Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

णवदेवदा थुदि

(नवदेवता स्तुति)

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सुरासुरेहि वंदिदा, मुणीसरेहि कामिदा।

सुभव्वजीवसंथुदा, णमामि सिद्धसंपदां ।।1।।

सुहं दिसंतु मे जिणा…

तवस्स वीरियस्स खं, सुणाणदंसणस्स जे।

चरित्तधम्मयस्स पालगा जयंतु सूरिणो।।

सुहं दिसंतु मे जिणा…

गजेहि साहिमाणगा समं सिहेहि पोरूसा,

महीव-खंतिमाणुसा सया जयंतु साहवो।

सुहं दिसंतु मे जिणा…

सणादणा णवावि देवदा सया जयंतु ते।

सुमंगला भवंतु में सुमंगला भवंतु में।।4।।

सुहं दिसंतु मे जिणा…



(1 )- जिनों को नमस्‍कार हो, आपके लिये नमस्‍कार हो। हे जिनेश! हे गणेश! आप मेरी अच्‍छी तरह रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो। जो सुर-असुरों से वंदित है तथा मुनीश्‍वरों द्वारा कामित (इच्छित) हैं, श्रेष्‍ठ भव्‍य जीवों के द्वारा जो स्‍तुत हैं, उस सिद्ध-सम्‍पदा को मैं नमन करता हूँ।

(2)- जो तप के, वीर्य के, श्रेष्‍ठज्ञान, दर्शन के, चारित्र धर्म के जो पालक हैं वह वास्‍तव में सूरी (आचार्य परमेष्‍ठी) जयवंत हों। समस्‍त शास्‍त्रों के सारभूत तत्त्व के धारक, पाठक धर्म को जानते हैं, ऐसे धर्मदेशक सदा शोभायमान रहें।

(3)- जो गज के समान स्‍वाभिमान को प्राप्‍त हैं तथा सिंह के समान पौरूष प्रधान हैं , पृथ्‍वी के समान क्षमा वाले मनुष्‍य साधु हैं, वे सदा जयवंत रहें। जिनेन्‍द्र भगवान के द्वारा कही हुई भारती ही महान जिनागम है। क्षमादि धर्म की देशना जिनेन्‍द्र भगवान द्वारा कहा हुआ शोभनीय धर्म है।

(4)- वे अकृत्रिम और कृत्रिम जिनालय जयवंत हों, पृथ्‍वीतल में जिनेन्‍द्र भगवान के बिम्‍बों की शोभा सदा जयवंत हो। वे नव ही देवता सनातन हैं, वे सदा जयवंत हों, मेरे लिए सदा मंगल हों, मंगल हों।

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