तत्वार्थ सूत्र वाचना अध्याय -6

परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की मंगल वाणी में तत्वार्थ सूत्र वाचना

        ग्रंथराज तत्वार्थ सूत्र के अध्याय 6 को बहुत महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। यह अध्याय हमें हमारा भाग्य बनाना सिखाता है। यह अध्याय हमें समझाता है – यह व्यवस्था हमारे हाथ में है कि हम भविष्य के लिए अपना अच्छा या बुरा कैसा भी भाग्य बनाएं।

        इतना महत्वपूर्ण अध्याय हमारे लिए बहुत उपयोगी हो सकता है यदि हम उसको अच्छे से समझ पाए। जैसे किसी विद्यार्थी को पाठयक्रम के अध्याय को समझने के लिए अच्छे नोट्स या गाइड बुक मिल जाती है तो उसके लिए उस अध्याय को समझना बहुत सरल बन जाता है, वैसे ही परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक शैली में तत्वार्थ सूत्र के अध्याय 6 पर हुए,ये प्रवचन ऐसे ही उपयोगी  नोट्स और गाइडबुक्स की तरह है, जो इस अध्याय के विषय को सरलता से समझा देते हैं। ये आत्महितकारी प्रवचन, विषय को समझाकर इस जन्म में हम पर  उपकार नहीं करते अपितु हमारे आगे के जन्मों को भी सुधार देते हैं।

        संक्षेप में कहा जा सकता है– ये सरल, सरस और आत्महितकारी प्रवचन एक महत्वपूर्ण अध्याय पर महत्वपूर्ण और उपयोगी notes और  गाइड बुक की तरह है।

प्रवचन 10 (07-Nov-2020)
(सूत्र: 24 -27)
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प्रवचन 9 (06-Nov-2020)
(सूत्र: 22-24)
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प्रवचन 8 (05-Nov-2020)
(सूत्र: 19-21)
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प्रवचन 7 (04-Nov-2020)
(सूत्र: 14-18)
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प्रवचन 6 (03-Nov-2020)
(सूत्र: 13)
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प्रवचन 5 (02-Nov-2020)
(सूत्र: 12)
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प्रवचन 4 (01-Nov-2020)
(सूत्र: 10-11)
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प्रवचन 3 (31-Oct-2020)
(सूत्र: 6-9)
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प्रवचन 2 (30-Oct-2020)
(सूत्र: 3-5)
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प्रवचन 1 (29-Oct-2020)
(सूत्र: 1-2)
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        छठे अध्याय पर पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचन श्रोताओं को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। इन प्रवचनों में श्रोताजन कर्मों के आश्रव के बारे में जानते हैं। कर्मों के आश्रव व बन्ध से ही हमारा भाग्य बनता है। शुभ आश्रव से अच्छा भाग्य और अशुभ आश्रव से बुरा भाग्य बनता है। आश्रव क्या होता है और कैसे होता है? मन, वचन, काय के योग कर्मों के लिये के लिए आश्रव के द्वार की तरह होते हैं। इन तीन प्रकर के योगों के अन्तरंग और बहिरंग कारण क्या होते हैं और यह कितने प्रकार के होते हैं? आश्रव  कौन से गुणस्थान तक रहता है? 13 वें गुण स्थान में सयोग केवली के आश्रव कैसे होता है? पुण्य का नाम तो हम खूब सुनते हैं, इसके दो प्रकार हैं, पापानुबन्धी पुण्य  हमारे लिये किस प्रकार हानिकारक है? सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि का पुण्य क्यों एक समान नहीं होता? दोनों में क्या अंतर होता है? ये सभी जानकारी इन प्रवचनों के माध्यम से मिलती है।

            सूत्र 3 – 5 पर हुए प्रवचनों से  शुभ अशुभ भाव वास्तव में क्या होते हैं, इसके बारे में हमारी भ्रांति हटती है। नया चिंतन मिलता है, जो हमें अपने भावों को पहचानने में सहायता करता है। शुद्धोपयोग के बारे में फैली भ्रांतियां भी दूर होती है। इनमें साम्परायिक और ईर्यापथ आश्रव को सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाया गया है।

          यदि हमें पता है कि कोई कार्य गलत है और यह जानते हुए भी हम उसको कर रहे हैं तो उस कार्य से हमारा अशुभ कर्म (बुरा भाग्य) बहुत ज्यादा जुड़ेगा, जैसे अभक्ष्य पदार्थ खाना गलत है, फिर भी खा रहे हैं तो अशुभ आश्रव अधिक होगा और यदि इस बात को जानकर, कोई ज्ञान लेने से बचे तो और भी तीव्र अशुभ आश्रव इस मिथ्या धारणा से होगा। एक छोटा सा संकल्प नियम भी अशुभ आश्रव से कैसे बचा देता है? इसकी ऐसी सूक्ष्म जानकारी सूत्र 6 – 9 के प्रवचन में मिलती है जिसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। चमड़े का त्याग नहीं है, फिर भले ही उसे प्रयोग ना करते हों, फिर भी उसको ग्रहण करने के समान आश्रव होता रहेगा। अशुभ आश्रव के ऐसे सूक्ष्म कारण जिन पर प्राय: ध्यान नही जाता उनका ज्ञान भी इन प्रवचनों को सुनकर होता है।

अपने विचारो भावों व कार्यो को परखने का साधन हैं ये प्रवचन —

                 सूत्र 10-11 के प्रवचन को श्रवण  करने से यह भी पता चलता है कि किसी व्यक्ति में ज्ञान की कमी क्यों हो जाती है? कुछ बच्चे बुद्धिमान तो कुछ  बुद्धि रहित या विवेकहीन क्यों रह जाते हैं? किसी के ज्ञान व दर्शन के साधनों में विघ्न डालने, ज्ञानी-बुद्धिमान से ईर्ष्या-द्वेष करने, उसकी प्रशंसा से ईर्ष्या  करने का क्या फल होता है? किसी को भगवान, गुरु के दर्शन करने से रोकने पर कैसे कर्मो का बन्ध होता है और वे कर्म अपने उदय मे इसका क्या बुरा फल देते हैं?

दुख से कैसे बचा जा सकता है?

         दुख क्यों होता है? दुख से हम कैसे बच सकते हैं? दुख में दुखी होने से हमारा भविष्य के लिए फिर से दुखी होने का भाग्य क्यों बन जाता है? क्या चिंतन मनन करें कि दुख से बच सकें? बार-बार रोना, आंसू बहाने से भी आगे के दुख का बन्ध हो जाता है। दुख में दुखी होना भी अपने लिए क्यों घातक है ? इस सन्दर्भ में उपयोगी नई जानकारी भी सूत्र 10-11 के प्रवचन से मिलती है जिसका उपयोग कर कोई भी व्यक्ति भविष्य के लिये होने वाले दुखों के बन्ध को रोक सकता है।

सुख कैसे प्राप्त होता है?

      सुख व अनुकूलता पाने के लिए क्या कार्य किए जाते हैं? व्रतियों, महाव्रतियों की सेवा में विशेष पुण्य का बन्ध क्यों होता है? अनुकंपा क्या होती है? पराधीनता में रहकर भी भविष्य के लिए पुण्य का बन्ध कैसे हो सकता है?  ध्यान, समाधि, योग, मन्द कषाय, इच्छाओं में कमी से व्यक्ति के पुण्य में वृद्धि कैसी हो जाती है? इसके बारे में भी सूत्र-12 पर पूज्य मुनि श्री के प्रवचन से ज्ञान की प्राप्ति होती है।

       अवर्णवाद का क्या अर्थ होता है? किसी में कोई दोष नहीं फिर भी दोष बताना। केवली, श्रुत, संघ, धर्म व देव आदि का अवर्णवाद कैसे हो जाता है? अवर्णवाद करना आसान है, पर इसका फल कितना घातक है?  सूत्र-13 पर हुए प्रवचन को श्रवण करके, अनजाने में होने वाली इन गलतियों का भी अहसास हो जाता है। इस प्रकार अवर्णवाद को जानकर इन गलतियों से अपने को बचाया जा सकता है। चार कषाय के बारे में तो सामान्य जन जानते हैं, सूत्र 14-18 के प्रवचन में इन चार कषायों के साथ व अन्य 9 कषायों का और इनसे होने वाले कर्म के आश्रव, बन्ध का सूक्ष्म एवं रुचिकर वर्णन मिलता है- जैसे हंसना बुरा नहीं है पर कषाय के साथ हंसने से भी अशुभ आश्रव हो जाता है, ये उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है।

नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति के कारण—

             मनुष्य जन्म एक चौराहे की तरह है, यहां से नरक, पशु, मनुष्य, देव चारों गतियों में जाया जा सकता है। सूत्र 14-18 पर हुए प्रवचन के माध्यम से हम अपने बारे में जान सकते हैं कि हम भविष्य में कौन सी गति में जा सकते हैं। कोई व्यक्ति किन कार्यों को करने से नरक या तिर्यंच (पशु) गति में चला जाता है? पिछले जन्म में हमने क्या अच्छे कार्य किये जो यह मनुष्य जन्म हमें मिला है?

         किन भावों व कार्यों को करने से देवगति की प्राप्ति होती है? बन्धन, अभाव, पराधीनता में रहते हुए भी देवायु का बन्ध हो जाता है, ये कैसे हो जाता है, इस तरह की आश्चर्यजनक जानकारी सूत्र 19-21 के प्रवचन में मिलती है।  देवायु भी सामान्य और विशिष्ट दो प्रकार की होती है। सामान्य, विशिष्ट देवायु के कारण और उनकी तुलना करके  विषय को इस प्रवचन में सूक्ष्म रूप से स्पष्ट भी किया गया है।

विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करने के कारण–

          पिछले जन्मों में कोई व्यक्ति कौन से ऐसे कार्य करता है जिससे उसे इस जन्म में सुन्दर शरीर प्राप्त होता है और क्या कार्य करने से आगे के जन्म में कुरुप शरीर मिलता है? धर्म क्षेत्र में छल कपट, बेईमानी, मन्दिरों, प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाने से, निर्माल्य सेवन से अगले जन्म में कैसा शरीर धारण करना पड़ता है? सूत्र 22-24 के प्रवचन को सुनकर ऐसा उपयोगी ज्ञान अर्जित होता होता है।

 कौन सी भावनायें भविष्य में तीर्थंकर भगवान तक बना देती है–    

      हमारे ही भाव और कार्य हमें नरक पहुंचा सकते हैं और हमारे ही भाव और कार्य हमें तीर्थंकर भगवान बना सकते हैं। ऐसी भी 16 भावनाएं हैं, जिनको भाने से, उनके अनुसार कार्य करने से व्यक्ति तीर्थंकर भगवान तक बन सकता है और अनन्त सुख प्राप्त कर सकता है। इन 16 भावनाओं का रोचक वर्णन सूत्र 24 के प्रवचनों में मिलता है जिन्हें गहनता से जानकर, हम ये भावना भाने का और इन भावनाओ के अनुरूप कार्य करने का अभ्यास कर सकते हैं। क्या हमारे अंदर ऐसी कोई भावना है इसका भी चिन्तन analysis कर सकते हैं?

अपनी प्रशंसा और दूसरे की निंदा करना घातक क्यों ?

अपनी प्रशंसा और दूसरे की निन्दा करना अधिकांश लोगों की आदत बन जाती है, पर यह आदत हमारे लिये कौन सा अशुभ कर्म बन्ध करा देती है? हमारे भाग्य पर क्या प्रभाव डालती है? हमारे लिए कैसे घातक बन जाती है ? यह हम नहीं जानते। सूत्र 24-27 पर हुए प्रवचन के माध्यम से हम ये जानकारी प्राप्त कर , इस आदत को नियंत्रित कर सकते हैं। अच्छे कार्यों में आने वाली बाधाओं, रुकावटों से तो सभी परेशान हो जाते हैं पर इनके पीछे  हमारे द्वारा पूर्व में किए गए कौन से कर्म जिम्मेदार हैं?इसके बारे में नहीं जानते । यह ज्ञान भी इस प्रवचन से प्राप्त होता है।

       परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी इन प्रवचनों के मध्य में ही बताते हैं कि उनके गुरु महाराज तत्वार्थ सूत्र के छठे अध्याय को छटा हुआ अध्याय कहते हैं और प्रतिदिन इसके सूत्रों का चिन्तन, मनन करने के लिए कहते हैं। पूज्य मुनि श्री स्वयं इस अध्याय को भावों का, मन का दर्पण कहते हैं जिसके ज्ञान में हम अपने अंदर चल रहे भावों को परख सकते हैं, उनको बदल सकते हैं।

      वास्तव में इस महत्वपूर्ण अध्याय पर आत्महितकारी, सुखकारी, इस भव और आगे के भवों को सुधारने वाले, कर्मों के दुखो से निकालकर अनन्त सुख की राह दिखाने वाले, पूज्य मुनि श्री के इन प्रवचनों को, यदि श्रवण किया जाए और थोड़ा भी जीवन में उतारा जाए तो हम अपने ऊपर ही सबसे बड़ा उपकार कर लेंगे, ऐसी अद्भुत महिमा इस अध्याय और इन प्रवचनों की साक्षात नजर आती है।

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