Site icon मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी

गोयम गणहर थुदि

(गौतम गणधर स्तुति)

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       15 नवंबर 2020 को, दीपावली के शुभ अवसर पर, गौतम गणधर स्वामी की भक्ति में रचित इस मनमोहक स्तुति के बारे में जानने, पढ़ने और सर्वप्रथम पूज्य मुनि श्री की मधुर वाणी में ही, इसे सुनने का सौभाग्य श्रावकों को  प्राप्त हुआ।

       इस स्तुति में पूज्य मुनि श्री ने हृदयस्पर्शी भावों के साथ 10 प्राकृत गाथाओं में गौतम गणधर स्वामी की अनुपम भक्ति की है। स्तुति प्राकृत भाषा में है, पर प्राकृत ना जानने वालों को भी, पूज्य मुनि श्री की वाणी में स्तुति को सुनकर ऐसा अनुभव होता है, जैसे कि कानों में मधुर रस ही घुल गया हो। प्रत्येक गाथा के बाद पूज्य मुनि श्री ने हिंदी में उस गाथा के भाव भी श्रोताओं को समझाए हैं।

       इन  गाथाओं का अर्थ सुनकर, पढ़कर श्रोताओं व पाठकों का हुदय गौतम गणधर स्वामी के प्रति भक्ति भाव एवं श्रद्धा से भर जाता है। उन्हें इस स्तुति के माध्यम से गौतम गणधर स्वामी के जीवन, चारित्र एवं गुणो का परिचय होता है, साथ ही उनकी बुद्धिमता और भगवान के प्रति उनके अनुराग, श्रद्धा, भक्ति के बारे में भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

      दीपावली के अवसर पर श्रावकजन को गौतम गणधर स्वामी की भक्ति करने के लिये, इस तरह की स्तुति का अभाव अनुभव होता था। पूज्य मुनि श्री ने इस अभाव को दूर किया और सदा के लिए, प्रत्येक दिवाली पर, गौतम गणधर स्वामी की भक्ति करने के लिए, इस स्तुति का उपहार सम्पूर्ण समाज को दिया। पूज्य मुनि श्री का यह उपहार, प्रत्येक दिपावली पर जन समुदाय के भक्ति भावों में वृद्धि करता रहेगा।

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श्री गौतम गणधर स्तुति

(गोयमगणहरथुदि)

(उपजाति छन्द)

जो वड्ढमाणो जिणवीयराओ केवल्लधामो सयलत्थदिट्ठो

तस्सेव मुक्खो पढमो हि सिस्सो तं-गोयमं वीयरदिं-णमामि ॥ 1 ॥

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जो वर्धमान जिनवीतराग, कैवल्यधाम तथा सकल पदार्थों के दृष्टा हैं, उनके ही मुख्य प्रथम शिष्य जो हैं, उन वीतरति (वीतराग) गौतम को मैं नमन करता हूँ।

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 सद्देसणं सो सुणिऊण-सम्मं णाणं धरेदिप्पणमामि सामिं ॥ 2 ॥

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जो वेद के एकपाठी हैं, पुराण विज्ञ हैं, अद्वैत मिथ्यात्व और कषाय को धारण करते हैं, वह समीचीन देशना को सुनकर सम्यग्ज्ञान को धारण कर लेते हैं, ऐसे गौतमस्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ।

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वेदंतविण्णाणबलेण गव्वी जिणेसरस्सप्पविलोयणेण

मिच्छत्तभावं जहिदूण णाणं लहेदि सम्मं पणमामि सामिं ॥3॥

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वेदांत के विज्ञान के बल से जो गर्वी (घमंडी) थे किन्तु जिनेश्वर के देखने से मिथ्यात्व के भाव को छोड़कर सम्यग्ज्ञान को प्राप्त किए। उन गौतम स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ।

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सिस्सेसु जो पंचसदेसु सामी गोत्तेण वा गोयमणामधारी।

जो बम्हणो बम्हपरो विजादो तमिदंभूदिं पणमामि णिच्चं ॥ 4॥ 

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जो पाँच सौ शिष्यों के स्वामी हैं तथा गोत्र से गौतम नाम को धारते हैं। जो ब्राह्मण थे और ब्रह्म में तत्पर हुए थे, उन इंद्रभूति को नित्य प्रणाम करता हूँ।

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अणेयबुद्धिप्पहुडीड्ढिजुत्तं चारित्त सुद्धिप्पबलेण खिप्पं 

तवस्स णाणस्स फलं सुपत्तं तमिंदभूदिं विणमामि सामिं ॥5॥

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चारित्र की शुद्धि की प्रबलता से, शीघ्र ही अनेक बुद्धि आदि ऋद्धियों से जो युक्त थे, तप और ज्ञान के फल को प्राप्त किए थे, उन इंद्रभूति गौतम स्वामी गणधर को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

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दिव्वज्झुणिं जो सुणिऊण वीर- मुहारविंदस्स विणिग्गदत्थं। 

अंतोमुहत्तेण रचीअ गंथं तमिंदभूदिं विणमामि सामिं ॥ 6 ॥.

जिन्होंने वीर भगवान के मुख कमल से निर्गत अर्थ वाली दिव्य ध्वनि को सुनकर अंतर्मुहर्त में ग्रंथ रच दिए थे। उन इंद्रभूति गणधरस्वामी को मैं  प्रणाम करता हूँ।

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जं- बारसंगादिमहासुसत्थं पुव्वेहि सागं रचिदं य जेण।

 महासमुद्दं जिणदेसिदत्थं तमिंदभूदिं विणमामि सामिं ॥ 7 ॥

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जिनेन्द्र भगवान के द्वारा देशित जो अर्थशास्त्र महासमुद्र है, उसकी रचना जिन्होंने बारह अंग आदि महाश्रेष्ठ शास्त्र में, पूर्वों के साथ की है, उन इंद्रभूति गौतम स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ।

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वीरस्स णिव्वाणगदे दिणे हि पच्चक्खणाणं लहिऊण जादो।

 परंपराए पढमो हि णाणी तमिंदभूदिं विणमामि सामिं ॥ 8 ॥.

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वीर के निर्वाण वाले दिन ही जो प्रत्यक्ष ज्ञान को प्राप्त करके परंपरा से प्रथम केवलज्ञानी (अनुबद्ध केवली) हुए, उन इंद्रभूति को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

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जो रागभावं चइऊण वीरे वेरग्गकट्ठेण हि सुक्कझाणं।

 झाउं य पावेदि णिजप्पभूदिं तमिंदभूदिं विणमामि सामिं ॥ 9॥

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जो वीर भगवान में रागभाव को छोड़कर, वैराग्य की पराकाष्ठा से ही शुक्लध्यान को ध्याकर निज आत्मा के वैभव को प्राप्त कर लेते हैं, उन इंद्रभूति गणधर को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

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गुणी गणेसो य गुणाणुरागी पुरा हि पंडित्तगदो विरागी।

पच्छा विसोहेदि च जस्स पण्णा तमिंदभूदिं विणमामि सामिं ॥10॥

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गुणी, गणधर, गुणानुरागी, विरागी पहले तो पाण्डित्य को प्राप्त हुए थे किंतु बाद में जिनकी प्रज्ञा शोभा को प्राप्त हुई, उन इंद्रभूति गौतमस्वामी को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

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