उस वर्ष न जाने क्या होगा?

तुम रहना कहीं मित्रों बस अन्याय अनीति नहीं करना
है मंजिल दूर नहीं डरना तुम धीरे-धीरे बस चलना

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चहुँ ओर निशा अंधियारी है पापों का सघन तिमिर दिखता
दिन में भी हिंसा झूठ कपट के बादल का मौसम रहता
इक दीप जलाना अन्तस में मत सोचो इससे क्या होगा?
इस वर्ष यहाँ हम हैं तुम हो उस वर्ष न जाने क्या होगा?

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गम की प्रतिकूल परिस्थिति में जब मन उजड़ा उजड़ा सा हो
स्वार्थ से भरी इस दुनिया में सब दूर न कोई अपना हो
तब तुम आवाज लगाना इक मेरे प्रभु मेरे गुरू आओ
पारस बाबा विद्यासागर मेरा गम दूर भगा जाओ,/span>
तुम दौड़ बस यहाँ आ जाना, मत पूछो इससे क्या होगा
इस बार यहाँ गुरू हैं प्रभु हैं उस बार न जाने क्या होगा?

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किस्मत नैया जग लहरों में कहीं डूब रही कहीं तिरती है
कहीं कभी गोते खाकर आफत से नहीं उबरती है
कभी तन से दुख कभी मन से दुख सुख तो ऊपर की लहरों सा
दुख गहरा एक समुन्दर है जीवन दिखता है भंवरों सा
इस तट पे यहाँ संगी साथी उस तट पर न जाने क्या होगा
इस वर्ष यहाँ आनन्द महा उस वर्ष न जाने क्या होगा?

Posted in Bhajan.

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