तत्वार्थ सूत्र वाचना अध्याय -3

परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की मंगल वाणी में तत्वार्थ सूत्र वाचना

            तत्वार्थ सूत्र ग्रन्थराज के अध्याय-3 में अधोलोक और मध्यलोक दोनों का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में अधोलोक (नरक), जम्बूद्वीप, भोग भूमि आदि का सुन्दर वर्णन मिलता है। थोड़ा बहुत भूगोल की जानकारी जो हम रखते हैं, वह तो विज्ञान द्वारा बताया गया बहुत सीमित ज्ञान है। तत्वार्थ सूत्र के अध्याय-3 और 4 में जैन भूगोल का विस्तृत विवरण मिलता है, जिसका वर्णन केवल ज्ञान प्राप्त करके अरिहन्त भगवान ने अपनी दिव्य ध्वनि (दिव्य वाणी) में किया है

           तत्वार्थ सूत्र अध्याय-3 का विषय परम पूज्य मुनि श्री की मंगल वाचना से अनेक प्रकार से रुचिकर बन जाता है। जैन भूगोल का ऐसा अनुपम वर्णन सुनने को मिलता है कि उसे सुनकर श्रोताओं का मन सन्तुष्टि और प्रसन्नता से भर जाता है। उन्हें ऐसा अनुभव होता है यह कितना अद्भुत ज्ञान उनको आज श्रवण करने को मिला है। इससे पहले वह कितने अज्ञान अंधकार में थे।

           इन प्रवचनों की हदयस्पर्शी, रोचक विशेषता है .. कि पूज्य मुनि श्री की मंगल वाणी में एक एक सूत्र के बारे में अनेक प्रकार से ज्ञान प्राप्त होता है, जैसे कि.. (1)सूत्र का अर्थ (2) सूत्र की व्याख्या (3) सूत्र से सम्बंधित पूज्य मुनि श्री का चिन्तन (4) सूत्र का विवेचन.. जैसे यह शब्द, सूत्र में पहले क्यों आया, यह सूत्र ऐसे क्यों लिखा गया (5) सूत्र के ज्ञान से सम्बन्धित अन्य नई जानकारी (6) अन्य शास्त्रों का सन्दर्भ और सम्बन्धित ज्ञान।

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           इन प्रवचनों में नरक का ऐसा यथार्थ वर्णन मिलता है कि नरक का चित्र ही मन में उतर जाए और उसका ध्यान ही मनुष्य को ना जाने कितने पाप और अशुभ कार्य करने से रोक दे। जम्बूद्वीप का भूगोल पूज्य मुनि श्री ने Map के माध्यम से ऐसा समझाया कि हमेशा के लिए मस्तिष्क में बैठ गया। आर्यखण्ड, जम्बूद्वीप, ढाई द्वीप, विदेह क्षेत्र का Map देखकर और पर्वतों, सरोवरों, नदियों की स्थिति Map के माध्यम से समझकर, ऐसा अहसास होता है कि वास्तविक भूगोल तो आज ही जाना है।

            नरक के वर्णन के साथ ही, भोगभूमि का भी ऐसा मनोहर वर्णन, इन प्रवचनों के माध्यम से सुनने को मिलता है जिससे श्रोता यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि उसे अपने इस जीवन में अब क्या कार्य करने चाहिएं जिससे आगे के जन्मों में दुखों से बचा जा सके और सुख-शान्ति को पाया जा सके।

           इन आत्महितकारी, विलक्षण अदभुत विशेषता वाले प्रवचनों में यह जानकारी भी मिलती है कि जम्बूद्वीप का नाम, जम्बूद्वीप ही क्यों पड़ा। भरत क्षेत्र, अन्य क्षेत्रों और पर्वतों आदि के, यही नाम क्यों हैं। मध्य लोक के विभिन्न समुद्रों के जल का स्वाद कैसा है ? अभी तक तो हम ये सोचते थे कि समुद्र का जल खारा होता है, लेकिन वास्तविकता ये है.. मध्यलोक में ऐसे समुद्र भी हैं जिनके जल का स्वाद, इक्षु रस (गन्ने के रस) जैसा मीठा है। यह सूक्ष्म जानकारी भी इन प्रवचनों में प्राप्त होती है। इन समुद्रों के बारे में विज्ञान भी अभी जान नही पाया क्योंकि उसका ज्ञान अभी बहुत सीमित है, भले ही वह हमें व्यापक दिखता हो।

           मध्यलोक में कौन-कौन से द्वीपों एवं पर्वतों पर कितने-कितने जिनालय हैं? कुलाचल पर्वतों पर स्थित सरोवरों का वर्णन, उसके मध्य में विशाल सुन्दर कमल रचना और उस कमल के बारे में पूज्य मुनि श्री का नया चिन्तन जानने का सौभाग्य भी इन प्रवचनो से प्राप्त होता है। भोगभूमि में सुख तो है लेकिन देव दर्शन, पूजा की व्यवस्था नहीं है। कर्मों का फल हम स्ववश होकर कैसे भोग सकते हैं? मध्यलोक में विभिन्न प्रकार के मनुष्यों का वर्णन आदि, विशेष ज्ञानवर्धन भी इन प्रवचनों से होता है ।

           किसी किसी दिन तो केवल एक सूत्र पर ही पूज्य मुनि श्री ने पूरा प्रवचन दिया। जैन भूगोल का ऐसा विस्तृत, गहन एवं सूक्ष्म ज्ञान इन प्रवचनों से मिलता है और पूज्य मुनि श्री की अनोखी शैली इन प्रवचनों को अनोखा बना देती है।

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