Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

3. शीलव्रत अनतिचार भावना

(सोलहकारण भावना)

शीलव्रत अनतिचार भावना

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जो समकित समदर्शी प्राणी, जिनवर कथित व्रतादिक को
रुचि से गहता भाग्य समझता, संयम, व्रत तप पालन को।
ग्रहण करूँ कब कठिन व्रतों को इस विधि भाव जगाता है
शील-व्रतों की करे भावना, भाव फलों को पाता है॥2॥

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हो अनन्यमन एकमना वो, परमारथ रथ पर चढ़ता
स्वयं सारथी योद्धा भी हो, मन विकल्प रिपु से लड़ता।
पुण्य फलों से मिले भोग की, नाम, दाम की चाह बिना
बना विजेता मोक्षमार्ग का, व्रती वही निर्दोष बना॥4॥

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बाह्य जगत के कार्य-क्रमों में, निर्विकल्प जो बना हुआ
मन उलझन के भावों को तज, क्षोभ रहित हो तना हुआ।
इष्ट-अनिष्ट विकल्प मूर्खता, रही ज्ञानिता समता में
ऐसा मति में अवधारण कर, व्रती बढ़ रहा क्षमता में॥6॥

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शील महासागर लहराता, क्षमाभाव से अति गंभीर
नित उत्ताल तरंगों से जो, दोष फेंकता बाहर धीर।
आतम रत्नाकर गुण-वैभव, पर संयोग दोष का धाम
यह विचार कर शील व्रतों में, निरतिचार करता आराम॥7॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं शीलव्रतेषुअनति-चार भावना ममाऽस्तु।


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