Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

16. प्रवचन वत्सलत्व भावना

(सोलहकारण भावना)

प्रवचन वत्सलत्व भावना

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दश प्रकार के धर्म भाव में, विनय भाव से रमता है
सद्वृष्टि श्रावक साधु की, योग्य विनय भी करता है।
विनय भाव वात्सल्य भाव है, जो साधक यह जान रहा
प्रवचन वत्सल धारक साधक, तीर्थंकर पथ मान रहा॥2॥

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सहधर्मी स्नेह सलिल से, चित्त कलुषता को धोता
अन्तरमन से कोमल इतना, सुमन श्रमण का मन होता।
जिसके मन में प्रेमभाव है, क्षमाभाव है, सुन्दर है,
सहधर्मी वात्सल्य भाव ही, प्रवचन का नित आदर है॥4॥

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विनय और वात्सल्य भाव दो, गुण हैं पर सापेक्षित हैं
जहाँ एक है वहीं दूसरा, नयन मार्ग सम ऐच्छिक हैं।
दोनों में से एक भाव भी, जिसमें उसमें दूजा भी
प्रवचन वत्सलता में रहते, प्रेमभाव गुण पूजा भी॥6॥

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जो विशुद्ध समकित भावों से, समता सुख में डूब रहा
प्रेम भाव सब आतम पर रख, शुभ भावों में खूब रहा।
इसी भाव से आतम बांधे, तीन लोक सुखकारक कर्म
जिसके उदय फलों में होता, जग जीवों को अनुपम शर्म॥8॥

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ऊँ ह्रीं अर्हं प्रवचन वत्सलत्व भावना ममाSस्तु।


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