बनते बनते बात

बनते – बनते बात बिगड़ जाती है क्यों?

जलते – जलते बाती बुझ जाती है क्यों?

एक किरण आयी आंगन में आशा की

खुश हो आँख उठायी तभी दिलाशा की

इसमें अपना रूप लखूं या कैद करूँ

सोच नहीं पाया मैं क्या फरयाद करूं

बादल की टुकड़ी में वह खो जाती क्यों?

बनते-बनते ……

होना था अभिषेक सुबह सिंहासन पर

बैठा था निश्चिंत खुशी में सारा घर

मेरा पति कल राजा होगा देखूंगी

उनके राज मुकुट को लख सुधि खो दूंगी

पति के पीछे सीता वन जाती है क्यों?

बनते-बनते ……..

रावण मरण हुआ गृह आगमन हुआ

पुत्रों का लख गर्भ राम मन चमन हुआ

सोचा था अब गम की काली रात टली

सीता का अपवाद सुने तब राम बली

फिर से सीता एकाकी वन जाती क्यों?

बनते-बनते …….

राजुल के हाथों में मेहंदी देखूंगा

बेटी को डोली में बिठा के रोलूँगा

रानी बिटिया लेने नेमी आएंगे

चंद्र चकोरी जोड़ी लख सब गाएंगे

घर आते बारात लौट जाती है क्यों?

बनते -बनते …..

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One Comment

  1. Thanks to the team who are doing such great work to connect the thought of maharaj Sri with the us and lot of people.I am very thankful to all of you..

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