा रहना, उत्सुकता का होना है
शान्त ध्यान निर्वेग भाव से, मन संवेग सलोना है॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावना ममाSस्तु।


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