गुरू – भक्ति

मुख की छटा की छवि लागे ऐसी प्यारी जैसे,
चाँदनी चकोर सम पूनम की प्याली है।

तप की तपा से खिली रूप की चमक जैसे,
सूरज तपन से कुसुम खिलने वाली है।।

ज्ञान का प्रकाश पुंज तीन लोक जगमगो,
दूर तम का तमाशा आत्मा मवाली है।
तनिक सी आयु में उपाय मुक्ति को करें जे,
लागे मुक्ति नारि अब वधू बनने वाली है।।

भव रोग दूर करें राग मोह मद हरें,
ऐसे गुरू सूरि के दर्श आज पाये हैं।

तन पे जुलम करें करम अलग करें,
श्रद्धा उर धारे निश्चय मन को लुभायें हैं।।

मुद्रा लख अविकारी भेद विज्ञान होत,
देव नर जन सब पाके हर्षाये हैं।
गुरु विद्यासागर के कर की कृपा से ही,
मंगल ही मंगल है खूब सुख छाये हैं।।

Posted in Bhajan.

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