Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

2. विनय सम्पन्नता भावना

(सोलहकारण भावना)

विनय सम्पन्नता भावना

–o–

जो रत्नत्रय धारण करके, नित उसका पालन करते
वही धर्म है जिसको धरके, धार्मिक सब जन हैं कहते।
जग में रहकर भी जो जग से, नहीं अपेक्षा कुछ रखते
उनके चरण कमल में दृष्टि, लगी सहज वो मद हरते॥2॥

–o–

–o–

मोक्ष मार्ग में लगे हुए की, दर्प युक्त होकर के जो
विनय चाहता, भक्ति चाहता, मान कषाय बढ़ाकर जो।
स्वयं बना अभिमानी है जो, स्वयं कषायी होकर आप
विनय योग्य वह कहो कहाँ से, हो सकता जब ना निष्पाप॥ 4॥

–o–

–o–

तीर्थंकर, गणधर देवों ने, दो प्रकार तप बतलाए
विनय कहा अभ्यन्तर तप है, इसमें साधक मन लाए।
निर्मद मन ही हलका होकर, आतम में गोते खाता
डूब-डूब कर डुबकी लेता, करम मैल धोता जाता॥6॥

–o–

उच्च कुलीन महाजन हो या, सुन्दर हो चौखा हो रूप
ज्ञान प्रशंसा भी हो जग में, वैभव सहित बना हो भूप।
फिर भी आत्म प्रशंसा करके, नहीं गर्व जो मन धारे
पूज्य पुरुष लख नयन झुकाता, विनयपूर्ण वच-तन सारे॥7॥

–o–

–o–

ऊँ ह्रीं अर्हं विनय सम्पन्नता भावना ममाSस्तु।


Exit mobile version