
वर्ष 2017 में पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज का चातुर्मास हरियाणा के रेवाड़ी नगर को प्राप्त हुआ। यह चातुर्मास अनासक्त महायोगी आचार्य भगवन विद्यासागर जी महामुनिराज द्वारा दिया गया एक ऐसा आशीर्वाद था जिसके बारे में ना तो रेवाड़ी के श्रावकों को कुछ पता था और न ही पूज्य मुनि श्री को रेवाड़ी में चातुर्मास होने की कोई संभावना नजर आ रही थी। इस चातुर्मास के लिए अचानक ही पूज्य मुनि श्री को आचार्य श्री से संकेत मिले थे।
शायद आचार्य भगवन विद्यासागर जी महामुनिराज उस भविष्य को देख रहे थे जो रेवाड़ी में घटित होने जा रहा था। वे शायद उस वृक्ष और उसके फलों को देख पा रहे थे, जिसके बीज रेवाड़ी में बोए जाने वाले थे। भविष्य में विकसित होने वाला वह वृक्ष था- प्राकृत भाषा के ज्ञान, प्रचार, प्रसार और संरक्षण का वृक्ष।
आज से कुछ वर्षों पहले तक अनेक जैन श्रावक प्राकृत भाषा का नाम तक नहीं जानते थे l अधिकांश जैन लोग तो यह भी नहीं जानते थे कि हमारा णमोकार महामंत्र इसी प्राकृत भाषा में है, प्राकृत भाषा हमारी प्राचीन बोलचाल की भाषा है और हमारे प्राचीन बहुमूल्य ग्रन्थ इसी भाषा में लिखे गए हैं। इसी तरह हरियाणा के रेवाड़ी नगर का नाम भी, एक सामान्य नगर की तरह ही लोग जानते थे। प्राकृत भाषा और रेवाड़ी नगर का ऐसा अद्भुत संयोग हुआ कि आज जहां एक ओर लगभग सभी जैन श्रावक प्राकृत भाषा के महत्व को समझ चुके हैं, वहीं दूसरी ओर रेवाड़ी नगर भी प्राकृत भाषा के एक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हो चुका है।
पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज का रेवाड़ी चातुर्मास ऐसा महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक चातुर्मास रहा कि इस चातुर्मास के प्रकाश में प्राकृत भाषा का इतिहास ही नहीं, वर्तमान और भविष्य भी प्रकाशित हो गया। यह पूज्य मुनि श्री का जैन आगम के लिए ऐसा अभतपूर्व योगदान है जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता।
रेवाड़ी के इस चातुर्मास में पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने प्राकृत भाषा के ज्ञान का जो बीज रोपित किया, वह आज वट वृक्ष बन गया। प्राकृत भाषा के उस वृक्ष में फल भी लग गए। उन फलों से प्राप्त बीजों से देश क्या, विदेशों में भी प्राकृत भाषा के ज्ञान, प्रसार और संरक्षण के वृक्ष विकसित हो गए।
रेवाड़ी चातुर्मास में पूज्य मुनि श्री ने प्राकृत भाषा में ‘पाइय सिक्खा’ नाम से चार पुस्तकों की रचना की। ये पुस्तकें प्राकृत भाषा को पुनः जीवन देने वाले बीज के समान थी। इसके बाद रेवाड़ी में प्राकृत जैन विद्या पाठशाला की स्थापना हुई। पूज्य मुनि श्री के मंगल आशीर्वाद, प्रेरणा और मार्गदर्शन से 1 जनवरी 2019 को प्राकृत भाषा के ज्ञान के लिए भारत की प्रथम ऑनलाइन प्राकृत पाठशाला का शुभारम्भ हुआ। ये ऑनलाइन पाठशालाएं प्राकृत भाषा के प्रचार और प्रसार में एक क्रान्तिकारी कदम साबित हुईं । वर्ष 2025 तक 36 ऑनलाइन प्राकृत पाठशालाओं का संचालन हो गया।
इसके साथ ही प्राकृत भाषा में रचित अनेक ग्रन्थ जैसे द्रव्य संग्रह, गाहा संग्रह, तित्थयर भावना, श्री गोम्मटसार जी आदि का भी ऑनलाइन स्वाध्याय हुआ। घर-घर प्राकृत, नगर नगर प्राकृत जैन विद्या पाठशाला, मन्दिर मन्दिर जिनवाणी थुदि अभियान शुरू हुआ । ऑनलाइन प्रतियोगिता, एनीमेटेड वीडियो, एजुकेशनल वीडियो, क्विज, यूट्यूब चैनल आदि के माध्यम से प्राकृत भाषा का वृक्ष दिन प्रतिदिन विकसित होता गया।
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वर्तमान समय में प्राकृत भाषा के इस वृक्ष से फल भी प्राप्त होने लगे हैं। 35000 से अधिक लोग ऑनलाइन पाठशाला के माध्यम से प्राकृत भाषा का ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं। भारत ही नहीं, जापान, लंदन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा, यूरोप, श्रीलंका आदि देशों में भी लोगों ने ऑनलाइन क्लास के माध्यम से प्राकृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। रेवाड़ी सहित 60 से अधिक स्थानों पर प्राकृत जैन विद्या पाठशालाएं खुल गई हैं। जिसमें 3000 से अधिक लोग प्राकृत का ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। 450 से अधिक मन्दिरों में प्राकृत जिनवाणी थुदि (स्तुति) लगाई जा चुकी है। हजारों जैन श्रावकों को प्राकृत स्तुतियां याद हो गई हैं। जिनवाणी थुदि तो लाखों लोगों की पसन्द बन चुकी है।
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आज पूज्य मुनि श्री के आशीर्वाद से प्राकृत का अध्ययन कराने के लिए शिक्षक ही नहीं, प्रशिक्षक भी उपलब्ध हैं। अनेकों विद्यार्थियों और प्राकृत प्रेमियों ने प्राकृत भाषा में M.A.कर लिया है। अनेक लोग यूजीसी नेट क्वालीफाई कर चुके हैं और वर्तमान में प्राकृत में पी.एच.डी कर रहे हैं। पूज्य मुनि के आशीर्वाद से एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह और रीवा विश्वविद्यालय में प्राकृत भाषा में M.A. की शिक्षा आज सभी के लिए उपलब्ध है।
पागद संदेस पत्रिका
इसी श्रृंखला में पूज्य मुनि श्री की पावन प्रेरणा से प्राकृत टीम ने एक और कदम बढ़ाया और ‘पागद संदेस’ नाम से प्राकृत पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह भारत में अपनी तरह की पहली पत्रिका है। अभी तक दो प्राकृत पत्रिका प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पत्रिकाओं में प्राकृत के बारे में रोचक जानकारी, ज्ञान और विविध सामग्री उपलब्ध है जिन्हें पढ़कर प्राकृत भाषा को जानने वाले ही नहीं, अपितु अन्य पाठक भी प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
इन दोनों पागद संदेस पत्रिका को इस पेज पर उपलब्ध PDF में आप पढ़ सकते हैं और Download भी कर सकते हैं –
पागद संदेस अंक – 1 (PDF)
पागद संदेस अंक – 2 (PDF)
