Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

1. दर्शन विशुद्धि भावना

(सोलहकारण भावना)

दर्शन विशुद्धि भावना

   ज्ञानोदय छन्द

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दरश विशुद्धि आदि सोलह का, आतम में रखना सद्भाव
तीर्थंकर से महा पुण्य का, बन्ध कराते हैं यह भाव।
सम दृष्टि वह साधु पुरुष ही, पुण्य कर्म का बन्ध करे
स्वयं तिरे अनगिन जन तारे, तीन लोक में क्षोभ करे॥2॥

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तीर्थंकर भगवान पुरुष के, चौंतीस अतिशय होते हैं
प्रातिहार्य आठों ही जिनके, दर्शक के मन खोते हैं।
तथा चतुष्टय आतम के जब, विषय ध्यान के बनते हैं
आत्म विशुद्धि के कारण ये, दरशन शुद्धि करते हैं॥4॥

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जहाँ-जहाँ से सिद्ध हुए हैं, तीर्थंकर केवली भगवान्
उन सब स्थानों को नित मैं, वन्दन करके करता ध्यान।
सम्मेदाचल पर्वत हो या, उर्जयन्त के शिखर महान
हैं सम्यक्त्व विशुद्धि हेतू, आत्म शुद्धि की जो पहिचान॥6॥

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जिन वचनों को धारण करने, की बुद्धि भी हेतु है
युक्ति से श्रुत को समझाना, भी शुद्धि का सेतु है।
श्रुत, सिद्धान्त पठन-पाठन से, सम-दर्शन दृढ़ होता है
भक्तिभाव से रुचि बढ़ने से, मन आतम में खोता है॥8॥

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तत्त्वभावना में रुचि रखता, निःशंकादि गुणों में लीन
सम्यग्दर्शन के दोषों को, तजने में जो बहुत प्रवीण।
शम, संवेग, दया अरु श्रद्धा, निकट भव्य के चिन्ह रहे
सम दर्शन की शुद्धि हेतु, गुण-दोषों का ज्ञान रहे॥9॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं दर्शन विशुद्धि भावना ममाSस्तु।


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